To explore the words.... I am a simple but unique imaginative person cum personality. Love to talk to others who need me. No synonym for life and love are available in my dictionary. I try to feel the breath of nature at the very own moment when alive. Death is unavailable in this universe because we grave only body not our soul. It is eternal. abhi.abhilasha86@gmail.com... You may reach to me anytime.
सोमवार, 30 अप्रैल 2018
सोमवार, 23 अप्रैल 2018
Happy Birthday Master Blaster
पर आज पहली बार यहाँ लिख रही हूँ
लोग कहते थे तुम पर्याय हो क्रिकेट का
मैं कहती हूँ तुम्हीं तो क्रिकेट हो
तुम्हारे बाद मैंने मैच नहीं देखा
मेरे अंदर वो साहस नहीं था
कि तुम्हें अंतिम पारी में विदाई देती
मुझसे लगातार बोला जा रहा था
कि मैं तुम्हें जाते हुए देखूँ
क्योंकि गुजरांवाला से शुरू हुए तुम्हारे सफर में
मैं अंत से पहले तक गवाह रही,
मेरे अपने जानते थे
आखिरी पारी न देखना
मतलब मैंने क्रिकेट के रूप में तुम्हें
अपने अंदर कहीं रोककर रखा
मैंने इस सच को झुठला दिया
कि तुम अब बल्ला उठाए हुए
कभी मैदान में आते नहीं दिखोगे;
डक हो या शतक, तुम जुनून थे मेरा
पॉपिंग क्रीज़ पर तुम्हारा स्टांस लेना,
फ़ास्ट बॉल को बॉलर के ऊपर से
बाउंड्री पर विदा करना,
बाउंसर को थर्ड मैन फील्डर के ऊपर निकालना
ज़बरदस्त ऑन साइड स्ट्रोक खेलकर
ऑफ साइड उससे भी बेहतर बनाना
पंद्रह ओवर की रिस्ट्रिक्टेड फैल्डिंग का लाभ उठाना
बहुत खीझ होती थी
सिद्धू का मेडेन ओवर निकालकर
तुम्हें इंतज़ार करवाना,
स्क्वायर कट हो या फ्रंट फुट शॉट
तुम तो टूट पड़ते थे गेंद पर,
चतुराई तो जैसे रगों में भरी थी
रिवर्स स्वीप में माहिर थे तुम
पैडल स्वीप के प्रणेता बन गए,
सिक्सर के बाद भी सिंगल की भूख में
रनिंग बिटवीन द विकेट
तो बस कमाल की करी थी,
हर शॉट में तुम्हारा कोई सानी नहीं
तुम्हारे जैसा कोई हीरो नहीं
मेरे जैसी कोई दीवानी नहीं,
वर्ल्ड कप के लिए तुम्हारा डेडिकेशन
और इस सपने का पूरा होना
क्या कहूँ, सब कुछ तो दिया तुमने,
हमारा प्यार, हमारा विश्वास
सम्मान सहित लौटाया तुमने
जिस सफर भी रहो
दुवाएँ लेकर चलो
हमेशा मुस्कराते रहो विध हैप्पी फैमिली
यू, सारा, अर्जुन और प्यारी सी अंजली
IMAGE CREDIT: GOOGLE
रविवार, 22 अप्रैल 2018
स्वर्ग... नर्क के बीच..
कितना मुश्किल होता है
जीते जी किसी को अच्छा कहना
और मरते ही
टैग हो जाता है उसका नाम
स्वर्गीय जैसे शब्द के साथ
ये जाने बगैर
कहीं उसकी आत्मा
नर्क में वास तो नहीं कर रही,
मुझे भी कभी किसी आत्मा के साथ
नारकीय अभिव्यक्ति
या फिर नर्क में होने जैसा महसूस नहीं हुआ;
जाने क्यों इंसान
अपने पास होने वालों की वैल्यू नहीं करता
काश, कि हम अच्छा सोचें!
करें इंसान के साथ इंसान जैसा व्यवहार
परोसें उसकी थाली में
थोड़ा और आदर, थोड़ा और प्यार,
उसकी उम्मीदों पर हाँ की मुस्कान चस्पा करें,
अपनी उपस्थिति से
उसके आसपास खुशियों के गुब्बारे सजाएं,
फ़िर
फ़िक्र नहीं होगी....कि
चील-कौओं को खाना नहीं दिया पितृपक्ष में,
मरने वाले के लिए दुआ नहीं मांगी,
अकेले में पछताना न पड़े;
कि कर नहीं पाए अच्छा कुछ भी उसके साथ
स्वीकार नहीं पाए उसकी अच्छाई भरी सभा में,
स्वर्ग या नर्क के बंटवारे में पड़ने से बेहतर है,
जीते जी स्वर्ग की अनुभूति दान करना
मृत्यु पर बस नहीं पर....
शनिवार, 21 अप्रैल 2018
तू हँसती रहे मुझ पर...
ये रोशनी
ये सवेरा
और अंधेरे में
चमकता हुआ
ये तुम्हारा चेहरा।
वो एक शाम पुरानी सी
लगने लगी है
जैसे एक कहानी सी।
वो किनारे, वो सितारे
और वो एक मैं
जो तेरी आंखों में ढूंढता था सहारे
आज सब खामोश है।
इन खामोशियों के बीच भी
तुम चुपके से आकर
कर जाती हो कई सवाल
मेरी आँखों में ढूँढती हो
उस गुनाह का पश्चात्ताप
जो मैंने कभी किया ही नहीं
और मेरा प्रेम बदहवास सा
तुम्हारी आँखों में मेरा फ़रेब ढूंढता है
ये जानते हुए भी
कि मैंने तो बस प्रेम किया है।
आ जाओ कि इक बार
मेरे दर्द को कफ़न पहना दो
ये मुर्दानगी
ये आँसुओं के सैलाब
मुझसे नहीं जिए जाते
ये पल-पल की तिश्नगी
ये घूँट-घूँट का ज़हर
मुझसे नहीं पिए जाते।
इस कदर पनाह मत देना मेरे दर्द को
कि मैं तेरा आदी हो जाऊँ
तू हँसती रहे बेपनाह मुझ पर
और मैं तेरा फरियादी हो जाऊँ।
मंगलवार, 17 अप्रैल 2018
नारीत्व मेरा अहम है
कभी सिर उठाने की कोशिश करती
तो ये कहकर रोक दिया जाता
लड़की हो तुम
चार लोग देखेंगे तो क्या कहेंगे
फिर भी बेहया समाज से
मुझ अकेले को ही लड़ना पड़ता,
अब मैं बड़ी हो गयी हूँ
मेरे अंदर भी आठ लोग बोलते हैं
भेज दी उस कोमला की मृत देह
उन चार लोगों के काँधों पर
अब मैं काया विहीन
जुल्म के ख़िलाफ़ तांडव करती
एक आत्मा भर हूँ
मेरे नारीत्व को
चुनौती देने की भूल मत करना
यही तो मेरा अहम है,
गर साधारण औरत समझो मुझे
तो ये तुम्हारा वहम है।
गुरुवार, 12 अप्रैल 2018
अतीत के झरोखे से
यादों की डायरी में हर पन्ना एक अतीत बन जाता है। उनमें से कुछ तो हम अक्सर पलटते हैं और कुछ मात्र अवचेतन मन का हिस्सा बनकर रह जाते हैं। अक्सर याद करने वाले मेरे अपने प्रिय सितारों में एक नाम जो अमिट है इस सदी के हस्ताक्षर के रूप में वो है...व्यंग्यकार, डायलॉग राइटर, महान लेखक और बहुत अच्छे इंसान माननीय स्वर्गीय के. पी. सक्सेना जी का। आज चाचा जी (मैं उन्हें इसी सम्बोधन से बुलाती थी) का जन्मदिवस है, मैं उन्हें बधाई नहीं दे सकती पर हृदयतल से आभार प्रकट करती हूँ कि मुझे कुछ समय के लिए उनके सानिंध्य का अवसर मिला।
बात सितम्बर 2000 की है जब लखनऊ में एफ. एम. रेनबो का प्रसारण शुरू हुए एक महीना ही हुआ था। स्वर्गीय राजीव सक्सेना जी (इनका परिचय आगे पढ़ने को मिलेगा) और रमा अरुण त्रिवेदी जी ने चाचाजी का इंटरव्यू लिया था। उन दिनों चाचा जी लखनऊ से मुम्बई की खुशहाल उड़ानों में व्यस्त थे। आशुतोष गौरीकर की फ़िल्म 'लगान' के डायलाग लिखने का काम पूरा हो गया था और फ़िल्म प्रमोशन का सिलसिला जोरों पर था। इंटरव्यू सुनते ही मेरे मन में जोरों की इच्छा हुई बात करने की। मैंने तुरन्त पत्र लिखकर प्रेषित किया। ठीक अगले हफ्ते नीले रंग की स्याही से लिखा हुआ लाल रंग की सजावट वाला और मोती सरीखे अक्षरों में लिखा हुआ अपना नाम वाला पत्र देखकर मैंने गौरान्वित अनुभव किया। ढेर सारे आशीष के साथ उसमें एक फोन नं भी लिखा हुआ था। पत्र पढ़कर जितनी प्रसन्नता का अनुभव हुआ था बात करने के बाद उससे भी कहीं अधिक। पहली ही बार में इतनी सहजता से बात की। हर बात में बेटी का सम्बोधन, इवनिंग वॉक से तुरन्त ही लौटे थे। बोलने में हांफ रहे थे। मैंने बोला भी कि मैं बाद में बात करूँ पर जब तक मैंने खुद फोन नहीं रखा हर प्रश्न का बहुत तल्लीनता से उत्तर देते रहे। ये पहला मौका था इसके बाद तो अक्सर बात होती रहती थी। एक दिन बहुत खुश होकर बताया 'मैंने आमिर और रीना (आमिर खान की x-wife) के साथ हॉल में लगान देखी।' मुझे कुछ ईर्ष्या का अनुभव हुआ तो तपाक से बोले, 'परेशान मत हो मैं तुझे आमिर से मिलवा दूँगा। बहुत अच्छा लड़का है वो। मेरा बहुत सम्मान करता है....।'
अगर एक हफ्ते तक फोन न करूँ तो खुद ही खैरियत पूछते थे। मुझे चाचा जी की शक्ल और आवाज बहुत कुछ मेरे नानाजी जैसी लगती थी। मुझे आज भी चाचा जी के लिखे हुए व्यंग्य के धारदार चरित्र बहुत याद आते हैं। उनसे की हुई ढेर सारी बातें और लिखे हुए पत्र मेरे मानस पटल पर अंकित हैं। जब भी पत्रों को पलट कर देखती हूँ एक अपनेपन की महक से भर जाती हूँ कि सफलता के शिखर पर आरूढ़ होकर भी लेश-मात्र घमण्ड नहीं। लखनऊ से मुम्बई का सफर, विभिन्न आयोजनों में शिरकत, फ़िल्म का ऑस्कर तक का सफर तय करना जैसी व्यस्तताओं के बावजूद हर पत्र का त्वरित उत्तर देना, हर फोन कॉल का सम्मान करना ये एक बहुत बड़ी मिसाल है। हाँ कुछ समय के लिए संदीप जी की अस्वस्थता को लेकर विचलित अवश्य दिखे।
आप हमारे बीच नहीं है ये सच है पर ऐसा प्रतीत होता है कि ये किरदार आज भी सजीव है। चाचाजी आपकी लेखनी और सहृदयता को शत-शत नमन।
मंगलवार, 10 अप्रैल 2018
तुम तो बस...
आँखों की कोर से आँसू छलकता है
इस देह के अंदर एक मन भी है
जो तुमसे बावस्ता होने को मचलता है
कोई कुण्डी नहीं है द्वार पर
बस सांकल हटा देना
नेह तो हिय में हर पल दिए जाते हो
आओ न कि हमें
अपने होने का इल्म करा देना
उन बातों को कसम देकर पूछते हो
बहुत भोले हो तुम भी
कहाँ चुभता है तो कहाँ लगता है
जब पीर दोगे तभी न लगेगी
हाथ रखो न इधर
इन बढ़ती हुई धड़कनों की कसम
हम अनजान हैं अब तक
उस दर्द-ए-सुखन से
आकर हमें भी तसल्ली करा देना।
मेरी पहली पुस्तक
http://www.bookbazooka.com/book-store/badalte-rishto-ka-samikaran-by-roli-abhilasha.php
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•एक उचाट सा मन लिए कोने कोने घूमता हूँ मैं गैटविक हवाई अड्डा हर गुज़रने वाले चेहरों में ए आई वन सेवन वन के यात्रियों को खोजता हूँ जो उस रोज...
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मुझे भी तुमसे कुछ ऐसा सुनना है जैसे मार्केज़ ने कहा था मर्सिडीज़ से और मैं ख़ुद को उसके बाद झोंकना चाहूँगी इंतज़ार की भट्टी में वह इंतज़ार ज...






