To explore the words.... I am a simple but unique imaginative person cum personality. Love to talk to others who need me. No synonym for life and love are available in my dictionary. I try to feel the breath of nature at the very own moment when alive. Death is unavailable in this universe because we grave only body not our soul. It is eternal. abhi.abhilasha86@gmail.com... You may reach to me anytime.
गुरुवार, 12 दिसंबर 2019
खतरा होता है...
गुरुवार, 5 दिसंबर 2019
प्रेम तो प्रेम है
सोमवार, 2 दिसंबर 2019
लड़की की इच्छा
मंगलवार, 26 नवंबर 2019
मैं दोषी हूँ
मंगलवार, 19 नवंबर 2019
ओ पुरुष!
गुरुवार, 7 नवंबर 2019
प्रेम है प्रेम सा
बुधवार, 23 अक्टूबर 2019
पहली बार
जब पहली बार निकलो यात्रा पर
तो कुछ भी न रखना साथ
चाकू, घड़ी, छतरी, टिश्यू पेपर, टॉयलेट सोप...
आदि कुछ भी नहीं
कहीं अगर ले लिया
इन सामानों से भरा झोला
तो कंधे थक जाएंगे
और तुम्हें नहीं मिलेगा
सफ़र का भरपूर मज़ा.
मैं भी तैयारी में हूँ
एक अनन्त यात्रा की
जो बिल्कुल पहली बार होगी
और कुछ नहीं होगा साथ
सिवाय तन पर एक सफ़ेद लिबास के...
रविवार, 20 अक्टूबर 2019
कविता का अस्तित्व
शुक्रवार, 18 अक्टूबर 2019
जीवित शिलालेख
उस रोज़ मर गयी थी माँ
लोग सांत्वना दिए जा रहे थे,
'सब ठीक हो जाएगा
मत परेशान कर ख़ुद को...'
कुछ भी ठीक नहीं हुआ
क्योंकि कुछ ठीक होने वाला नहीं था
वो देह भर गरीबी अर्जित कर
कूच जो कर गयी थी.
ऐसे ही जब मरे थे बापू
कुछ भी नहीं था तब
सांत्वना भी नहीं!
काकी, ताई, दाऊ, दद्दा...
सब इसी तरह जाते रहे.
ग़रीब के हिस्से आता ही क्या है
अलावा जिल्लत के?
अब मुझे मौत से डर नहीं लगता,
रात के अँधेरों से डर नहीं लगता,
दर्द की नग्नता से डर नहीं लगता,
मेरे भीतर का मौन कचोटता नहीं है मुझे
मैं वो जीवित शिलालेख बन चुकी हूँ
जिस पर बादल बरसकर भी नहीं बरसते,
हवा का ओज कौमार्य भर देता है
निष्प्राण देह में,
काल भृमण करता है मुझ पर
मेरी उम्र बढ़ाने को...
गुरुवार, 17 अक्टूबर 2019
नेह का दस्तख़त
सब कुछ भूलने से पहले
मन किया
कि सब कुछ याद कर लूँ
बहुत ज़्यादा
एक बार फ़िर
शायद कोई बात मिल जाए ऐसी
कि मन कसैला हो जाए तुमसे
...सब कुछ ढूंढ लिया
फ़िर मिला,
'धत्त...पागल होते हैं वो
जो पावन मन के प्रेम की
सुंदरता को खोते हैं
मुझे तितली की सुंदरता चाहिए
तो किताबों में क़ैद करना कैसा
...उड़ने दूँ उन्मुक्त होकर
उसे ख़ुद के साथ'
मैं, तितली
और नेह का वो धागा
जो एक अदद हस्ताक्षर है
मन के उजलेपन का!
शुक्रवार, 11 अक्टूबर 2019
एक पिता की चुपचाप मौत
मूक हो जाते हैं उस पिता के शब्द
और पाषाण हो जाती है देह
जो अभी-अभी लौटा हो
अपने युवा पुत्र को मुखाग्नि देकर.
न बचपन याद रह जाता है
न अतीत की बहँगी में लटके सपने
आँखें शून्य हो जाती हैं
ब्रह्मांड निर्वात,
बूँद-बूँद रिसता है दर्द का अम्ल
हृदय की धमनियों से,
सब कुछ तो है
और कुछ भी नहीं है,
फफक पड़ती है मेरु रज्जु
किस पर झुकेगी बुढ़ापे में,
रिस जाती है फेफड़ों की नमी
किन हाथों में थमाएगा दवा का पर्चा,
सहसा ही निकाल फेंकता है
आँखों पर लगा चश्मा
कि बचा ही क्या दुनिया में देखने को;
अंत्येष्टि कर लौटा पिता
मरघट हो जाता है स्वयं में
हर आग चिता की तरह डराती है उसे,
चुकी हुई रोटी की भूख
चिपका देती है उसकी अंतड़ियाँ,
पल भर में लाश बने उस देह की आग ठंडी होने तक
मर चुका होता है पिता भी;
बची-खुची देह भी समा जाना चाहती है
किसी कूप में
जब जमाना करने लगता है
पाप और पुण्य का हिसाब-किताब.
शनिवार, 5 अक्टूबर 2019
सुनो
कब आओगे
ख्वाहिश की तरह
एक मजबूत चट्टान बनकर
जिस पर तैर रहे
शब्दों के तिलचट्टों का
रत्ती भर भी असर न हो
कब आओगे
आंसू की तरह
इतने तरल होकर
कि हम भी पिघल जाएं
और समा जाएं तुममें
किसी को खबर न हो.
मंगलवार, 24 सितंबर 2019
तुम रोशनी मशाल की
तुम तेज़ हो
तुम ओज हो
तुम रोशनी मशाल की
देखकर तुम्हें, ज़िन्दगी
जी उठी शमशान की
स्वप्न एक कच्ची उमर का
उतावला जो कर गया
भाल पर बांधे कफ़न
वो उतर फ़िर रण गया
रात चांदनी, सुबह
वस्त्र बदल अा गई
डूबकर ओज में
तेज में नहा गई.
श्री अमिताभ बच्चन जी को दादा साहब फाल्के पुरस्कार की बहुत बहुत बधाई 🙏
आज सुबह चाय पीते हुए
तुम्हारा होना
रोज़ रोज़ होना
कोई आदत नहीं
न ही लत है मेरी, क्योंकि
तुम तो सुबह हो,
मेज पर रखे चाय के दो कप
तुम्हारे साथ घूंट घूंट पीना
और बूंद बूंद स्वाद लेना
बालकनी पर छितरे बेल की
खिड़की से झांकती पत्तियां
मेरी आंखों से पढ़ी
तुम्हारी कविताओं का
स्पर्श चाहती थीं,
ये खिल सी उठती हैं
जब मेरे होंठों पर
तुम्हारे शब्दों के इन्द्रधनुष रचते हैं
गोया इनके भी कान हों
इतने संवेदी
जैसे मेरे कान तुम्हारी कविता को,
आज वो बेल मुरझा गई
पढ़ी तो थीं आज भी
तुम्हारी कविताएं
पर आंखों से कही नहीं
न ही होंठों से बाची गईं
...फ़िर कभी हो सकेगी क्या
वो चाय तुम्हारे लिए
और वो कविता हमारे लिए.
....
आज सुबह चाय पीते हुए
पी गई थी जाने कितनी उलझनें
बस एक चाय ही तो नहीं पी थी
आज सुबह...
शुक्रवार, 20 सितंबर 2019
अग्नि मेरा गीत है
मैं निशा की चांदनी
मांग अंधेरा सजा है
भोर के आने से पहले
नर्तनों का गीत हो
तांडव की बेला हो जैसे,
कांपते हांथों से
मेरी देह का श्रंगार कर दो
भाव पर धरकर विभूति
रोम रोमांचित मेरा हो.
तुम अलग
मैं पराकाष्ठा हूं विलग की
नेत्र पर दृष्टि समेटे
खोलने को हों ज्यों आतुर
भस्म दो
तन पर मलूं मैं
शीत मेरा ताप हो...
मंगलवार, 10 सितंबर 2019
जा ही रहे तो लौटकर मत आना!
मरना ही चाहते हो न तुम
तो आराम से मरो और पूरा मरो
रत्ती रत्ती मत मरना
मरने के प्रयास में कहीं जी भी मत उठना
इस दुनिया की नारकीय पीड़ा भोगने को दोबारा,
नहीं तो मार दिए जाओगे प्रश्नों की बौछार से,
तब तक मरो जब तक कि
ये न बता सको
रक्खा ही क्या है इस दुनिया में
ताकि आने वाली नस्लों को
सुनाई जाए शौर्य गाथा तुम्हारे नाम की
इतिहास के पन्नों में दर्ज़ हो जाओ तुम
एक तुम ही तो हो संतान आदम और हव्वा की
बाक़ी सब सरीसृप वर्ग के प्राणी हैं
किसी की कोख़ से कहां जन्में
कायिकी प्रवर्धन का परिणाम जो ठहरे;
तुम जी नहीं सकते तभी मरोगे
आत्मा तो उसी पल मार दी थी
जब जीने की जिजीवषा मरी थी,
तुम असीमित में सीमित हो
स्थूल में नगण्य हो
संभावनाओं की चौखट पर बैठे
वो द्वारपाल हो जो किसी स्त्री के
मैल से उत्पन्न विवेक शून्य प्रतीत होते हो,
अपने न होने में मगर
कभी होना न तलाशना
तुम वो भाव मारकर जा रहे हो
जिसे आत्मीयता की पराकाष्ठा कहते हैं.
बुधवार, 4 सितंबर 2019
बिटिया
हर चिड़िया के माथे पर एक उदासी
और पंखों में एक उमंग होती है
हर बार जमीन से
जितना भी ऊपर जाती है
हर चिड़िया के माथे पर
अा जाती है शिकन, फ़िर भी
हर चिड़िया अपनी चोंच में
नेह भर तिनका लिए रहती है.
बहुत कुछ ऐसी ही होती है बेटी
सब कुछ करती है सभी के लिए
पर चाहकर भी उड़ नहीं सकती
कभी अपने लिए.
क्योंकि हर बिटिया
परों वाली चिड़िया नहीं होती.
शुक्रवार, 9 अगस्त 2019
जीवन के बाद भी जीवन है कहीं!
बहुत ही कम लोग परिचित होंगे
इस शब्द के मायने से
शब्द से तो बहुत से लोग होंगे
पढ़ रखा होगा अख़बार में, पाठ्य-पुस्तकों में
कभी सुना भी होगा दूरदर्शन पर
अभी हाल ही में खबरों का आकर्षण रहे थे
जब लाखों की संख्या में इनके बेघर, विस्थापित होने की बात अाई थी;
सही समझे, वही हैं ये
जिनका कोई ठौर नहीं होता
सामान्य से नाक नक्शे वाले
हमारे तुम्हारे जैसे, पर
हम जैसों से प्रकाश वर्ष की दूरी तक.
याद आया पुरानी फिल्मों में देखते थे
हू ला ला जैसा कुछ,
ऐसे भी नहीं होते ये.
शहर की आबादी से मीलों दूर बसे
अपने ही समूह में रहते हैं
पेड़ों के घनी छांव में
वही तो इनका जीवन है.
लोग वृक्षारोपण करते हैं, सही होगा
पर असल मायनों में जंगल तो इन सबका
बचाया और बसाया हुआ है.
शहर की पगडंडी को पारकर
जब लगेगा हम जंगलों में हैं
और वहां भी मीलों चलना होगा
चलते रहना क्योंकि कोई सुराग नहीं मिलता जीवन का
फ़िर दूर कहीं कुछ चूजे दिखेंगे
कुछ दूरी पर मिलेगी बकरियों की सुगबुगाहट
तब कहीं जाकर महसूस होगा
कि जीवन के निशान बाकी हैं अभी
दूर से दिख रहा पुआल और बांस की दीवारों पर रखा खपरैल
कहीं कहीं मिट्टी का लेपन किया हुआ
अहसास दिलाता है वहां किसी के रहने का
पास जाने पर मिलता है बस एक रोमांच
कितना भी पुकारते रहो बाहर से
कौन सुनने ही वाला है, भीतर तक जाकर भी
शून्य ही रहती है संवेदना क्योंकि
इंसान बसते हुए भी नहीं मिलते वहां सभ्यता के निशान
उन्हें सलीका नहीं आता आगंतुक को बिठाने का
टूटी खाट को गिराकर बैठने पर ताकते रह जाते हैं विस्मय से
बदन पर गमछी या फ़िर छापा साड़ी लपेटे युवा स्त्रियां
वृद्ध स्त्रियां बदन ढक लेती हैं एक गमछी भर से
बहुत सम्मान के भाव में 'गो' का संबोधन
शिक्षा का ककहरा भी नहीं पता,
नहीं देखी है इन्होंने सड़क और रेल,
कई कई दिनों तक सोना पड़ता है भूखों
उबले हुए भात में पानी और मिश्रण मिलाकर
'हड़िया' पीने को मजबूर;
जाने कौन सी धारा के शिकार हैं ये
कि इंसान होकर भी इंसानी अस्तित्व से वंचित
उठानी होगी एक आवाज़ इनके हक़ में
जोड़ना होगा इन्हें भी समाज की मुख्यधारा से
या फ़िर मनाते रहेंगे आदिवासी दिवस हर वर्ष
जब तक इनका अस्तित्व ही ख़त्म न हो जाए!
यह कविता मित्र अपर्णा अन्वी (स्वयंसेवी संस्था एकजुट की डिस्ट्रिक्ट कोऑर्डिनेटर) के साथ हुए संवाद पर आधारित है.
आउट लाइन
कई पन्ने ऐसे गुज़रे ज़िन्दगी में
कि हाशिए के इस पार भी लिख दिया
अब भरने को है ये नोटबुक
बहुत से सवाल
और उनका प्रश्नचिन्ह मिटाते जवाब
कुछ सबक
और कुछ हिसाब,
थोड़ा रोना लिखा
कुछ हंसना भी लिखा
बहुत बड़ा था दोस्ती का पन्ना
अब लगता है सब कुछ लिख गया
जैसे ख़त्म होने को है ज़िन्दगी
और बनानी है
उस खात्मे को निर्धारित करती आउट लाइन
जिसके उस पार से मौत लपक लेगी
वैसे तो बाउंड्री के बाहर कैच आउट नहीं होता
पर उपर वाला अंपायर
खींच ले जाता है सांसें
इस आउट लाइन को पार करते ही.
गुरुवार, 8 अगस्त 2019
अवसान तक प्रेम!
मैं बचाए रखना चाहती हूं प्रेम
ख़त्म होने तक भी
यहां तक कि प्रेम के अवशेष
जब कुछ भी न बचे दुनिया में
तब तुम्हें वो पोषित करता रहे
चिरकाल तक
और फ़िर तुमसे ही प्रारम्भ हो
एक नए युग का
जिसकी रगों में बहता हो
मेरा पोषित किया हुआ प्रेम.
स्त्री धर्म है!
नभ के सीप में बंद उदात्त स्त्री
स्वयं में एक सत्ता है
हवा की आरी से दुःख को चीरती हुई
शिव नहीं है तो क्या हुआ
गरल तो पी जाती है
वो पूजती है और पूजी जाती है
गोमुख से निकली पावनी सी पवित्र
वही तो है समूचा अस्तित्व
फिर प्रश्नचिन्ह कैसा
क्यों तोड़ना उसे
अगर वो जोड़ती है.
अपात्र नहीं है
वो तो सुपात्र है
स्वीकारनी होगी उसकी उन्मुक्तता
ताकि सृष्टि का संतुलन बना रहे.
एक प्रश्न
मुक्त कर दो न हमें
प्रेम के ब्रह्मास्त्र से
बांट लेते हैं
अपने अपने हिस्से की जमीन
तुम अपनी सल्तनत में
प्रेम के बीज बोना
और मैं सींचता रहूंगा वो स्नेह
जो चलते हुए तुम
आलिंगनबद्ध कर दे गईं थीं.
बोलो, इस तरह बचाकर
रख सकोगी प्रेम का वर्तुल स्वरूप?
उन्मुक्तता
जब स्वच्छंदता
स्व की बेड़ियों में
जकड़ दी जाती है
तो उन्मुक्तता का मूल
स्वतः ही नष्ट हो जाता है
जैसे समंदर की लहरों पर बने
पांवों के ढीठ निशान.
न तुम रह जाता है
न मैं
न ज़्यादा या कम की तू-तू, मैं-मैं.
उन्मुक्त ही रहने देने थे न
कुछ भाव
कि खुली आंखों से देखते
सृष्टि के विरले रंग
और आंखें बंद करो तो शिव.
शुक्रवार, 8 मार्च 2019
मैं जीवन हूं
शुक्रवार, 22 फ़रवरी 2019
तुम्हें ज़िंदगी कह तो दिया
शनिवार, 16 फ़रवरी 2019
एक शहीद की विधवा
बुधवार, 13 फ़रवरी 2019
एक पाती प्रेम की
सोमवार, 11 फ़रवरी 2019
रविवार, 10 फ़रवरी 2019
शनिवार, 9 फ़रवरी 2019
शुक्रवार, 8 फ़रवरी 2019
गुरुवार, 7 फ़रवरी 2019
मेरी पहली पुस्तक
http://www.bookbazooka.com/book-store/badalte-rishto-ka-samikaran-by-roli-abhilasha.php
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मुझे भी तुमसे कुछ ऐसा सुनना है जैसे मार्केज़ ने कहा था मर्सिडीज़ से और मैं ख़ुद को उसके बाद झोंकना चाहूँगी इंतज़ार की भट्टी में वह इंतज़ार ज...


















