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तुम्हारे शब्द!

हमने रातों के जुगनुओं से रोशनी लेकर
तुम्हारी स्याही को अपनी कलम से
शब्दों में पिरोया है,
अब इन शब्दों से वफ़ा हमें
ताउम्र निभानी है।
ये खाली शब्द होते तो
सो जाते कविता में ढलकर
मगर ये तो हमें रातों को जगाते हैं,
तुम्हारे पास होने का
अहसास कराते हैं,
हमारे आँसुओ से लिपट जाते हैं,
जब सारा जहां रात की रंगीनियों में
खोया सा है,
सारा आलम तुम्हारे साथ सोया सा है,
हमारे भीतर की हौले से
सिहरन बढ़ाते हैं,
तुम न हो बस तुम्हारे दिए
ये शब्द नज़र आते हैं।
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मेरी पहली पुस्तक

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