" ज़िन्दगी, तुम्हारे लिए!

मंगलवार, 19 अक्टूबर 2021

तुम शशि हो शरद के

 


व्रत हुआ कोजागिरी का

और देवों के प्रणय का हार

महारास की बेला अप्रतिम

मैं अपने मन के शशि द्वार

तुम शरद हो ऋतुओं में

तुम हो मन के मेघ मल्हार

चंद्रमा कह दूँ तुम्हें तो

और भी छाए निखार

तुम स्नेह की कण-कण सुधा हो

मद भरी वासन्ती बयार

पीत जब नाचा धरा पर

हुआ समय बन दर्शन तैयार

शुक्रवार, 15 अक्टूबर 2021

मेदिनी

 

तुम्हारी नर्म-गर्म हथेलियों के बीच खिला पुष्प

और भी खिल जाता है, जब

विटामिन ई से भरपूर चेहरे वाली तुम्हारी स्मित

इसे अपलक निहारती है

तुम्हारा कहीं भी खिलखिलाकर हँसना

मेरे आसपास आभासित तुम्हारे हर शब्द को

तुम्हारी गंध दे जाता है... महका जाता है

कण कण में तुम्हारा होना.

वही तो करते हो तुम जो अब तक करते आये

बना देते हो चंदन अपने शब्दों को

यही है मेरी औषधि, ये शब्द

डाल देते हैं मेरे चिन्मय मन पर डाह की फूँक

शाँत करने को मेरे मन के सारे भाव...

तत्क्षण मेरा मन वात्सल्य में डूब जाता है

झूम उठती है मेरे मन की मेदिनी

तुम्हारा पग चूमने को...


गुरुवार, 14 अक्टूबर 2021

रावण बनाम रावण

 

"माँ, आज के समय में राम तो नहीं होते न?" दशहरे का मेला देखकर लौटी मेरी बेटी चीखते हुए बोली.


उसके इस प्रश्न पर हतप्रभ सी खड़ी मैं बिस्तर पर चौड़े पड़े शराबी और अधमी पति को एकटक देखती रही. कितने पक्षपाती हो जाते हैं हम जब बात अपनों पर आ जाती है. ये प्रेम का कैसा रूप है!

सबके अन्तस् एक दशानन


स्वयं के अन्तस् रावण अटल

घात लगाए स्वयं की हर पल

मुझको दर्पण बन, जो मिला

वही विजित है मेरा स्वर कल


नयन में राम तो पग में शूल हैं

हर शबरी के हिय हूक मूल है

हुआ आँचल माँ का तार-तार

बहने दो निनाद, भाव कोमल


कौन कहे कि हर सत्य राम है

कहीं दशानन भी, सत नाम है

नाम नहीं अब दहन करो तम,

गर्व और पाखंड का अस्ताचल

शनिवार, 11 सितंबर 2021

प्रेम का संत्रास

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तुम्हारी चुप्पियों का विस्तारित आकाश

भर देता है मुझे दर्द के नक्षत्रों से

आकाश गंगा की समग्रता

भंग करती है मेरी एकाग्रता और

पैदा करती है मुझमें एक नयी चौंक

बात-बात पर इतनी सजग तो कभी न हुई मैं

मैंने देवदार के पत्तों पर भी

अपना मन भर आहार जिया है

मैं रखना चाहती हूँ उस पर अपना बड़बोलापन

कितनी भी प्रेम की गागर भर लूँ मन में

थाह गहरी तो तुम्हारे मौन की रही है सदैव

भुला दी हैं तुमने मुझे वायुमंडल की समस्त भाषाएँ

रात्रि की मेरुदंड पर अधाधुंध दर्द लिखती हूँ

क्यों देखते हो तुम उसे कलंक

मैं सोना चाहती हूँ मृत्यु की एक पूरी नींद

तुम जागकर भटकते रहते हो मुझमें

इतना कि बन जाते हो मेरी सुबहों का मंगल

मैं औषधि का प्याला बढ़ाती हूँ तुम्हारी ओर

तृप्त होऊँ तुम्हें पीते देखकर और

ले लूँ चुम्बन तुम्हारे अधरों का

अमरत्व चखना है मुझे सृष्टि का

तुम्हारे होने तक उत्सव मना सकूँ मैं भी.

तुम्हारे मन का गृहस्थ मौन है न

और मेरे मन का सन्यास, मोह भर उपजी पीड़ा.

बुधवार, 8 सितंबर 2021

प्रेम में जोगिया

 न मिले सात सुर

न सप्तपदी हुई

साँस प्रेम की

हर साँस ठहरी रही


सुमिरन करुँ

प्रेम में मैं प्रवासी

मन को पाषाण

कर देह सन्यासी


जोगिया मुझसे मिलना

जब मिले देह काशी

घाट मणिकर्णिका

क्लांत पथ कोस चौरासी

रविवार, 5 सितंबर 2021

आग-- द हीरो ऑफ अन हीरोइक थॉट्स: 3

अब इसे कोरापुट के फिल्मांकन का असर ही कहेंगे कि "मल्हारा" के बहाने सभी अपनी भावनाओं को खंगाल रहे हैं. कौन कहता कि समय के साथ प्रेम मुरझा जाता है ये तो और प्रगाढ़ हो जाता है. प्रेमी हमारा मल्हारा बन जाता है, हृदय का प्रीत राग झंकृत होता है जब उसकी आमद होती है. उस नेह को चूमने अकुलाई बारिश की बूँदे आकर गले लगती हैं.

इस प्रीत राग को शब्द दिए हैं, शब्दों के जादूगर अनूप कमल अग्रवाल "आग" ने. विश्वास नहीं होता कि बरखा और आग का संगम अनवरत चलेगा. लेकिन ये प्रयोग सफल रहा है ये इस गीत की चढ़ती लोकप्रियता बता रही है.

कविराज को गीतकार बनने की बधाई एवं अनन्त शुभकामनाएं!

मेरी पहली पुस्तक

http://www.bookbazooka.com/book-store/badalte-rishto-ka-samikaran-by-roli-abhilasha.php