Coffee with Abhi

Buy Me a Coffee

रविवार, 18 फ़रवरी 2018

कहीं भी रहूँ मैं

मैं
तिनके-तिनके से बने
घर में रहूँ,
या
गुम्बदनुमा महलों में
संवर के रहूँ,
हे प्रभु!
इस तरह तराशना मेरे मन को
सिमट जाऊँ दर्द में
खुशी में बिखर के रहूँ,
चलूँ मैं जिधर
रास्ते नेक हों
हाथ काँटों का थामूं
पग में चुभते अनेक हों,
औरों की राह में
फूल ही मैं बनूँ
भले खुद
मैं गम के सहर में रहूँ।

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मेरी पहली पुस्तक

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