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रविवार, 27 अगस्त 2017

कहाँ हो तुम?

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सुनो, सुन रहे हो न!
हमें पल-पल ऐसा क्यों लगता है
कि तुम हमें सुनना नहीं चाहते
तभी तो कर रहे हो न अनसुना;
देखो न! इंतज़ार की रंगत
गुलाबी से नीली हो गयी,
आँखे पीली सी थीं ही गीली हो गयी;
हम खुद से खुद में मथे जा रहे
और तुम हो कि!!!
तुम्हे जो सुख सड़क के कोलाहल,
गाड़ियों के सायरन से मिलता है
हमें डोर बेल में:
तुम्हे प्रतीक्षालय भाता है
और हमे तुम्हारे इंतज़ार में घर का द्वार
आओ न, बस चाय पियेंगे साथ
एक प्याली चाय
जो तुम एक बार में ही उतार लोगे
हलक से नीचे
और हम घूँट-घूँट में
तुम्हारा रसास्वादन करेंगे,
लम्हा-लम्हा तुम्हारे होने का अहसास जियेंगे,
आओ न कि समय ने
खुरच दी हैं दर्द की गहरी लकीरें,
एक शाम का मरहम
तुम्हारे मन की उंगलियों से
हमारे दर्द की हर नब्ज़ पर रखने
बोलो कब आओगे?
कहीं तुम्हारा आना
हमारे खुशी की मरीचिका तो नहीं??

गुरुवार, 24 अगस्त 2017

माँ

बारिश, जुगनू, गुड़िया,
देखा फिर होश कहाँ,
रंग, तितली, फूल, हवा,
अब ये ही मेरी दुनिया।
नन्हीं आँखे, नन्हें सपने,
बस देखे है तेरी मुनिया।
कोई और भाए न मुझे,
मेरा जीवन तो तू है माँ।

सोमवार, 21 अगस्त 2017

स्त्री या सुनामी!

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सुनो, तुम दिन भर खटती रहती हो
घुँघरू की ताल पर नाचती हुई
सबके लिए फिक्रमंद
जरूरतों के मुताबिक
थोड़ा-थोड़ा जीती हो,
कभी घर के हिसाब में,
कभी बच्चों की तकरार में,
कभी माँ-बाबूजी की अवस्था
को समझने में
खुद भी उलझ जाती हो,
घर के राशन से दवाई तक
रिश्ते-नातों से लेकर
बच्चों की पढ़ाई तक,
समाज, घराना, मित्र व्यवहार
सबमें इतनी सजग
जैसे समर्पण की देवी हो,
सबको अपना बना लेती हो,
हथेलियों से छांव करने को आतुर,
बस नेह के लिए बनी हो,
चेहरे पर बसी पुरकशिश मुस्कान
सारे रहस्य छुपा लेती है,
कभी तो थकती होगी,
कुछ तो दुखता होगा,
कोई तो शिकायत होगी,
कितनी सहजता से पीती हो
दर्द का विष
जैसे योगी ने हिमालय पे पिया था;
हजार आशनाओ में लिपटी वो मादकता,
आज भी यौवन की हथेली पर
ओस की बूँद सी दिखती है:
दिन की टिक-टिक पर थिरक कर भी
ऐसे सजाती हो मेरी रातों को
कि हर रात निखर जाती है
सुहागरात में;
तुम्हारी हर छुअन पहले स्पर्श जैसी,
वही कोमलता
जो रग-रग में स्रावित होती है,
मेरे हर आग्रह पर आज भी
उतनी ही समर्पित
तुम्हारा उद्वेग
मेरे आवेश को समा लेता है,
तुम जीती रहती हो मुझे बूँद-बूँद
मेरे स्खलित होने तक;
मैं निढ़ाल हो जाता हूँ
तुम फिर भी सजग रहती हो
जीवन के जतन में,
जितना मैं दिन और रात में जीता हूँ,
तुम जीती रहती हो पल-पल,
रात्रि की कोमलांगना
दिन की अष्टभुजी बन जाती हो,
वाह, क्या बात है तुममें
स्त्री हो या सुनामी!
जहाँ भी रहती हो,
लहरों की तरह
बस तुम ही तुम रहती हो।

शुक्रवार, 18 अगस्त 2017

इंद्रधनुष

सुनो, आज धूप है और बारिश भी
तुम भी आ जाओ न;
क्यों अकेला छोड़ते हो ख़ामख़ा हमको,
हम नहीं होंगे तुम्हे सताएगा कौन,
तुम्हारे बग़ैर हमें मनाएगा कौन?
जानते हो न तुम हमारी जरूरत नहीं
इस दिल की ज़ीनत हो,
हमारी बेवजह ज़िन्दगी का
साजो-सामान हो तुम,
अब ज़िद के शामियाने में कितनी देर ठहरोगे?
लाल महावर हमारे पाँवों की धूमिल हो चली,
होंठो की गुलाबी रंगत फीकी पड़ रही,
कजरारी आँखे सुर्ख हो गयी,
बारिश थमने को, धूप उतरने को है,
एक इंद्रधनुष आकाश में खिलने को है,
दूजा हमारे मन में कब खिलाओगे,
आओ न कि हर घड़ी इंतज़ार में है,
हर नज़र तुम्हारे दीदार में है,
हम अपने आँचल की चंवर लिए बैठे
झलक अपने होने की कब दिखाओगे?

बुधवार, 16 अगस्त 2017

मेरा मन तुम्हारा हुआ!

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याद है अब भी मुझे
तुम्हारा होना पल-पल यहाँ,
जैसे धूप में छतरी कर रहा था
तुम्हारा स्पर्श,
बातों की स्नेहिल बयार में
बही जा रही थी मैं,
तुम्हारा खुलकर हँसना,
जी भरकर बोलना,
अनवरत क्षितिज की तरफ
मेरे होने की गवाही ढूंढना,
गोया मेरा कोई बिम्ब वहां उभर रहा हो,
मेरा होना तो उस शून्य की तरह था
जो तुममें डूबा हुआ था,
एकटक जमीन को भेदती मेरी नज़र
तुम्हें सिर्फ तुम्हें देख रही थी।
स्पर्श को मचलती मेरी मादकता
उस रोज़ तुम्हारे उन्माद से टकरा रही थी;
जैसे यौवन नाच उठेगा
तुम्हारी पाकीज़गी से गले लगने को,
प्रेम भी था हममें, आकर्षण भी था,
मेरा होना भी था उस पल में,
तुम्हारी मौजूदगी भी थी;
जाने क्यों शाम की आंख लग गयी,
वो दिन भी ढल गया,
तुम ख़्वाबों वाली रात का आसरा देकर
मेरी मुस्कान समेटे चले गए:
सुनो,
वो रोज जो तुमने दिया था मुझे
उस रोज की तरह
आओ न आज फिर
उम्मीदों की दहलीज़ पर एक दिया जलाने।
ऐसा लगता है मेरा मन
तुम्हे खो रहा है;
सुन रहे हो आओगे न!

मेरी पहली पुस्तक

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