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मंगलवार, 26 नवंबर 2019

मैं दोषी हूँ


मैं दोषी हूँ
उन तमाम गुनाहों की
जो मैंने प्रेम करते हुए किए.
मैं दोषी हूँ
उस प्रेम की भी
जो तुमने महसूस किया.
मैं दोषी हूँ
उन तमाम रातों की
जो तुम्हारे इंतज़ार में गुजारीं.
मैं दोषी हूँ
उस पल की
जब मैंने तुम्हें अच्छा कहा.
मैं दोषी हूँ
उस कल की
जिसमें तुम्हें साथ चाहा था.
मैं दोषी हूँ
उन शब्दों को पढ़ने की
जो तुमने लिखने चाहे.
मैं दोषी हूँ
कि तुम्हारा दर्द
तुमसे बड़ा मुझे दिखा.
मैं दोषी हूँ
सबसे ज़्यादा इस बात की
कि अपना ही दोष दिखा नहीं.

PC: Pinterest

2 टिप्‍पणियां:

कविता रावत ने कहा…

समय से पहले अपने दोषों का निवारण हो जाय तो इससे अच्छी कोई बात हो नहीं सकती
बहुत सुन्दर

Roli Abhilasha ने कहा…

बहुत आभार आपका मन के भाव जोड़ने के लिए!

मेरी पहली पुस्तक

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