" ज़िन्दगी, तुम्हारे लिए!

गुरुवार, 5 दिसंबर 2019

प्रेम तो प्रेम है


उस रोज़
जब पतझड़ धुल चुका होगा
अपनी टहनियों को,
पक्षी शीत के प्रकोप से
बंद कर चुके होंगे अपनी रागिनी,
देव कर चुके होंगे पृथ्वी का परिक्रमण,
रवि इतना अलसा चुका होगा
कि सोंख ले देह का विटामिन,
सड़कों पर चल रहा होगा प्रेतों का नृत्य,
लोग दुबके होंगे मोम के खोल में
सरकंडे की आँच पर,
इच्छा उतार कर रख दी गई होगी
घर के आले में,
मोह सूने आंगन को बुहार रहा होगा,
दया क़ैद हुई होगी आँखों के काले कटोरे में,
और प्रेम...हमारे पहरे पर होगा;
उस रोज़ तुम अपनी नैसर्गिक चुप्पी तोड़ोगे
और खिला रहे होगे मिलन की कोपलें
अपने मन के सूने जालों में
...उस रोज़ भी मैं भागी चली आऊँगी
तुम्हारी एक आहट पर
बिना किसी सकुचाहट के,
टाँग कर आऊँगी अपनी हया
बूढ़े पीपल की किसी कोटर में
उसी रोज़...

सोमवार, 2 दिसंबर 2019

लड़की की इच्छा



मैंने बो दी है अपनी इच्छा
'इस समाज में न जीने की'
किसी गहरी मिट्टी के नीचे
क्योंकि ये समाज सुधरने से रहा
और मैं ख़ुद को मार नहीं सकती.
कैसे जियूँ यहाँ तिल-तिल मरकर
हंसने-बोलने पर पाबंदी लगी
पढ़ने जाने पर लगी
बाहर निकलने पर लगी.
जब भी समझाती हूं
बाबा अब सब सही हो गया
फ़िर कोई नई बात हो जाती है;
समझ नहीं आता ये रातें भी
क्यों होती हैं एक लड़की के हिस्से
कभी सूरज वाली रात
कभी भावनाओं वाली
तो कभी दर्द वाली;
यकीन है मुझे
एक दिन सब कुछ ठीक हो जाएगा
तब लौट कर आऊँगी पूरी मैं
मेरी रोपी हुई इच्छा का
पेड़ मजबूत हो चुका होगा तब तक
और सबने उतार लिया होगा उससे
अपनी-अपनी इच्छा का फ़ूल
...तब तक, मैं भटकती रहूँगी
इच्छा रहित आत्मा में
एक ज़िस्म बनकर
हैवानों को बोटी चाहिए
बेटी नहीं.

मंगलवार, 26 नवंबर 2019

मैं दोषी हूँ


मैं दोषी हूँ
उन तमाम गुनाहों की
जो मैंने प्रेम करते हुए किए.
मैं दोषी हूँ
उस प्रेम की भी
जो तुमने महसूस किया.
मैं दोषी हूँ
उन तमाम रातों की
जो तुम्हारे इंतज़ार में गुजारीं.
मैं दोषी हूँ
उस पल की
जब मैंने तुम्हें अच्छा कहा.
मैं दोषी हूँ
उस कल की
जिसमें तुम्हें साथ चाहा था.
मैं दोषी हूँ
उन शब्दों को पढ़ने की
जो तुमने लिखने चाहे.
मैं दोषी हूँ
कि तुम्हारा दर्द
तुमसे बड़ा मुझे दिखा.
मैं दोषी हूँ
सबसे ज़्यादा इस बात की
कि अपना ही दोष दिखा नहीं.

PC: Pinterest

मंगलवार, 19 नवंबर 2019

ओ पुरुष!



ओ पुरुष,
तुम्हें भी भीतर घुटता होगा कहीं
जब तुम अपने होठों पर रख लेते हो
मौन सलाखें;
तुम्हें भी तो प्यारी होगी स्त्री उतनी ही
जितना प्रेम तुम उससे पाते हो
और जब वही स्त्री तुम्हें समझती नहीं होगी
तो मुरझा जाते होगे तुम भी दर्द से
जैसे दूब मुरझा जाती है चटख धूप से,
तुम्हारा मन भी व्याकुल होता होगा
संचित नेह लुटाने को,
तुम भी तो देना चाहते होगे वो स्पर्श
जो राम ने दिया था अहिल्या को,
तुम भी टटोलते होगे न अपनी देह को
और महसूसते होगे वो गंध
जो तुम्हारी स्त्री तुमसे अंतिम बार
लिपटते हुए छोड़ गई थी;

ओ पुरुष बोलो न!
तुम भी तो बनाना चाहते होगे संतुलन
तुम्हारे मन में भी चलता होगा एक कल्पित माध्य
जो आसान करना चाहता होगा असंतुलित समीकरण
तुम भी लिखते-मिटाते होगे बही खाते का हिसाब
उस अबूझी स्त्री की तरह
जो मन में बहुत कुछ रखकर भी
बंद कर लेती है आँखें सच छलकने के डर से;

ओ पुरुष!
थक जाते होगे न तुम कभी-कभी
पुरुष बने हुए,
तुम भी तो कभी स्त्री बनने की इच्छा रखते होगे
जब आह्लादित करती होगी स्त्री की कोमलता;

तुम्हारी उंगलियों के पोरों पर
ये जो अम्लता ठहरी है
इसकी हर बून्द को सांद्र कर दो,
तुम्हारी जिह्वा को सुशोभित कठोर स्वरों को
कोमल व्यंजनों में बदल दो,
ओ पुरुष! तुम्हें स्त्री सा होना भी ग्राह्य है
ये कहकर पुरुषत्व को आकाश भर कर लो.

गुरुवार, 7 नवंबर 2019

प्रेम है प्रेम सा


बहुत गर्माहट देती हैं
शीत ऋतु में तुम्हारी चुप्पियां
जैसे किसी नवजात को माँ ने
अपनी छाती में भींच रखा हो.
एक अरसे के बाद तुम्हारा आना
ऐसे भरता है
हमारी सर्द रातों में गर्मी
जैसे किसी दुधमुँहे के तलवों पर
अभी-अभी की गई हो
गुनगुने सरसों के तेल की मालिश.
छज्जे पर तुम्हारी राह तकते हुए
पहुँचने से पहले ही
किवाड़ खोलने की छटपटाहट
याद दिला ही जाती है
लड़खड़ाते कदमों से बच्चे के आते ही
माँ के अंक में भर लेने की कला.
प्रेम में पगा होता है मेरा हर पल
जब तुम्हें सोचूँ प्रेम उमड़ता है
जब तुम्हें देखूँ प्रेम मचलता है
और जब तुम्हें प्रेम करूँ
प्रेम को भी प्रेम पर गुमान हो उठता है.

Picture Credit: Pexel

बुधवार, 23 अक्टूबर 2019

पहली बार

जब पहली बार निकलो यात्रा पर
तो कुछ भी न रखना साथ
चाकू, घड़ी, छतरी, टिश्यू पेपर, टॉयलेट सोप...
आदि कुछ भी नहीं
कहीं अगर ले लिया
इन सामानों से भरा झोला
तो कंधे थक जाएंगे
और तुम्हें नहीं मिलेगा
सफ़र का भरपूर मज़ा.
मैं भी तैयारी में हूँ
एक अनन्त यात्रा की
जो बिल्कुल पहली बार होगी
और कुछ नहीं होगा साथ
सिवाय तन पर एक सफ़ेद लिबास के...

रविवार, 20 अक्टूबर 2019

कविता का अस्तित्व

PC: Pexel


दिन पर दिन वृहद होती मेरी इच्छाएं
एक दिन मेरी कविताओं का कौमार्य भंग कर देंगी,
उभरते हुए शब्दों के निशीथ महासागर में
गहराई का एक मुहावरा भर बनकर रह जाएंगी
सिर टिकाए हुए भाषा और देह के व्याकरण में
विलुप्त हो रही स्मृतियों में तलाशी जाएंगी
बावजूद भी इसके क्या संभव होगा
कविताओं के जरिए क्रांति लाना
या फ़िर बन जाएँगी वो अघाई हुई औरतें
जिन्हें मतलब औरत जाति से नहीं होता
बल्कि बराबरी का दिवस मनाने मात्र से होता है.
अस्वीकृत होने की कुंठा मन में छुपाए
निकल पड़ेंगी एक अनवरत यात्रा के लिए
जहाँ से लौटकर कोई संदेशा नहीं आता
मौत भी इन्हें देखकर करवट बदल लेती है
और सो जाती है एक बेमौत नींद...
या फ़िर बन जाएंगी आग
और सिमट जाएंगी एक दिन चूल्हे के कोने में,
घरों के ईशान कोण में
जहाँ आज भी धूप की सुगंध नथुने तर करती है;
कविताओं का अस्तित्व तलाशने की इच्छा
रचती रहेगी नई कविताएँ
और उगाती रहेगी
विलुप्ति के जड़ पर उग रहे अस्तित्व के कैक्टस.

मेरी पहली पुस्तक

http://www.bookbazooka.com/book-store/badalte-rishto-ka-samikaran-by-roli-abhilasha.php