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गुरुवार, 22 मार्च 2018

एक युद्ध स्वयं के विरुद्ध

शहादत पर हर बरस
मेले लगाने से पहले
पूँछ लेना उस माँ से
कैसे कलेजा जला था,
पूँछना हर शमा को
जलाने से पहले
कैसे उस सुहागिन का
सिंदूर मिटा था,
पूँछना ये टूटने से पहले
कहाँ गया उम्मीद बनकर
कलाई पर बहन की
जो धागा बंधा था,
शहादत कोई इनाम नहीं है
शहीद कोई नाम नहीं है
ये तो बस एक दिलासा है
आज कक्षा में
बच्चों को पढ़ाया जाने वाला
एक दिन का सबक,
प्रतिमाओं के आस-पास
चौराहों पर होने वाला
एक आयोजन मात्र,
23 मार्च के नाम पर
सबसे बड़ा भाषण देने वाले
महोदय से
बस एक बार पूंछना होगा
क्या अपने घर में
कोई भगत सिंह देखना चाहेंगे
बजाय अम्बानी, सहारा
सचिन, मोदी के???
आज के भगत सिंह, सुखदेव
और राजगुरु को
एक अघोषित युद्ध लड़ना होगा
स्वयं के विरुद्ध,
भ्रष्टाचार, अनैतिकता
और गन्दी राजनीति के विरूद्ध।

बुधवार, 21 मार्च 2018

शून्य से पहले

दायरारहित सोच के
बाहर का दायरा,
कल्पनारहित उड़ान के
बाद की कल्पना,
दर्दरहित जीवन के
अंत का दर्द,
प्रेमरहित मन के
पतझड़ का प्रेम,
गतिरहित आशा के
स्थिरता की आशा,
पड़ावरहित सफर के
दूरन्त का पड़ाव,
....महज कोरी कल्पनाएं नहीं
ये तो एक विराम है
शून्य है
इसके बाद स्थान लेती है
ऋणात्मकता....
मत जाइए शून्य तक
मत खोजिए नकारात्मकता
जीवन अंटार्कटिका नहीं यूरेशिया है
क्योंकि हर जीव पोलर बियर नहीं
कुछ मानव भी हैं।

सोमवार, 19 मार्च 2018

खुशी बांटते रहिए

मुस्कान मन की आभा है
अधरों पर सजाकर रखिए
हो न ये मन अपनों से खाली
रिश्ते सभी से निभाकर रखिए
ये दुनिया है छोटा घरौंदा हमारा
न टूटे कि इसको बचाकर रखिए
है सुबह जो अपनी तो शाम भी है
रूठे वक़्त से भी अब बनाकर रखिए
साथ चलने से ही तो कारवां बनता है
बांटिए खुशी दर्द को मुस्कराकर रखिए

20 मार्च: अंतरराष्ट्रीय खुशी दिवस
संयुक्त राष्ट्र संगठन ने वर्ष 2013 में ये दिवस मनाने की घोषणा की। आइये हम सब मिलकर आज का दिन मनाते हैं।

चचा लखनऊ उवाच 1


GOOGLE JI FOTU DIHIN

हमरे चचा केरे चचा केर पिताजी
अपने ग्यारा साल केर लरिकवा 
खातिर बिटेवा देखे गए रहे
तो कहिन
.....देखौ, तुम्हार नौ साल केर
छुई-मुई जैस बिटेवा हमका
नीक लाग।
बस यू बताओ
कि कनकैया मा कन्नी तो
बांध लेत है,
....फिर हमरे
चचा केर पिताजी 
इक्कीस बरस के
चचा खातिर अट्ठारा बरस केरी
चाची पसन्द 
करे गए
....सुनौ, तुमार बिटिया
तनू दूबर है
मुला ठीक है
बस उइका टाई मैहा
गांठ बाँधब आवत है,
अब हम उनतिस
केर हुई चलेन 
नाक, कान गला केर डॉक्टर हन
हमरे पिताजी का
गर्दन बांधे वाली नाई मिल रही


चचा लखनऊ

रविवार, 18 मार्च 2018

दो शेर

उनके तन्हा होने का उन्हें सबब क्या पता
रिश्ते तो मर गए मगर दफनाए नहीं गए

दिल की बंजर जमीं थी पर मोहब्बतों के फूल खिल तो गए,
अहसास की नमी हवा हो गयी, वहाँ कैक्टस के गुलिस्तां मिले।

शुक्रवार, 16 मार्च 2018

प्रेरणापुंज कल्पना को नमन

GOOGLE IMAGE

लाजवाब थी वो 
बेमिसाल थी वो
थी तो हरियाणा की
मग़र समूचे भारत की
मुस्कान थी वो,
हिम्मत न हारी कभी
आगे ही बढ़ी वो
बेटियों का
मनोबल बढ़ाने को
कामयाबी के
किले गढ़ती रही,
सितारे, विमानों के
चित्रों में ही
शुरुआत कर दी
फिर एक दिन
नासा से
अंतरिक्ष की
उड़ान भर दी,
पहला सफ़र खूबसूरती से
मुक़म्मल हुआ
दूसरे सफ़र ने
अंतिम घड़ी में
उसकी आवाज खामोश कर दी,
आज समूचा विश्व उसकी
जन्मतिथि मना रहा है
कल्पना की कल्पनाओं का सफ़र
करोङो बेटियों को
सपने देखने को 
हर्षा रहा है,
आइये, हम सब
उसे नमन करते चलें
बेटियाँ बोझ नहीं हैं
इसपर मनन करते चलें।

एंटीक पीस हूँ मैं....


कभी फ़िकर नहीं करती
कि कैसी दिखती हूँ मैं
मुझे परवाह है तो इतनी
कि तुम कैसे देखते हो मुझे
मैं
रंग और नूर की
बारात का हिस्सा तो नहीं हूँ
मग़र
कोई अधूरा किस्सा भी नहीं।
मैं
नवाबों के शहर की
शान तो नहीं
पर गुमनाम भी नहीं हूँ,
मैं
मूक ही सही
वाचाल तो शब्द हैं मेरे,
मुझमें
रंगीनियां कब हैं जमाने की
सादगी में लिपटी
श्वेत-श्याम तस्वीर हूँ मैं,
सूरत में
नहीं हूँ
मैं तो
सीरत में हूँ,
खुद के लिए
कब थी मैं
मग़र
सभी की
जरूरत में हूँ,
बादशाहत के किस्सों से
बाहर हूँ
बस
अपने मन की
मुमताज़ हूँ,
जो पढ़ी जा सके
वो
किताब नहीं हूँ
फ़क़त
दास्तां हूँ
अहसासों की
सबके दिलों की
आवाज़ हूँ मैं,
ज़र्रा-ज़र्रा
जीती हूँ
दर्द में
मरती हूँ
हर पल,
हवाओं सी
बहती हूँ
झरनों सी
करती हूँ
कल-कल,
जब
प्रेम की
फुहारें बरसती हैं
खिल जाती हूँ
बनकर
इंद्रधनुष,
मार्तंड सा
तपती हूँ
बर्फ सा पिघलकर
जब
रुदन करती हूँ
आकाश
नाचता है
धरती के
स्पंदन पर।

मेरी पहली पुस्तक

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