" ज़िन्दगी, तुम्हारे लिए!

सोमवार, 16 जुलाई 2018

साइनाइड

तोहमत के गीले तौलिए से
दर्द में तपता बदन पोछते हुए
तुम्हारे शब्दों से उभरा
हर फफोला रिस रहा है,
उन मुस्कराहटों की सीरिंज में
अम्ल भरकर बौछार करते हुए
ताजा हो रहा है वो पल एक बार फिर
कि जो मन से कभी उतरा ही नहीं,
आज फिर ज़िन्दगी
हस्ताक्षर चाहती है
मौत के दस्तावेज पर,
काश प्रेम सायनाइड होता
तो स्वाद न बताना पड़ता!

शुक्रवार, 6 जुलाई 2018

...ओ लड़कियों

ओस की बूंद से भीगने वाली लड़कियों
कैसे सीखोगी तुम दर्द का ककहरा,
आटा गूंधते हुए
नेल पेंट बचाती हुई लड़कियों
ज़िन्दगी मिलती नहीं दोबारा,
फैशन के नाम पर निर्वस्त्र होकर
बेवजह की नुमाइश करती लड़कियों
क्यों बचाती हो खुद को
पायल, बिछुए से
महावर के रंग से
अगर लिपिस्टिक का रंग ही
महज टैग है तुम्हारे लड़की होने का
तो आजीवन आवारापन भोगो,
मत करो समझौता विवाह जैसे रिश्ते के नाम पर
मत बाँधो आत्मा के मोहपाश में खुद को
आजीवन देह बनाकर रहो;
दोयम दर्जे की लगती है न तुम्हें
घर की चारदीवारी में सजी
सम्मान के साथ जीती हुई लड़कियाँ,
क्यों उलझाओ उनकी तुलना में खुद को
वो तो नींव हैं घर की
सम्मान हैं रिश्तों की
उनके लिए चूल्हा-चौका कुंठा का विषय नहीं,
जीन्स, शर्ट पहनकर बाइक चलाने वाली
लड़कों की बराबरी करती लड़कियों
बेवजह दम्भ में ये क्यों भूल जाती हो
क्या लड़कों ने कभी बराबरी का प्रश्न उठाया?
क्या तुम छुपा सकती हो देह के भूगोल को?
क्या तुम प्रणय और समर्पण के बदले मिले
भाव और प्रेम का अंतिम बून्द तक
रसास्वादन नहीं करना चाहती?
क्या तुम्हें अपने प्रिय के आलिंगन से
वो अनुभव नहीं होता
जो लड़की होकर होना चाहिए?
क्या तुम श्रष्टि की वाहक बनने से
खुद को पदच्युत करना चाहती हो?
तुम्हीं से तो दुनिया खूबसूरत है,
बेहतर है कि तुम अपनी गरिमा बनाए रखो
बजाय बराबरी के फेर में पड़ने के,
अगर बराबरी करनी है तो निकलो मैदान में
बलात्कार नाम के जहर का कड़वा घूंट
उन्हीं को पिलाकर आओ,
बदला लेकर आओ अपनी बहनों की अस्मत का;
ये सच है कि कानून पेचीदा गणित में उलझायेगा
खोखले वादों से इज्जत न बचा पाएगा
तो जागो देवियों
एक, दो, तीन, चार और एक दिन हजार
इतनी ही संख्या में जाओ
हवस के दरिंदो को वीरांगना का अर्थ बताओ,
नहीं कर सकती न बलात्कार किसी लड़के का तुम
फिर स्वीकार लो लड़की होना,
लड़की होकर तुम अक्षम तो नहीं,
लड़कों से किसी मायने में कम तो नहीं,
बराबरी तो वो तुम्हारी भी नहीं कर सकते,
अगर तुम्हें मुखाग्नि देने का हक़ नहीं दिया गया
तो उन्हें भी चूड़ियां पहनने के हक़ से
वंचित रखा गया,
फिर कौन सा समीकरण बनाना है?
मनु ने किसी की बराबरी का
परचम नहीं लहराया था
पर मणिकर्णिका और झांसी की रानी के नाम से
अपना लोहा मनवाया था,
पाश्चात्य सभ्यता का
नगाड़ा बजाने वाली ओ लड़कियों
भारत का इतिहास उठाकर देखो,
सीता वन को गयीं थी
राधा प्रेममयी थी
गार्गी, अपाला को याद करो
रज़िया सुल्तान सा इतिहास रचो
कल्पना, इंदिरा, अरुणिमा को पहचानो,
और तहे-दिल से ये बात मानो
समंदर समंदर ही होता है
नदी नदी ही रहती है
कौन कहता कि नदी समंदर में विलय होकर
अपना अस्तित्व खोती है,
नदी तो अपनी रवानी में बहती है,
गंगा का प्रादुर्भाव धरा पर
भागीरथ के तप से ही हुआ था
और समंदर लंका विजय में
राम के रोष का विषय बना था;
सनस्क्रीन लगाकर खुद को
सन से छुपाती ओ लड़कियों
तुम तो स्तम्भ हो
नाजायज बदलाव की मांग को
आवाज़ मत उठाओ
तुम तो अनन्तिम वेतन आयोग की
खामोश चीत्कार हो
जो बदलता तो महज
एक महकमे की गड्डियों की मोटाई है
पर हर वर्ग पर भारी पड़ती
उसकी अंगड़ाई है।

गुरुवार, 5 जुलाई 2018

हमें मोक्ष चाहिए

अंजलि में
पुष्प और जल सजाकर
गंगा के घाट पर
तर्पण को आओगे न!
मंत्रोच्चार में
कुछ सिसकियाँ भी होंगी
अगर सुन सको तो,
भरकर लाओगे
हमारी अस्थियों का कलश
उसमें वो पल भी रखना
जो हमारे थे,
आज प्रवाहित हो जाने दो
बिना मायने के
समानांतर चल रहे संयोजन को;
इन सबके बीच
तुम्हारे चेहरे पर
एक अलग सा तेज दिखेगा
तुम कर जो रहे होगे न
अंतिम क्रिया के बाद की भी क्रियाएं
मग़र हाँ
दक्षिणा में वो स्नेह रखना न भूलना
जो हमें तुममे एकीकार करता था
हमें मोक्ष चाहिए!!

शनिवार, 23 जून 2018

न तुम जानो न...


सुख मेरी आँखों का 

दुःख मेरे अंतर का 

या तुम जानो 

या मैं जानूँ,

उष्मित होता है जब प्रेम,

पिघलती रहती है 

भावों की बर्फ 

परत दर परत,

तुम बांधते रहते हो 

मन का कोना 

मैं खुलती रहती हूँ 

सवालों की तरह.

एक पहेली ही तो है 

वो पल 

जो तुम जानो 

और मैं जानूँ,

पूर्णता है प्रेम की 

तुम्हे पा लेने में,

एकाकी है मन 

तुम्हे खुद में समां लेने में,

मेरे मन के वृन्दावन में 

क्यों रहते हो हर पल 

तुम ही तुम 

न तुम जानो 

न मैं जानूँ।

इंसाफ

महिला: साहब हमारे मरद ने हमको बेल्ट से बहुत पीटा। इसकी रिपोर्ट लिखिए।

थानेदार: मगर तेरा मरद तो कुर्ता-पायजामा पहनता है।

पति: वही तो हम भी जानना चाहते हैं थानेदार साहब कि हमारी झोपड़ी में बेल्ट आया कैसे?

थानेदार साहब असमंजस में आकर कुर्सी से उठ खड़े हुए। इंसाफ तो ईश्वर के हाथों होना चाहिए क्या आज मेरा ईश्वर मुझे एक गुनहगार के साथ खड़ा कर रहा है?

मेरी पहली पुस्तक

http://www.bookbazooka.com/book-store/badalte-rishto-ka-samikaran-by-roli-abhilasha.php