" ज़िन्दगी, तुम्हारे लिए!: अगस्त 2017

गुरुवार, 31 अगस्त 2017

तुम्हारे शब्द!

हमने रातों के जुगनुओं से रोशनी लेकर
तुम्हारी स्याही को अपनी कलम से
शब्दों में पिरोया है,
अब इन शब्दों से वफ़ा हमें
ताउम्र निभानी है।
ये खाली शब्द होते तो
सो जाते कविता में ढलकर
मगर ये तो हमें रातों को जगाते हैं,
तुम्हारे पास होने का
अहसास कराते हैं,
हमारे आँसुओ से लिपट जाते हैं,
जब सारा जहां रात की रंगीनियों में
खोया सा है,
सारा आलम तुम्हारे साथ सोया सा है,
हमारे भीतर की हौले से
सिहरन बढ़ाते हैं,
तुम न हो बस तुम्हारे दिए
ये शब्द नज़र आते हैं।

सोमवार, 28 अगस्त 2017

ऐसी है मेरी वो!

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 वो दिन से लम्हे, चेहरे से नूर
और कभी-कभी तो
मुँह से बातें भी चुराती है
ऐसी है मेरी वो!
मुझे मेरे नाम से बिंदास बुलाती है,
कुछ ग़लत मेरे नाम का
सुनती है न सुनाती है;
मुझको तो वो सौ बार मनाती है
मगर खुद भी रूठ जाती है;
उसके झगड़ने की अदा उफ्फ!
सौ प्रश्नों की सूची बनाती है,
उत्तर एक का भी नहीं पाती है,
मेरी शिकायतों पर हैरान
थोड़े से ही परेशान,
मेरे लिए तो खुद को भी सताती है,
ऐसी है मेरी वो!
दुनिया की कोई बात उसे अच्छी न लगे,
मेरे बगैर कोई रात उसे अच्छी न लगे,
कहती है इस दिल की तरह
तुम्हारा हर दिन भी तो मेरा है,
मेरे बगैर धूप-छांव बरसात उसे अच्छी न लगे,
मुझसे मुतमईन हर दुनिया कविता में सजाती है,
ऐसी है मेरी वो!
मेरी आँखों की खुशी पढ़ती है
अपने आंसुओं का दर्द छुपाकर,
जीती है संग मेरे हर पल
बिना रिश्ते के हर बन्धन निभाकर,
मैं कहीं छुपना भी चाहूँ
किस कदर रोती है मुझको बुलाकर,
वो जंगली बिल्ली है मेरी,
प्यारी है मुझे भी तो,
दुलारती है मेरे वजूद को सीने से लगाकर,
ऐसी है मेरी वो!

रविवार, 27 अगस्त 2017

कहाँ हो तुम?

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सुनो, सुन रहे हो न!
हमें पल-पल ऐसा क्यों लगता है
कि तुम हमें सुनना नहीं चाहते
तभी तो कर रहे हो न अनसुना;
देखो न! इंतज़ार की रंगत
गुलाबी से नीली हो गयी,
आँखे पीली सी थीं ही गीली हो गयी;
हम खुद से खुद में मथे जा रहे
और तुम हो कि!!!
तुम्हे जो सुख सड़क के कोलाहल,
गाड़ियों के सायरन से मिलता है
हमें डोर बेल में:
तुम्हे प्रतीक्षालय भाता है
और हमे तुम्हारे इंतज़ार में घर का द्वार
आओ न, बस चाय पियेंगे साथ
एक प्याली चाय
जो तुम एक बार में ही उतार लोगे
हलक से नीचे
और हम घूँट-घूँट में
तुम्हारा रसास्वादन करेंगे,
लम्हा-लम्हा तुम्हारे होने का अहसास जियेंगे,
आओ न कि समय ने
खुरच दी हैं दर्द की गहरी लकीरें,
एक शाम का मरहम
तुम्हारे मन की उंगलियों से
हमारे दर्द की हर नब्ज़ पर रखने
बोलो कब आओगे?
कहीं तुम्हारा आना
हमारे खुशी की मरीचिका तो नहीं??

गुरुवार, 24 अगस्त 2017

माँ

बारिश, जुगनू, गुड़िया,
देखा फिर होश कहाँ,
रंग, तितली, फूल, हवा,
अब ये ही मेरी दुनिया।
नन्हीं आँखे, नन्हें सपने,
बस देखे है तेरी मुनिया।
कोई और भाए न मुझे,
मेरा जीवन तो तू है माँ।

सोमवार, 21 अगस्त 2017

स्त्री या सुनामी!

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सुनो, तुम दिन भर खटती रहती हो
घुँघरू की ताल पर नाचती हुई
सबके लिए फिक्रमंद
जरूरतों के मुताबिक
थोड़ा-थोड़ा जीती हो,
कभी घर के हिसाब में,
कभी बच्चों की तकरार में,
कभी माँ-बाबूजी की अवस्था
को समझने में
खुद भी उलझ जाती हो,
घर के राशन से दवाई तक
रिश्ते-नातों से लेकर
बच्चों की पढ़ाई तक,
समाज, घराना, मित्र व्यवहार
सबमें इतनी सजग
जैसे समर्पण की देवी हो,
सबको अपना बना लेती हो,
हथेलियों से छांव करने को आतुर,
बस नेह के लिए बनी हो,
चेहरे पर बसी पुरकशिश मुस्कान
सारे रहस्य छुपा लेती है,
कभी तो थकती होगी,
कुछ तो दुखता होगा,
कोई तो शिकायत होगी,
कितनी सहजता से पीती हो
दर्द का विष
जैसे योगी ने हिमालय पे पिया था;
हजार आशनाओ में लिपटी वो मादकता,
आज भी यौवन की हथेली पर
ओस की बूँद सी दिखती है:
दिन की टिक-टिक पर थिरक कर भी
ऐसे सजाती हो मेरी रातों को
कि हर रात निखर जाती है
सुहागरात में;
तुम्हारी हर छुअन पहले स्पर्श जैसी,
वही कोमलता
जो रग-रग में स्रावित होती है,
मेरे हर आग्रह पर आज भी
उतनी ही समर्पित
तुम्हारा उद्वेग
मेरे आवेश को समा लेता है,
तुम जीती रहती हो मुझे बूँद-बूँद
मेरे स्खलित होने तक;
मैं निढ़ाल हो जाता हूँ
तुम फिर भी सजग रहती हो
जीवन के जतन में,
जितना मैं दिन और रात में जीता हूँ,
तुम जीती रहती हो पल-पल,
रात्रि की कोमलांगना
दिन की अष्टभुजी बन जाती हो,
वाह, क्या बात है तुममें
स्त्री हो या सुनामी!
जहाँ भी रहती हो,
लहरों की तरह
बस तुम ही तुम रहती हो।

शुक्रवार, 18 अगस्त 2017

इंद्रधनुष

सुनो, आज धूप है और बारिश भी
तुम भी आ जाओ न;
क्यों अकेला छोड़ते हो ख़ामख़ा हमको,
हम नहीं होंगे तुम्हे सताएगा कौन,
तुम्हारे बग़ैर हमें मनाएगा कौन?
जानते हो न तुम हमारी जरूरत नहीं
इस दिल की ज़ीनत हो,
हमारी बेवजह ज़िन्दगी का
साजो-सामान हो तुम,
अब ज़िद के शामियाने में कितनी देर ठहरोगे?
लाल महावर हमारे पाँवों की धूमिल हो चली,
होंठो की गुलाबी रंगत फीकी पड़ रही,
कजरारी आँखे सुर्ख हो गयी,
बारिश थमने को, धूप उतरने को है,
एक इंद्रधनुष आकाश में खिलने को है,
दूजा हमारे मन में कब खिलाओगे,
आओ न कि हर घड़ी इंतज़ार में है,
हर नज़र तुम्हारे दीदार में है,
हम अपने आँचल की चंवर लिए बैठे
झलक अपने होने की कब दिखाओगे?

बुधवार, 16 अगस्त 2017

मेरा मन तुम्हारा हुआ!

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याद है अब भी मुझे
तुम्हारा होना पल-पल यहाँ,
जैसे धूप में छतरी कर रहा था
तुम्हारा स्पर्श,
बातों की स्नेहिल बयार में
बही जा रही थी मैं,
तुम्हारा खुलकर हँसना,
जी भरकर बोलना,
अनवरत क्षितिज की तरफ
मेरे होने की गवाही ढूंढना,
गोया मेरा कोई बिम्ब वहां उभर रहा हो,
मेरा होना तो उस शून्य की तरह था
जो तुममें डूबा हुआ था,
एकटक जमीन को भेदती मेरी नज़र
तुम्हें सिर्फ तुम्हें देख रही थी।
स्पर्श को मचलती मेरी मादकता
उस रोज़ तुम्हारे उन्माद से टकरा रही थी;
जैसे यौवन नाच उठेगा
तुम्हारी पाकीज़गी से गले लगने को,
प्रेम भी था हममें, आकर्षण भी था,
मेरा होना भी था उस पल में,
तुम्हारी मौजूदगी भी थी;
जाने क्यों शाम की आंख लग गयी,
वो दिन भी ढल गया,
तुम ख़्वाबों वाली रात का आसरा देकर
मेरी मुस्कान समेटे चले गए:
सुनो,
वो रोज जो तुमने दिया था मुझे
उस रोज की तरह
आओ न आज फिर
उम्मीदों की दहलीज़ पर एक दिया जलाने।
ऐसा लगता है मेरा मन
तुम्हे खो रहा है;
सुन रहे हो आओगे न!

शुक्रवार, 11 अगस्त 2017

तुम हो इस पल!

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एक अजीब सी घुटन हो रही मेरे भीतर
जैसे तुम मेरे शब्दों से बंधकर रह गए हो,
महसूसती हूँ तुम्हें अपने बहुत पास,
हाथ बढ़ाती हूँ तुम्हें छूने को;
तुम मुस्कराते हो,
कहते हो,
'कदम भी तो बढ़ाओ'
और मैं कदम-दर-कदम
सफर तय करती जा रही हूँ।
ये तो वो मुकाम है
जिसे लोग ज़िंदगी कहते हैं;
इसमें तुम कहाँ हो?
मुझे तो तुम्हारा होना
अपनापन लगता है बस,
बाकी सब तिलिस्म की दीवारें हैं
अजनबी आहटें हैं यहाँ,
आओ न एक रोज
कुछ देर ठहरो
बादलों के बिम्ब पर,
मैं अपनी देह की ऊष्मा गलाकर
स्याही बनाना चाहती हूँ,
इस रूहानी मिलन की बेला में
मेरे लरजते होठों को इतना शान्त कर दो
कि भीतर की ऊर्जा का आकाश
कलम की लेखनी सोखकर अमर कर दे
मेरे उन्माद भरे शब्दों को,
कम न पड़ने दो मेरे आवेग को,
मैं जीती रहना चाहती हूँ
स्नेह से पगे इस आकर्षण में,
तुम्हारे होने के इस पल में।

रविवार, 6 अगस्त 2017

Be with me ever, no alternate.

The addition of two words
Ash+Sha=Asha, makes me perfect.
Abhilasha
I'm really owed to God to bless me wonder of the universe. I dedicate whole journey both of my pillars. If first one is Generator, second one is Observer then obviously me Destructor but they accepted me as I'm. I famished for nothing because they are with me. They stood beside before I stumble. They are the reason if I came to know my worth. I have no words of gratitude coz they are on extreme.
I'm really destined having them.
Be with me ever, no alternate.


शुक्रवार, 4 अगस्त 2017

मेरा पुनर्जन्म

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सुनो,
आज की रात
चाँद जमीन पर उतारकर भी करना!
जब अहसासों की जुम्बिश
निंदिया की हथेली पर
धीरे-धीरे करवट लेगी
तो तारे अपनी नींद भर सोएंगे,
मैं तुम्हारे पहलू में रात भर
भोर की राह तकुंगी।
अपने जीवन के प्रलय को
तुम्हारे सृजन के क्षणों से धोती रहूँगी।
आज की रात
तुम्हारे देह की उष्णता से
हुई बूंदों का स्खलन
मेरे भीतर का बीज प्रस्फुटित कर चुका है,
अब वो ऋतु नहीं होगी कुछ माह
मेरे अंतर में होता रहेगा
मेरा ही पुनर्जनम।

बुधवार, 2 अगस्त 2017

मनुहार की हथेली

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सुनो
अब इतनी भी खामोशी
अच्छी नहीं होती,
ये झूठमूठ का अनशन क्यों?
देखो न ये शब्द
सुहागरात को मचल रहे हैं,
और तुमने तो
कलेवा भी नहीं किया,
इन्हें इनके हक़ का दे दो,
अब हम खाली शब्दों से
नहीं मानने वाले,
हमें तो खुशी की पलक पर
उम्मीद का दिया जलाना है,
रात की रानी को
तुम्हारी हँसी से सजाना है,
आओ न
मनुहार की हथेली पर
हां की हल्दी का टीका करो
और
नज़रों के अक्षत से
इस सेज का श्रीगणेश।

मंगलवार, 1 अगस्त 2017

वक्रीय दुश्वारियां


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वो हर रास्ता तय करता गया
ये समझे बगैर
कि उसका हर कदम उल्टा है,
जीवन की बारीकियों में उलझा रहा,
मोटी रेखाएं उसके चारों ओर
त्रिभुज की तरह अड़ गईं,
घेरा तो हर ओर से आच्छादित था
मगर उसने
एक रेखा उठाकर राह बनानी चाही,
समानांतर क्रम टूटा
और राह बनी रेखा पर
समय की वीभत्स दुश्वारियां
360° में नियत हो गईं।

गुनाह

उसने प्यार को गुनाह बताकर
अपने सिरहाने
मगर तकिये के नीचे रखा,
आंखों से रिसते हुए आँसू
उस गुनाह की स्याही को
बूंद-बूंद धोते रहेंगें
और वो तिल-तिल
कसमसाता रहेगा।
उस पाकीज़गी को
गुनाह बनाने में
वो भी तो गुनहगार था
लम्हा दर लम्हा।
कल की सुबह भी
उस गुनाह की स्याही
ज्यों की त्यों मिलेगी
क्योंकि
आंख से रिसने वाली हर बून्द
तकिये के अहम को
भेद नहीं पाएगी
गुनाह और संवर जाएगा।

मेरी पहली पुस्तक

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