" ज़िन्दगी, तुम्हारे लिए!

मंगलवार, 9 जनवरी 2018

अथ श्री चाय महात्म्य!


तुम्हारी याद भर से
मोह जाता है मन
एक छुवन भड़का जाती है
मन की अगन,
हर बूँद में
स्वाद लिए फिरती हो
आज भी महज़बीं हो
और बीते जमाने की
याद लिए फिरती हो,
घर हो या ऑफिस
जी चाहता है
होठों से लगी रहो,
महफ़िल हो कोई भी
तुम्हारे बिना
अधूरी सी लगती है,
वक़्त बदला
लोग भी बदल गए,
पर तुम नए कलेवर में
साथ-साथ चलती रहीं,
एक वो जमाना था
कि चूल्हे पर भगोने में
सुबह शाम चढ़ती थी
केतली की टोटी से
हौले-हौले गिलास में गिरती थी,
अब देखो न तुम्हारे स्वागत को
पैन और कप आते हैं,
डिस्पोजल को भी
कुल्हड़ कहाँ भाते हैं,
पर तुम तो मैदान में डटी हो
स्वाद कोई भी हो
नाम में वही हो;
बस मुझे ही नहीं
सभी को बहुत भाती हो
जब कहलाती हो
अदरक वाली चाय,
जुकाम हो तो तुलसी वाली,
खांसी भगाये कालीमिर्च वाली,
स्वाद में अच्छी
गुड़ और नमक वाली,
नींबू वाली चाय,
चाय कहेंगे कैसे इसे
ये तो औषधि है,
जो पिए वो गुण गाए
जिसे न भाए
वो पछताए,
चाय की बराबरी
कौन कर पाए.
अगर चाय खुशी की महफ़िल है
तो ग़म में भी जान है,
भले ही उठ रहे हो जनाजे
चाय की तो
ज़िन्दगी देने में पहचान है,
कुछ सुबह शाम पीते हैं,
कुछ पीकर शाम करते हैं,
वो और होंगे
जो गिनतियों में पीते हैं
चाय के दीवाने तो
आसमान के तारों की तरह
हर गिनती नाकाम करते हैं,
ठंडी-गरम, घूंट-घूंट, पूरा कप
क्या फर्क पड़ता है,
जिनकी रगों में खून नहीं
चाय का खुमार बहता है,
ये तो शुरुआत है
चाय पर दो शब्द
इस महात्म्य का वर्णन
अभी आगे बढ़ाना है,
आपके स्नेह की आंच पर
इसे खौलाते जाना है.

शनिवार, 6 जनवरी 2018

एक दिन...जब तुम खो दोगे मुझे

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एक दिन यक़ीनन तुम मुझे खो दोगे
जैसे आज तुम्हें फिक्र नहीं
मेरे रूठने-मनाने से
मेरे रोकर बुलाने से
मेरे दूर हो जाने से
जब चली जाऊंगी हमेशा की खातिर
तुम ढूंढोगे मुझे ज़र्रा-ज़र्रा
चीखोगे मेरा नाम सन्नाटों में,
मुस्कराओगे सोचकर मेरा पागलपन
कि मैं होती तो क्या करती,
आज जब मैं हूँ हर उस जगह
जहाँ तुम चाहते हो
तो कैसे समझोगे मेरा न होना
और जब महसूसोगे
मैं नहीं बची रहूँगी
वापिस आने भर को भी
झलक में मिलूँगी न महक में
न ही बेबस पुकारों में,
मैं टुकड़ा-टुकड़ा जी रही हूँ आज
रत्ती-रत्ती मरने को,
एक कण सा भी चाहते हो मुझको
तो समा लो मेरा वजूद अपनी छाया में
मेरा दम घुट रहा है
बचा लो मुझे मर जाने से
मेरा दर्द बिखर जाने से
मैं गयी तो खो जाऊंगी
तुम शिकायत करोगे
तलाशोगे मेरी आवाज हर चेहरे में
और मैं सिमट जाऊंगी
चन्द अहसासों में सिमटे बस एक नाम में
एक थी ...
तब यकीनन खो चुके होगे मुझे।

बुधवार, 3 जनवरी 2018

प्रेम: कल्पनीय अमरबेल...प्रथम अंक



हमारे वैवाहिक रिश्ते को अभी चन्द महीने हुए थे। अभिलाषाएं पालने में ही थी पर आवश्यकताओं ने पाँव पसारने शुरू कर दिए थे।  वो बेटे न होकर पति जो बन गए थे और मैं भी बेटी कहाँ रह गयी थी। जो एक अच्छा सा सामंजस्य चला आ रहा था सात बरसों के बेनाम जीवन में, रिश्ते को नाम मिलते ही बचकाना सा लगने लगा। प्रेम को मंजिल तक लाने में जो सफर तय किया आज वो उम्र का कच्चापन लग रहा। जाने क्यों आज ऐसा लग रहा कि प्रेम एक अमरबेल है बस देखने में सुंदर। अगर स्थिरता न हो तो ये किसके परितः अपनी साँसे जियेगा। कल हम प्रेम में थे, लव-बर्डस की उपमा दी जाती थी पर आज मैं समय हूँ और ये पहिया......

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क्रमश:
मित्रों, अगर आपको मेरे बारे में आगे जानने की इच्छा है तो कृपया comment box में लिखें।
कहानी जारी रहेगी।

सोमवार, 1 जनवरी 2018

समय तेरा जवाब क्या.....!

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आते हुए उसने खटकाया भी नहीं
जैसे दबे पाँव मगर
निडर चला आया हो कोई,
एक सवाल था उसकी आँखों में
कि मैं उसके आने के जश्न में
शामिल क्यों नहीं औरों की तरह,
कैसे बताऊँ उसे 
जब स्वागत और प्रतिकार में
कोई फर्क ही नहीं
कौन रुकने वाला है मेरे रोकने से
न घड़ी की सुइयाँ, 
न ही समय में लिप्त दर्द,
इस रूह कँपाती सर्दी में
नए वर्ष का जश्न
एक सुखन दे गया,
आज वो भी खुले आसमान के नीचे
बिना कपड़ों के आवारा थिरक रहे हैं,
जिनकी तिजोरियाँ बोझ से दरक रही हैं,
कल सुबह यहीं से बच्चे
बीनकर ले जाएंगे
खाली ब्रांडेड बोतलें;
वो आ गया है अपना समय पूरा करने
उसे भी तो देखना है
कितनी हाँड़ी बिना भात की हैं,
कितने नन्हे भूखे सोये,
कितनी माँओ ने पानी डालकर
दाल दोगुनी कर दी,
कितने लाल रेस्टोरेंट के नाम पर
पानी में दाल का बिल भरते हैं:
उसे अपना चक्र पूरा करके
चले जाना है,
क्या फर्क पड़ता उसे विषमताओं से,
उसमें संवेदना की बूंद तक नहीं
वो तो है हर रोज़
कैलेंडर पर बदलती एक नयी तारीख।

मेरी पहली पुस्तक

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