Coffee with Abhi

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मंगलवार, 27 नवंबर 2018

पहली तारीख...


इकतीस दिनों के महीने का
आखिरी वाला दिन
कितनी नाउम्मीदी और
बेचैनी से बीतता है
एक बंधी हुई
तनख्वाह उठाने वाला
साधारण सा मध्यमवर्गीय
परिवार बता सकता है,
रसोईं घर के खाली बजते हुए कनस्तर
खाने की मेज पर कम हुई फलों की मात्रा
फ्रिज में मुँह चिढ़ाती महज पानी की बोतलें
दाल में बढ़ गयी तरलता
बच्चों का आखिरी पन्ने पर घना-घना लिखना
बाबूजी का टूटा हुआ चश्मा धागे से बाँधना
हर महीने की बीस तारीख को
मुन्नी की गुल्लक इस आश्वासन पर तोड़ना
कि इस बार तो सूद के साथ भरेगी
बहुत डरावना होता है
बीस से तीस के बीच का सफर
जब विवशता में एक और दिन जुड़ता है
बहुत खीझ आती है
क्यों लंबी हुई अवधि महीने की
जबकि बाबू तो इस बार भी
वही पतला सा नोटों का लिफाफा देगा,
ये समझे बिना
कि मुन्ना इकतीस को भी
दूध की उतनी ही शीशी माँगता है
काला धुँआ छोड़ता इनका स्कूटर
उसी ईंधन में दफ्तर पहुँचता है
फिर भी गृहणी
उम्मीद पर मुस्कराती है
कि कल पहली तारीख है
सब ठीक हो जाएगा।

शुक्रवार, 23 नवंबर 2018

तुम्हारी शुभ यात्रा

मंजिल की ओर उठा हुआ
तुम्हारा पहला कदम
अनवरत बढ़ता रहे,
तुम्हारी सोच के
आकार का विस्तार
हर दिशा में हो
तुम्हारी सफलता
हर उपमा से परे हो
तुम्हारा यश आलोकित हो...

सोमवार, 12 नवंबर 2018

'तुम'...

'तुम'
क्या हो तुम
ठहरी हुई झील
गिरता हुआ झरना
बहती हुई नदी
अथाह समंदर
या फिर
उसको भी समाहित करता
महासागर;
नहीं
इनमें से कुछ भी नहीं हो तुम
तुम तो एक बूंद हो
......
हाँ वहीं
जिसमें हाइड्रोजन और ऑक्सीजन
का संयोजन हैं हम
तुम अगर सूत्र हो
तो समीकरण हैं हम.

रविवार, 4 नवंबर 2018

दिलवालों की दिवाली


दीवाली के अवसर पर दिल खोलकर खुशियाँ मनाइए साथ ही उन्हें ऐसे लोगों के साथ बाँटिए जिनके लिए ये अनमोल हैं। इनकी मेहनत आपके घरों को सजाती है। 

गरीब की दिवाली



खुशबुएँ सिधारीं
हेराई गयी मिटिया
रोई के आंख मूंदे
छज्जे बैठी बिटिया
दिया-बाती तेल नाइ
ना खावे को रोटिया
उल्लू लक्ष्मी लै उड़े, पूजे
सालिगराम की बटिया
कपड़ा ना बताशा-खील
कहाँ मिले खुटिया
गरिबिया से नेह बढ़ि
अंसुवन से पिरितिया
बस सपना मा रहि गईं
देवारी की बतिया...

मेरी पहली पुस्तक

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