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रविवार, 20 अक्टूबर 2019

कविता का अस्तित्व

PC: Pexel


दिन पर दिन वृहद होती मेरी इच्छाएं
एक दिन मेरी कविताओं का कौमार्य भंग कर देंगी,
उभरते हुए शब्दों के निशीथ महासागर में
गहराई का एक मुहावरा भर बनकर रह जाएंगी
सिर टिकाए हुए भाषा और देह के व्याकरण में
विलुप्त हो रही स्मृतियों में तलाशी जाएंगी
बावजूद भी इसके क्या संभव होगा
कविताओं के जरिए क्रांति लाना
या फ़िर बन जाएँगी वो अघाई हुई औरतें
जिन्हें मतलब औरत जाति से नहीं होता
बल्कि बराबरी का दिवस मनाने मात्र से होता है.
अस्वीकृत होने की कुंठा मन में छुपाए
निकल पड़ेंगी एक अनवरत यात्रा के लिए
जहाँ से लौटकर कोई संदेशा नहीं आता
मौत भी इन्हें देखकर करवट बदल लेती है
और सो जाती है एक बेमौत नींद...
या फ़िर बन जाएंगी आग
और सिमट जाएंगी एक दिन चूल्हे के कोने में,
घरों के ईशान कोण में
जहाँ आज भी धूप की सुगंध नथुने तर करती है;
कविताओं का अस्तित्व तलाशने की इच्छा
रचती रहेगी नई कविताएँ
और उगाती रहेगी
विलुप्ति के जड़ पर उग रहे अस्तित्व के कैक्टस.

3 टिप्‍पणियां:

विश्वमोहन ने कहा…

बहुत सुंदर। लक्ष के लक्ष्य के संधान की बधाई।

विश्वमोहन ने कहा…
इस टिप्पणी को एक ब्लॉग व्यवस्थापक द्वारा हटा दिया गया है.
Roli Abhilasha ने कहा…

आभार आपका 🙏

मेरी पहली पुस्तक

http://www.bookbazooka.com/book-store/badalte-rishto-ka-samikaran-by-roli-abhilasha.php