" ज़िन्दगी, तुम्हारे लिए!

गुरुवार, 14 सितंबर 2017

स्त्री रक्त पिलाकर क्या रक्तबीज पालती है?

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स्त्री को मानव न समझकर
अबला समझने वाले ए सबल पुरुषार्थियों,
रे दम्भी समाज,
मत पिला इन कानों को तेजाब का अमृत,
अगर ये आंखें बेकाबू हो गयी
तो मेरे सीने का दर्द
तेरी ज़िंदगी पर
ज्वालामुखी की मानिंद बरसेगा,
कब तक बिठाएगा मुझे
परीक्षा की वेदी पर ये समाज,
जिस दिन कदम उठ गया
रौंद जाएगी
दुष्टता की ये सत्ता खुद-ब-खुद,
मूकदर्शक होकर देखोगे तमाशा,
उस दिन ये मत कहना कि 
मेरे अवचेतन मन को जगाया क्यों नहीं,
मौका है अब भी सुधार खुद को
और संवारने दे मुझे
सृष्टि के नए सृजन की कहानी,
तुझे कोख में पालते वक़्त ही इतिश्री की होती,
अगर भान होता तू कलंकित करेगा,
एक स्त्री ने पुरुष को
बंधक बनाकर नहीं
रक्त पिलाकर नौ महीने सींचा,
मत कर अपमान उस ममता का,
मत जमा पाँव गुनाह के दलदल में,
तेरे घर में भी एक राजकुमारी होगी 
उसका सोच,
तेरे जैसी जाने कितनी
निगाहों के हवस के दायरे में होगी,
सोच एक बार
एक मासूम लड़की
ज़िल्लत में जी रही
तू हरकत पे हरकत किये जा रहा,
अगर अब भी न सुधरा
तो डूब जाएगा
उसके आंसुओं की बाढ़ में,
क्या बोला था, 'नपुंसक हो जाऊं'
अरे नपुंसक नहीं
तेरा दिमाग बंजर हो जाएगा,
अगर रक्तबीज से
किसी दर्द की फसल लहलाहएगा।

बुधवार, 13 सितंबर 2017

हिंदी से है हिन्दोस्तान!

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हम सब के माथे की शान
हिंदी से है अपना हिन्दोस्तान,
कश्मीर से कन्याकुमारी और
पोरबन्दर से सिलचर तक
हिंदी ने कभी कोई
सरहद या दीवार नहीं बनाई,
सबने वही जुबां बोली
जो समझ में आई;
फिर भी ये उपेक्षा की
दहलीज़ पे ही रहती है:
स्वर-व्यंजनों का स्नेहिल संयोजन
पहले अपनों को ही समझना होगा,
फिर हिंदी की मशाल से रोशन
समूचे विश्व को करना होगा।
ओंकार से आज सब बिस्मिल्लाह कीजिये
कोटि-कोटि इन शब्दों का नमन कीजिये।

हम बड़े क्यों हो गए

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तुम्हारे आलिंगन में
आज वो अनुभव नहीं रहा,
तुम्हारे अनुभवों में
अब वो मिठास नहीं रही.
पहले तो नहीं आते थे ऐसे
जैसे कि तुम्हारा आना
कोई बहुत बड़ी बात हो.
वो तुम्हारे
छोटे-छोटे गिफ्ट्स
मुट्ठी भर टाफी, चोकलेट्स
और हाँ
खिलौनों में छुपा
तुम्हारा चेहरा.
हर शाम
लौटते वक़्त
लाते थे
हमारे लिए 'चिज्जी'
जिसकी मिठास
अभी तक जिन्दा है.
कितना संबल मिलता था
तुम्हारी बाहों में आकर.
कितनी रिश्वत दे डालते थे
देवी-देवताओं को
मेरे एक बार खांसने पर
यही तो सच है न
पर आज
वही पुराने दिन क्यों नहीं हैं,
आज तुम्हारा आना
ऐसे क्यों लगता है
जैसे
खानापूर्ति हो?
ऐसा क्यों हो गया
'पापा'
उम्र बढ़ने से
रिश्ते छोटे क्यों हो गए,
क्यों सिमट गया
तुम्हारा प्यार
जिम्मेदारियों के बोझ तले
क्यों छिन गया हमसे
हमारा बचपन
पापा
हम बड़े क्यों हो गए?

मंगलवार, 12 सितंबर 2017

प्रद्युम्न, अब तुम कभी नहीं आओगे!

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अक्सर छोटे बच्चे स्कूल जाते वक्त
अपनी माँ को इन बोलों की थपकी दे जाते हैं,
'माँ, मैं जा रहा हूँ
तुम अकेले रहोगी न घर पर,
डरना मत!
यहीं दरवाजे पर इंतज़ार करना...'
माँ कितने भी काम निपटा ले
पर उसकी चौकस नज़रें
दरवाजे पर पहुंच ही जाती हैं;
ऐसा ही कुछ साधारण सा दिन रहा होगा
जब उस नन्हें से लाल के कदम
दहलीज़ से बाहर गए होंगे
कभी वापिस न आने के लिए;
उस रोज़ भी हर रोज़ की तरह
माँ ने दी होगी जादू की झप्पी;
काश कि माँ को आभास हो जाता
और वो बच जाता
अखबारों की सुर्खियां बनने से,
वक़्त उसे तारीख़ न बनाता:
उस ममता को आभास नहीं हुआ
वो रोशनी लेकर चला गया
पर एक सबक छोड़ गया पीछे
हम सभी के लिए
कि हम अपने कलेजे के टुकड़ों की
रक्षा ख़ुद करें;
किसी और घर में दूसरा प्रद्युम्न न आये:
हर माँ का लाल देश का नौजवान है,
क्या हैवानियत निगल ही लेगी
इंसानियत को और हम याद में
कैंडल जलाते रहेंगे??

सोमवार, 11 सितंबर 2017

अपना-अपना आसमान

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एक अरसे के बाद
आज माँ ने
बहुत दुलारते हुए कहा,
' जितना समेटती जाओगी
खुद को
उतनी ही
फैलती जाएगी ये दुनिया,
जितना पास जाओगी
हर किसी के
उतना ही खाली होता जायेगा
मन तुम्हारा,
कब तक पढ़ती रहोगी
दुनियादारी की किताब,
कोई आँखें चुनो
जो तुम्हें पढ़ सकें,
ज़िन्दगी एक सफर ही नहीं
मुनासिब मंज़िल भी है
महज अपना आज ही जीना
ज़िंदादिली तो है
पर समझदारी नही.……
………………… '
इसके आगे भी
बहुत कुछ कहती रही माँ
कुछ तो सुन लिया मैंने
कुछ निकलता रहा ऊपर से.
एकबारगी मन किया
माँ की गोद में सर रखकर
जार-जार रो लूँ,
पर सहम गयी मैं
कहीं माँ पढ़ न लें आज मेरा मन,
एक बार फिर मैंने
अपने सुर्ख आँखों की तपिश
अंदर ही पी ली थी,
माँ का हाथ थामा
निकल आई तारकोल की सड़क पर,
एक बच्चे की तरह
माँ से ज़िद की
एक लाल और
एक नीले गुब्बारे के लिए,
लाल पर अपना
और नीले पर
तुम्हारा नाम लिखकर
उनकी डोर छोड़ दी,
कुछ दूर साथ रहकर
उन दोनों ने अलग
अपना-अपना आसमान ढूंढ लिया.

शुक्रवार, 8 सितंबर 2017

कोई गुज़ारिश नहीं है अब तुमसे!

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निस्तेज पड़ी रगों में
लहू का संचार नहीं चाहिए
न रुमानियत को गलाने वाली ऊष्मा,
दर्द हर जड़ों से
ज़ार-ज़ार पिघल रहा है;
ढल रहा है चाँद, रात के साथ
और मैं तेरे तिलिस्म में:
हाशिये पे रखी थी जो उम्मीद तूने
वो डायरी के पन्नों की
गुज़री हुई तारीख थी,
अब कोई अहसास ज़िंदा मत करना
कि मैं दर्द की एक सुबह नहीं चाहती,
जन्नत मिले या दोज़ख़ मुझे
जिस्म को रूह से बस जुदा चाहती।

ULJHAN


मेरी पहली पुस्तक

http://www.bookbazooka.com/book-store/badalte-rishto-ka-samikaran-by-roli-abhilasha.php