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प्रिय को पत्र

साथिया....
स्याह रात की सर्द चाँदनी में अनमने से बैठे थे हम, कुहासे के द्वार पर तुम्हारी दस्तक हुई। उद्देश्यहीन जीवन में सपने कुलाँचें भरने लगे। झिलमिल सितारों के बीच तुम्हारा आना उजालों के साथ मधुरता भी घोल गया। जीवन के सारे रंगों से परिचित थे हम पर किसी अजनबी के प्रति स्नेह समर्पण जैसे भाव से अनभिज्ञ भी। यौवन की दहलीज पर खड़े थे। घोड़े पर राजकुमार के आने की बहुत सी कहानियां सुन रखी थीं हमने पर तुम वही राजकुमार हो ये तो सोचा ही नहीं। 
हम दुनियावी बातों में सहजता से विश्वास नहीं करते हैं पर हमारा मन क्या कहता है उसे कभी झुठलाते नहीं। तुम्हें हमारे मन ने देखा, समझा और जाना बस इतना ही बहुत था कि हम तुम्हें जितना ही चाहते हैं वो कम लगता है। साथी तो इस दुनिया में बहुत मिलते हैं, साथ भी मिल जाता है पर मन का साथिया किसी को ही मिलता है। तुम त्याग, प्रेम, स्नेह, सहजता..... की मूरत लगे हमे। हम अपने प्रेम की छांव में ऐसे चल पड़े जैसे तूफान में कोई मुट्ठी में घास थामकर सहारा लेता है। हम प्रेम की छांव का अनुभव करने लगे और तुम हमारे रास्ते मे आने वाली कठिनाइयों का। हम तुम्हारे संग घूँट-घूँट सुधारस पान कर रहे थे। तुम्हारी हथेलियों को स्पर्श करते ही हम ऊष्मा से भर जाते थे। जब अपनी मुट्ठी में जकड़ते थे हमारी हथेलियाँ, स्पंदन से भर जाता था मन। 
हम निरन्तर प्रेम की पगडंडी पर बढ़ रहे थे पर ये आभास भी था कि हमारी मंजिल अलग है। तुम हमारी राह के साथी थे जब तक साथ हैं मन, वचन, कर्म और स्नेह से तुम्हारे हैं। जब अलग होंगे हमारे प्रेम का चिर-यौवन प्रस्फुटित होगा और हम पहले से भी कहीं अधिक अपनेपन से बस तुम्हारे रहेंगे। हमारे लिए  प्रेम ईश्वर है। तुम जितने कहीं बाहर हो उससे कई गुना अधिक हमारे भीतर हो। हम नहीं चाहते तुम अपनी दुनिया में हमें सम्मिलित करो पर तुम हमारी दुनिया हो ये कहने के अधिकार से हमें वंचित न करो। तुम तो हमारे रोम-रोम में हो, कण-कण में तुम्हीं दिखते हो। हमने जब से तुम्हें जाना, समय मौसम, काल का अनुभव नहीं। तुम हँसते हो तो दिन है, तुम्हारी उदासी रात लगती है हमें। 
तुम हमारे नहीं हो फिर भी हमें दुःख नहीं पर जिस घड़ी हम तुम्हारे न रहे वो अंतिम होगी। तुम हमारे लिए हार या जीत नहीं, हमारा स्वाभिमान हो। हमने प्रेम को सत्ता के रूप में नहीं देखा सम्मान के साथ जिया है। तुम्हें एक स्वतंत्र साथी के रूप में देखना चाहते हैं। हम तुम्हें उसी तरह प्रेम करते रहना चाहते हैं जैसे करते थे। कहते हैं प्रेम में तन का समर्पण आवश्यक है तो हम निष्ठा से समर्पित हैं, आगे भी रहेंगे...जन्म-जन्मांतर तक पर तन की प्यास बुझाकर नहीं, प्रेम को प्रेम का बंधन समझाकर। दो प्रेम करने वालों का अति आकर्षण शरीर के सुख में परिणित हो जाता है पर हमारा शाश्वत प्रेम इस मान्यता के परे है। शारीरिक सुख वो चरमोत्कर्ष है जहाँ प्रेम क्षीण हो जाता है। मन दुर्बल हो जाता है। इन आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए सामाजिक मान्यताओं का होना आवश्यक है। हम अपनी तुष्टि के लिए इनका दोहन नहीं करेंगे। हमारा प्रेम भावनाओं के चरम पर है। तुम्हें अनुभव करते रहने की मन की व्याकुलता हर पल बढ़ती है। हम हर रातों को सपनों के महल बुनते हैं इस विश्वास के साथ कि तुम हर सुबह उनको आकार दोगे। हमारे स्नेह का मर्म समझोगे और हम हर रोज लिखते रहेंगे अपने प्रेम की पाती...... प्रियतम के नाम।
पलकों पे निंदिया की डोली सजी है सपने में आना।

तुम्हारी प्रतीक्षा में,
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मेरी पहली पुस्तक

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