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शुक्रवार, 27 मार्च 2020

मेरे प्रेम का प्रस्ताव

मेरी प्रेम कविताएँ
बीथोवन के जवाबी ख़त नहीं
जो तुम पुष्टि कर सकोगे
मेरे तुमसे प्रेम में होने की

न ही मैं
ब्राउनिंग की वो पोरफीरिया हूँ
जिसे उसके प्रेमी में
उसी के बालों से फंदा बनाकर
प्रेम में अमरत्व दिया

मेरा अमर प्रेम
दिन में सूरज और रात में चाँद सा है
कैसे इनकार करोगे कि
रात दिनकर का स्वागत न करे
कैसे रोकोगे मुझे कि
तुम्हारी चुपकी की पवित्र नाद से
मन भर की दूरी पर रहूँ?
चाहो तो मेरे प्रस्ताव पर ग़ौर करना
जितनी दूरी पर मैं हूँ तुमसे
इतने दायरे में मुझे हरदम मिलना.

स्त्री

स्त्री
दोपहर को धूप होती है
शाम को परछाई
और रात में अँधेरा.

हर बीता हुआ पुरुष
अपना पहर बदलता रहता है
और लंबा आराम लेता है
अँधेरा गहराते ही,
स्त्री आँखों की पुतलियों में सपने बाँधे
करवटों में रात निकाल देती है
सुबह के अलार्म की प्रतीक्षा में.

बुधवार, 25 मार्च 2020

सभ्य प्रेम

तुम्हारी चुप्पियों को भेजे गए
मेरे बेहिसाब चुम्बन
हमारे हृदयों को जोड़कर रखेंगे,
तुम सहलाते रहना अपने दर्द को
मेरे नर्म हाथों की मानिंद.
तुम तक नहीं आ सकती मैं
समय ने चूस ली है घुटने की चिकनाई
मेरी आँखों पर रख दिया शिष्टता का रक्त
तुमसे ज़्यादा तो मेरा
ईश्वर का भी होने का मन नहीं करता
तुम मुझे देते रहना
अपने सभ्य प्रेम की ख़ुराक
जीना चाहती हूँ मैं.

मंगलवार, 24 मार्च 2020

मैं और तुम

मैं मामूली हरकतें करने लगा हूँ
ताक़ि तुम मुझे पा सको
इनके बीच,
मग़र तुम पाओगे कैसे
तुम तो बस वो देखते हो
जो देखना चाहते हो।

मैं शब्द-शब्द अब भी तुम हूँ
उसी अधूरी मुलाक़ात की मोड़ पर
मेरा यक़ीन तुम्हें लेकर आएगा
फ़िर मिल बैठेंगे दो...
एक मन आकुल
दूजा आखर व्याकुल।

सोमवार, 23 मार्च 2020

यादें

बस यादें रह जाएंगी
जब भी देखोगे प्रोफ़ाइल मेरी
एक सिहरन तुम्हें छूकर
गुज़र जाएगी
अभी वक़्त है, मिल लो
ख़बर ले लो मेरी
हाल अपना भी दो.
....
....
....अगर नहीं चाहते हो
उस खंडहर के पीछे
नीम की घनी छांव में बैठी मिलूं.

शनिवार, 25 जनवरी 2020

शर्त


नहीं चाहिए थे
तुम्हें हमारे चुम्बन
तो वापिस रख देते
हमारी हथेली पर
क्यों जूठा करने दिया
अपने होंठो पर रखकर?

नहीं चाहिए था
तुम्हें हमारा आलिंगन
तो पीठ फेर लेते
हमारे आने से पहले
क्यों सींचा उसे
अपनी छाती पर रखकर?

नहीं चाहिए था
तुम्हें हमारा स्पर्श
तो उग जाने देते कैक्टस
हमारी त्वचा पर
क्यों छूने दिया अपने रोमछिद्रों को
हमारे शानों पर सर रखकर?

शुक्रवार, 24 जनवरी 2020

तीस पार की लड़कियाँ




कानों पर उँगली रख लेती हैं अक्सर
ये तीस पार की लड़कियाँ
रिश्ते के नाम पर
विवाह मोह का जाल भर होता है,
इतनी भा जाती है इनको
अकेलेपन की ख़ुराक़
कि रिश्ता ओवरडोज़ लगता है
इनकी नज़र में,
पैर पर पैर चढ़ाकर
ऑफिस की कुर्सियों पर बैठी ये लड़कियाँ
नहीं चाहतीं महावर के पाँवों से
पति के घर जाना,
जीन्स पहनने के नाम भर से उन्मुक्तता दिखाने वाली ये लड़कियाँ
साड़ी की लंबाई को मीटर में मापती हैं,
औरों के सपने बुनते हुए
रख आती हैं अपनी आँखें गिरवीं,
चलते-चलते ख़ुद को ले आती हैं
भ्रम के दोराहे पर,
लड़के-लड़कियों को अपना दोस्त बताने वाली
ये लड़कियाँ अक़्सर भूल जाती हैं
कि दिन भर उजाला जीने के बाद
जब रात को इनके बिस्तर पर अँधेरा सताएगा
तो कोई दरवाज़ा इनकी आहट पर नहीं खुलेगा
कोई नहीं आएगा इनका हाल पूछने
......
अगर कोई आएगा तो बस
थका हुआ प्रेमी
हारा हुआ पति
मदिरालय से वापसी करता
बेबस इंसान
और उँगली उठाता हुआ समाज.
यहाँ तक कि
वो गुज़रा वक़्त भी नहीं आता इन तक
कि अपनी ग़लती सुधार सकें
धीरे-धीरे कोशिश करती हैं सामाजिक होने की
ढूँढने लगती हैं औरों के बच्चों में
अपनी मुस्कान
चॉकलेट से भर जाता है बैग
हर चॉकलेट के बदले मिलती जो है
जादू की झप्पी
फ़िर तिरती है इनकी आँखों में
बीते वक़्त की नमी
जब ये दिए जाने वाले प्रेम के लिए भी
शक़ की नज़र से देखी जाती हैं
जहाँ भी जाती हैं
बचाए जाते हैं स्त्रियों के पति
इनकी नज़रों से,
दूर रखे जाने लगते हैं बच्चे
इनके मोहपाश से.
कानों पर उँगली रखने वाली
ये तीस साल की लड़कियाँ
चालीस पार करते ही
बन जाती हैं उजड़ा हुआ गणतंत्र
अगर रुदन भी करें
तो कान बंद करती हैं ख़ुद के ही
कि कहीं चीख़ दम न घोंट दे.

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मेरी पहली पुस्तक

http://www.bookbazooka.com/book-store/badalte-rishto-ka-samikaran-by-roli-abhilasha.php