Coffee with Abhi

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शनिवार, 2 सितंबर 2017

मुझे वो हर सहर उधार दे

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सरे-शाम से लिये चिराग,
तेरी याद में मैं बेहिसाब,
बैठी हूँ तेरे सिजदे को,
मुझे एक रात नवाज़ दे।
कहाँ है मुझको ये बता,
सुलग रही है मेरी जफ़ा,
फिक्र है मुझे बस तेरी,
तू कहीं से तो आवाज़ दे।
तेरे नूर को मैं चूम लूँ,
प्यारा है मेरा रहनुमा,
वरक़-वरक़ सिमट सकूँ,
बस तेरे लफ्ज़ सँवार दे।
न छाँव अपनी दे मुझे,
न नाम का तू अक्स दे,
जो शाम तुझमें हो घुली,
मुझे वो हर सहर उधार दे।

शुक्रवार, 1 सितंबर 2017

आज की रात मुझे.....


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सुनो,
जो कल दो पन्नों वाली मुलाक़ात लिखी थी न
उसमें कुछ रह सा गया है,
अभी अपनी उस दिन वाली तकरार नहीं लिखी
और हाँ इश्क़ के फफोलों पर ठंडे मरहम वाली बात
वो भी तो नहीं लिखी।
पहले तो सब मुझे कहते थे दीवानी तुम्हारी
और तुम हर बात में पगली,
मगर अपना भी मौसम बदल गया है,
इश्क़ की दुकान में भाव ऊंचे हो गए हैं,
अब कोई नहीं कहता
एक लड़की थी दीवानी मगर पागल;
अब सब कहते हैं न
मैं मज़मून हूँ मोहब्बतों का,
दर्द के गुश्ताक़ दरिया में बेज़ार बहता हुआ;
क्या समझूँ इसे मैं
बेपनाह समंदर में डूबने की हौसला-अफ़ज़ाई
या तुम्हारे नाम की आयतों का कलमा,
क्या है मेरा मुक़द्दस कल
दिन से मुतमइन मगर रोशनी से बेज़ार:
अच्छा बताओ तो सही
इस इबारत को क्या नाम दूँ?
सुनो तुम जल्दी आओ न!
मन कुछ भारी सा हो रहा
नींबू पानी और मोहब्बत की एन्टी डोज
दोनों जरूरी हैं मेरे लिए
पर आते वक्त नुक्कड़ से
अपनी पुरकशिश मुस्कराहट लाना मत भूलना
आज की रात मुझे ये फलसफा लिखना है

गुरुवार, 31 अगस्त 2017

तुम्हारे शब्द!

हमने रातों के जुगनुओं से रोशनी लेकर
तुम्हारी स्याही को अपनी कलम से
शब्दों में पिरोया है,
अब इन शब्दों से वफ़ा हमें
ताउम्र निभानी है।
ये खाली शब्द होते तो
सो जाते कविता में ढलकर
मगर ये तो हमें रातों को जगाते हैं,
तुम्हारे पास होने का
अहसास कराते हैं,
हमारे आँसुओ से लिपट जाते हैं,
जब सारा जहां रात की रंगीनियों में
खोया सा है,
सारा आलम तुम्हारे साथ सोया सा है,
हमारे भीतर की हौले से
सिहरन बढ़ाते हैं,
तुम न हो बस तुम्हारे दिए
ये शब्द नज़र आते हैं।

सोमवार, 28 अगस्त 2017

ऐसी है मेरी वो!

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 वो दिन से लम्हे, चेहरे से नूर
और कभी-कभी तो
मुँह से बातें भी चुराती है
ऐसी है मेरी वो!
मुझे मेरे नाम से बिंदास बुलाती है,
कुछ ग़लत मेरे नाम का
सुनती है न सुनाती है;
मुझको तो वो सौ बार मनाती है
मगर खुद भी रूठ जाती है;
उसके झगड़ने की अदा उफ्फ!
सौ प्रश्नों की सूची बनाती है,
उत्तर एक का भी नहीं पाती है,
मेरी शिकायतों पर हैरान
थोड़े से ही परेशान,
मेरे लिए तो खुद को भी सताती है,
ऐसी है मेरी वो!
दुनिया की कोई बात उसे अच्छी न लगे,
मेरे बगैर कोई रात उसे अच्छी न लगे,
कहती है इस दिल की तरह
तुम्हारा हर दिन भी तो मेरा है,
मेरे बगैर धूप-छांव बरसात उसे अच्छी न लगे,
मुझसे मुतमईन हर दुनिया कविता में सजाती है,
ऐसी है मेरी वो!
मेरी आँखों की खुशी पढ़ती है
अपने आंसुओं का दर्द छुपाकर,
जीती है संग मेरे हर पल
बिना रिश्ते के हर बन्धन निभाकर,
मैं कहीं छुपना भी चाहूँ
किस कदर रोती है मुझको बुलाकर,
वो जंगली बिल्ली है मेरी,
प्यारी है मुझे भी तो,
दुलारती है मेरे वजूद को सीने से लगाकर,
ऐसी है मेरी वो!

रविवार, 27 अगस्त 2017

कहाँ हो तुम?

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सुनो, सुन रहे हो न!
हमें पल-पल ऐसा क्यों लगता है
कि तुम हमें सुनना नहीं चाहते
तभी तो कर रहे हो न अनसुना;
देखो न! इंतज़ार की रंगत
गुलाबी से नीली हो गयी,
आँखे पीली सी थीं ही गीली हो गयी;
हम खुद से खुद में मथे जा रहे
और तुम हो कि!!!
तुम्हे जो सुख सड़क के कोलाहल,
गाड़ियों के सायरन से मिलता है
हमें डोर बेल में:
तुम्हे प्रतीक्षालय भाता है
और हमे तुम्हारे इंतज़ार में घर का द्वार
आओ न, बस चाय पियेंगे साथ
एक प्याली चाय
जो तुम एक बार में ही उतार लोगे
हलक से नीचे
और हम घूँट-घूँट में
तुम्हारा रसास्वादन करेंगे,
लम्हा-लम्हा तुम्हारे होने का अहसास जियेंगे,
आओ न कि समय ने
खुरच दी हैं दर्द की गहरी लकीरें,
एक शाम का मरहम
तुम्हारे मन की उंगलियों से
हमारे दर्द की हर नब्ज़ पर रखने
बोलो कब आओगे?
कहीं तुम्हारा आना
हमारे खुशी की मरीचिका तो नहीं??

गुरुवार, 24 अगस्त 2017

माँ

बारिश, जुगनू, गुड़िया,
देखा फिर होश कहाँ,
रंग, तितली, फूल, हवा,
अब ये ही मेरी दुनिया।
नन्हीं आँखे, नन्हें सपने,
बस देखे है तेरी मुनिया।
कोई और भाए न मुझे,
मेरा जीवन तो तू है माँ।

सोमवार, 21 अगस्त 2017

स्त्री या सुनामी!

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सुनो, तुम दिन भर खटती रहती हो
घुँघरू की ताल पर नाचती हुई
सबके लिए फिक्रमंद
जरूरतों के मुताबिक
थोड़ा-थोड़ा जीती हो,
कभी घर के हिसाब में,
कभी बच्चों की तकरार में,
कभी माँ-बाबूजी की अवस्था
को समझने में
खुद भी उलझ जाती हो,
घर के राशन से दवाई तक
रिश्ते-नातों से लेकर
बच्चों की पढ़ाई तक,
समाज, घराना, मित्र व्यवहार
सबमें इतनी सजग
जैसे समर्पण की देवी हो,
सबको अपना बना लेती हो,
हथेलियों से छांव करने को आतुर,
बस नेह के लिए बनी हो,
चेहरे पर बसी पुरकशिश मुस्कान
सारे रहस्य छुपा लेती है,
कभी तो थकती होगी,
कुछ तो दुखता होगा,
कोई तो शिकायत होगी,
कितनी सहजता से पीती हो
दर्द का विष
जैसे योगी ने हिमालय पे पिया था;
हजार आशनाओ में लिपटी वो मादकता,
आज भी यौवन की हथेली पर
ओस की बूँद सी दिखती है:
दिन की टिक-टिक पर थिरक कर भी
ऐसे सजाती हो मेरी रातों को
कि हर रात निखर जाती है
सुहागरात में;
तुम्हारी हर छुअन पहले स्पर्श जैसी,
वही कोमलता
जो रग-रग में स्रावित होती है,
मेरे हर आग्रह पर आज भी
उतनी ही समर्पित
तुम्हारा उद्वेग
मेरे आवेश को समा लेता है,
तुम जीती रहती हो मुझे बूँद-बूँद
मेरे स्खलित होने तक;
मैं निढ़ाल हो जाता हूँ
तुम फिर भी सजग रहती हो
जीवन के जतन में,
जितना मैं दिन और रात में जीता हूँ,
तुम जीती रहती हो पल-पल,
रात्रि की कोमलांगना
दिन की अष्टभुजी बन जाती हो,
वाह, क्या बात है तुममें
स्त्री हो या सुनामी!
जहाँ भी रहती हो,
लहरों की तरह
बस तुम ही तुम रहती हो।

मेरी पहली पुस्तक

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