" ज़िन्दगी, तुम्हारे लिए!

सोमवार, 2 अप्रैल 2018

जीवित होने का प्रमाण-पत्र

जब हम कुछ नहीं कर रहे होते हैं
तो जीते हैं अपने आप को
एक उस अध्याय को
जिसे कुछ करते हुए
पलट नहीं सकते

जब हम कहीं नहीं होते हैं
तो होते हैं अपने पास
कि औरों के साथ होते हुए
कभी नहीं हो सकते
अपने करीब

जब हम कुछ नहीं बोलते
तो चटते हैं स्वयं को
एक दीमक की मानिंद
खोखला होने तक
जैसे बचेंगे ही नहीं

जाने कैसा मापदण्ड है जीने का
कि कुछ करना
कहीं होना
या फिर बोलते रहना
इतना जरूरी है
जैसे यही हो
जीवित होने का प्रमाणपत्र।

रविवार, 1 अप्रैल 2018

शेर मोहब्बत के नाम

तलाश-ए-जहाँ में होते तो मिल गया होता
ये शब्द मुक़म्मल ही है जो हमें मार गया।

तौफ़ीक़ समझकर मोहब्बत को जी लिया हमने,
बस आंखों के इशारे हैं, कोई कलमा नहीं पढ़ना।

*तौफ़ीक़-इबादत

बिना संबोधन वाला पहला ख़त

जब तुम्हारी पहली चिट्टी आयी थी
लिफाफे पर देखा था अपना नाम
एक सुंदर सी बड़ी लिखावट वाला
मुरझा सा गया था
उसका पीला रंग
मग़र तुम्हारे हाथों की खुशबू लेना नहीं भूले
ये जानते हुए भी
कि कितने ही हाथों ने छुआ होगा
तुम्हारे बाद भी,
हर अक्षर बचाकर खोल ही दिया था लिफाफा
और एक-एक कर निकाले थे
वो सारे दस्तावेज़,
जो तुम्हारी बुद्धिमत्ता, कुशलता और
अनुभवी होने के परिचायक थे
उन सबके बीच
तुम्हारा एक प्यारा सा चित्र,
तुम्हारी खुशबू बरसाते
काले रंग की स्याही से लिखे हुए चंद अक्षर
हम जानते थे
ये हमारे लिए हैं
फिर भी हम ढूंढते रह गए थे
तुम्हारा दिया हुआ एक प्यारा सा संबोधन
जो सिर्फ हमारे लिए होता
तुमने लिख भेजी थी हिदायतें
इस हिदायत के साथ
कि
तुम चाहो तो रख सकती हो
मेरी तस्वीर...अपने पास
तबसे आज तक
तुम्हारी वो तस्वीर
और खत वाला लिफाफा
घेरे हुए हैं
मेरे तकिए के नीचे की जगह
मग़र अब तक इंतज़ार है
उस सम्बोधन का!

गुरुवार, 29 मार्च 2018

युवा जीवन की परिणति

बादलों के सुरमई माथे पर
भोर की नारंगी किरणें
अल्हड़ सा अंगड़ाई लेता
बाहें पसारे दिन
चिरयुवा सा दमकता
एकाएक विलीन हो जाता है
तपती दोपहर में
जैसे रिटायरमेंट की अवस्था में
पतली होती
बाबूजी की पेंशन
और घर-खर्च के लिए
आज भी जोड़-तोड़ करती अम्मा,
उसे युवावस्था की दहलीज़ पर खड़ी
बेटी के हाथ जो पीले करने हैं।

सोमवार, 26 मार्च 2018

हो इश्क़ मुक़म्मल तो जानें

बुलंदियाँ तो इश्क़ की,
नाकामियों में हैं
हम तुम्हारे और तुम हमारे
ये सब समझौते हुआ करते हैं
मुक़म्मल जज़्बात
तो तब हैं
कि
तुम हममें
और हम तुममें रहें।

शुक्रवार, 23 मार्च 2018

शर्त ये है कि...

प्रेम बंटता है अगर
तुममें और हममें
तो बँट जाने दो
मग़र शर्त ये है कि
हम तुम्हें तुम्हारे जैसा
और तुम हमें
हमारे जैसा चाहो।

मेरी पहली पुस्तक

http://www.bookbazooka.com/book-store/badalte-rishto-ka-samikaran-by-roli-abhilasha.php