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रविवार, 27 अगस्त 2017

कहाँ हो तुम?

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सुनो, सुन रहे हो न!
हमें पल-पल ऐसा क्यों लगता है
कि तुम हमें सुनना नहीं चाहते
तभी तो कर रहे हो न अनसुना;
देखो न! इंतज़ार की रंगत
गुलाबी से नीली हो गयी,
आँखे पीली सी थीं ही गीली हो गयी;
हम खुद से खुद में मथे जा रहे
और तुम हो कि!!!
तुम्हे जो सुख सड़क के कोलाहल,
गाड़ियों के सायरन से मिलता है
हमें डोर बेल में:
तुम्हे प्रतीक्षालय भाता है
और हमे तुम्हारे इंतज़ार में घर का द्वार
आओ न, बस चाय पियेंगे साथ
एक प्याली चाय
जो तुम एक बार में ही उतार लोगे
हलक से नीचे
और हम घूँट-घूँट में
तुम्हारा रसास्वादन करेंगे,
लम्हा-लम्हा तुम्हारे होने का अहसास जियेंगे,
आओ न कि समय ने
खुरच दी हैं दर्द की गहरी लकीरें,
एक शाम का मरहम
तुम्हारे मन की उंगलियों से
हमारे दर्द की हर नब्ज़ पर रखने
बोलो कब आओगे?
कहीं तुम्हारा आना
हमारे खुशी की मरीचिका तो नहीं??

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