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शुक्रवार, 4 अगस्त 2017

मेरा पुनर्जन्म

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सुनो,
आज की रात
चाँद जमीन पर उतारकर भी करना!
जब अहसासों की जुम्बिश
निंदिया की हथेली पर
धीरे-धीरे करवट लेगी
तो तारे अपनी नींद भर सोएंगे,
मैं तुम्हारे पहलू में रात भर
भोर की राह तकुंगी।
अपने जीवन के प्रलय को
तुम्हारे सृजन के क्षणों से धोती रहूँगी।
आज की रात
तुम्हारे देह की उष्णता से
हुई बूंदों का स्खलन
मेरे भीतर का बीज प्रस्फुटित कर चुका है,
अब वो ऋतु नहीं होगी कुछ माह
मेरे अंतर में होता रहेगा
मेरा ही पुनर्जनम।

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मेरी पहली पुस्तक

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