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रविवार, 22 अप्रैल 2018

स्वर्ग... नर्क के बीच..

कितना मुश्किल होता है
जीते जी किसी को अच्छा कहना
और मरते ही
टैग हो जाता है उसका नाम
स्वर्गीय जैसे शब्द के साथ
ये जाने बगैर
कहीं उसकी आत्मा
नर्क में वास तो नहीं कर रही,
मुझे भी कभी किसी आत्मा के साथ
नारकीय अभिव्यक्ति
या फिर नर्क में होने जैसा महसूस नहीं हुआ;
जाने क्यों इंसान
अपने पास होने वालों की वैल्यू नहीं करता
काश, कि हम अच्छा सोचें!
करें इंसान के साथ इंसान जैसा व्यवहार
परोसें उसकी थाली में
थोड़ा और आदर, थोड़ा और प्यार,
उसकी उम्मीदों पर हाँ की मुस्कान चस्पा करें,
अपनी उपस्थिति से
उसके आसपास खुशियों के गुब्बारे सजाएं,
फ़िर
फ़िक्र नहीं होगी....कि
चील-कौओं को खाना नहीं दिया पितृपक्ष में,
मरने वाले के लिए दुआ नहीं मांगी,
अकेले में पछताना न पड़े;
कि कर नहीं पाए अच्छा कुछ भी उसके साथ
स्वीकार नहीं पाए उसकी अच्छाई भरी सभा में,
स्वर्ग या नर्क के बंटवारे में पड़ने से बेहतर है,
जीते जी स्वर्ग की अनुभूति दान करना
मृत्यु पर बस नहीं पर....

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