Coffee with Abhi

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मंगलवार, 11 सितंबर 2018

ऐसे तो रिटायर मत हो बाबूजी

आज बाबूजी उठे नहीं थे
अम्मा काम समेटने में व्यस्त
कि घर थोड़ा सा सही हो जाए
तो उनके नहाने का पानी गर्म करें
बार-बार घड़ी देखतीं
फिर छनकते हुए बर्तन सहसा सम्हालतीं
कहीं नींद न टूट जाए,
रोष तो बस बाबूजी को था
अब क्या?
अम्मा तो यही चाहती ही थीं
कि आज वो सोते रहें
और अपने उनतालीस सालों की
अनवरत थकान मिटा लें,
जिम्मेदारियों की परिधि में घूम-घूम कर
कितने हवाई चप्पलों का तला
गायब ही कर दिया था,
महीने में एक दिन मिलने वाली तनख्वाह
जी पाती थी महज 30 दिनों के
राशन की उम्मीदें
बेटे की पढ़ाई,
बेटी का ब्याह
ये सब तो उस अग्रिम राशि के प्रतीक थे
जिसे गरीबी निवारक 'कर्ज' कहते हैं
जो सपने देखने की अनुमति भर देता है,
सेवानिवृत्ति से पहले कर्ज निवृत्ति हुई
फिर मना था जश्न उस सफर का
जो उनकी मुस्कान थी,
सीधे शब्द और लिबास वाले बाबूजी
दस से पांच और पांच से दस
दो पालियों में जीते रहे
सुबह का शंखनाद
ट्रेन की सीटी
लंच की घण्टी
और पीक आवर का ट्रैफिक जाम
दिनचर्या में फर्क न डाल पाते
अम्मा लंच के डिब्बे के साथ
शाम का सब्जी का थैला देना न भूलतीं
अपने सन होते बालों पर भी
चेहरे की ताजगी सजीव रखते,
कभी अम्मा कहती बाल काले करने को
तो मुस्करा देते,
'तुम भी तो लिपस्टिक के सारे शेड
भूल चुकी हो'
अपनी जोहराजबीं को
आंखों ही आंखों में निहाल कर देते,
जिंदादिली की मिसाल हैं बाबूजी
बहुत इच्छा जताते..
...अभी कुछ दिन और काम करूं..
अम्मा गमले में लगे
पौधों का वास्ता देतीं
'अब तक तो बरगद बनकर छांव दी
अब तुम्हें इस ठौर का होकर रहना है'
........
बोगनविलिया की
अचानक मुरझाई पत्ती को देखकर
अम्मा अंदर भागी...
वो चीखती रही
मगर बाबूजी नहीं उठे!

रविवार, 19 अगस्त 2018

Quote on beti

साँसें छीन ले तू, मेरे पर कुतरने से पहले
खुदाया तेरी ज़मीं पर सियासत बहुत है!


PC: GOOGLE


सोमवार, 13 अगस्त 2018

आहत भारत

नीलाभ छितरे गगन के तले
भावनाओं से बंजर जमीं पर
श्वेत शांति मध्य में समेटे
गति की आभा, केसरिया शौर्य लिए
मैं हूँ विक्षिप्त भारत माता
प्राणवायु मुझे छूकर निकलती है
जल की थाती जीवन का संचार करती है
अरुणाभ से मैं जगती हूँ
श्वेत चाँदनी में खिलती हूँ
प्रेम और वैराग्य से पोषित हूँ
सीप की गोद में खिलकर
हिमालय के मुख में मिलती हूँ
स्वाभिमान का प्रतीक, पर
विक्षिप्तता की दहलीज़ पर हूँ
मेरे पैरों में समृद्धि और स्नेह के
सूचक बना दो
ए जीवन, मेरे आगमन का मंगल गा दो

मेरी पहली पुस्तक

http://www.bookbazooka.com/book-store/badalte-rishto-ka-samikaran-by-roli-abhilasha.php