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शनिवार, 11 सितंबर 2021

प्रेम का संत्रास

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तुम्हारी चुप्पियों का विस्तारित आकाश

भर देता है मुझे दर्द के नक्षत्रों से

आकाश गंगा की समग्रता

भंग करती है मेरी एकाग्रता और

पैदा करती है मुझमें एक नयी चौंक

बात-बात पर इतनी सजग तो कभी न हुई मैं

मैंने देवदार के पत्तों पर भी

अपना मन भर आहार जिया है

मैं रखना चाहती हूँ उस पर अपना बड़बोलापन

कितनी भी प्रेम की गागर भर लूँ मन में

थाह गहरी तो तुम्हारे मौन की रही है सदैव

भुला दी हैं तुमने मुझे वायुमंडल की समस्त भाषाएँ

रात्रि की मेरुदंड पर अधाधुंध दर्द लिखती हूँ

क्यों देखते हो तुम उसे कलंक

मैं सोना चाहती हूँ मृत्यु की एक पूरी नींद

तुम जागकर भटकते रहते हो मुझमें

इतना कि बन जाते हो मेरी सुबहों का मंगल

मैं औषधि का प्याला बढ़ाती हूँ तुम्हारी ओर

तृप्त होऊँ तुम्हें पीते देखकर और

ले लूँ चुम्बन तुम्हारे अधरों का

अमरत्व चखना है मुझे सृष्टि का

तुम्हारे होने तक उत्सव मना सकूँ मैं भी.

तुम्हारे मन का गृहस्थ मौन है न

और मेरे मन का सन्यास, मोह भर उपजी पीड़ा.

बुधवार, 8 सितंबर 2021

प्रेम में जोगिया

 न मिले सात सुर

न सप्तपदी हुई

साँस प्रेम की

हर साँस ठहरी रही


सुमिरन करुँ

प्रेम में मैं प्रवासी

मन को पाषाण

कर देह सन्यासी


जोगिया मुझसे मिलना

जब मिले देह काशी

घाट मणिकर्णिका

क्लांत पथ कोस चौरासी

रविवार, 5 सितंबर 2021

आग-- द हीरो ऑफ अन हीरोइक थॉट्स: 3

अब इसे कोरापुट के फिल्मांकन का असर ही कहेंगे कि "मल्हारा" के बहाने सभी अपनी भावनाओं को खंगाल रहे हैं. कौन कहता कि समय के साथ प्रेम मुरझा जाता है ये तो और प्रगाढ़ हो जाता है. प्रेमी हमारा मल्हारा बन जाता है, हृदय का प्रीत राग झंकृत होता है जब उसकी आमद होती है. उस नेह को चूमने अकुलाई बारिश की बूँदे आकर गले लगती हैं.

इस प्रीत राग को शब्द दिए हैं, शब्दों के जादूगर अनूप कमल अग्रवाल "आग" ने. विश्वास नहीं होता कि बरखा और आग का संगम अनवरत चलेगा. लेकिन ये प्रयोग सफल रहा है ये इस गीत की चढ़ती लोकप्रियता बता रही है.

कविराज को गीतकार बनने की बधाई एवं अनन्त शुभकामनाएं!

शनिवार, 4 सितंबर 2021

प्रेम में एकलव्य

 मैंने कभी नहीं सोचा था

मेरे भीतर प्रेम का एकलव्य सर उठायेगा

और मैं तुम्हें सौंपती रहूँगी अपना वादा

फिर एक दिन तुमने कुछ नहीं कहा

और तमाम दिन बीतते रहे

तुमने देने बन्द कर दिए शब्दों के शर

प्रेम में पूर्णता को आहुत होने

मैं तुम्हारे प्रेम की मूर्ति पूजती रही

तुम्हें अपना गुरु मानकर;

नियति ने तुम्हारे मौन को खण्डित किया

"प्रेम में उर्ध्वगामी बनना होगा तुम्हें

तुम मुझसे भी आगे बढ़ो" तुम्हारे आशीर्वचन

मेरा छिन्न-भिन्न 'मैं' आज तक न समझा

कि प्रेम में पुरस्कृत हूँ या तिरस्कृत!

एक बार फिर लोगों ने मुझमें एक नए

एकलव्य को जन्म दिया, ये कहकर

कि गुरु ने दक्षिणा में प्रेम ही ले लिया...

सिगरेट चुम्बन है

 हर रात वो

लाइटर की आग से

जलाती है

कागज़ के चंद टुकड़े

और अपने मन को

समझाती है अक्सर

कि उसने जला दी अपनी

अंतिम प्रेम कविता भी;

देर तक काले टुकड़े

हवा में तैरते हैं

और उसे टीसते हैं

सिगरेट से भीगे होंठ.

मंगलवार, 31 अगस्त 2021

लिख दिया

 रेत रेत लिख दिया

देह खेत लिख दिया

उँगलियाँ कलम हुईं

श्याम श्वेत लिख दिया


तार तार मन को जब

प्यार प्यार लिख दिया

दिल के ज़ख़्म में भी

तूने शहरयार लिख दिया


धानी, लहू को करके

दिन का उतार लिख दिया

इतना दिया प्यार तुमने

के कर्जदार लिख दिया

शनिवार, 28 अगस्त 2021

प्रियतम को पहली पाती

बार-बार अधरों की लाली
शर्माती और सकुचाती,
नेह निचोड़ लिखी जब हिय से
प्रियतम को पहली पाती:

मैं अक्षर सारे भूल गयी
संकेत ही बिम्ब बने मन के,
अरज कोई और भावे न
जब बोल बने बसन तन के,
उनके संग को ढूंढ रही
उन ढाई आखर की थाती,
फिर सारा प्रेम उड़ेल लिखी
प्रियतम को पहली पाती:

काया गोकुल मन वृंदावन,
तिरछी मुस्कान है मनभावन,
अँखियाँ बन्द करूँ दिखते
बस उनके नयन लुभावन,
आभा उनकी जिनसे सुंदर
उस चाँद को देखके हर्षाती,
किरणों को कलम बनाय लिखी
प्रियतम को पहली पाती.

मेरी पहली पुस्तक

http://www.bookbazooka.com/book-store/badalte-rishto-ka-samikaran-by-roli-abhilasha.php