To explore the words.... I am a simple but unique imaginative person cum personality. Love to talk to others who need me. No synonym for life and love are available in my dictionary. I try to feel the breath of nature at the very own moment when alive. Death is unavailable in this universe because we grave only body not our soul. It is eternal. abhi.abhilasha86@gmail.com... You may reach to me anytime.
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विद्या और चेतना का संगम: सरस्वती पूजा का मनोविज्ञान
वसंत पंचमी के दिन मनाई जाने वाली सरस्वती पूजा भारतीय संस्कृति का एक ऐसा पर्व है, जो केवल धार्मिक अनुष्ठान तक सीमित नहीं है, बल्कि यह मानव मानस और ज्ञान के प्रति हमारे दृष्टिकोण का एक गहरा मनोवैज्ञानिक प्रतिबिंब है. वैदिक काल में जहाँ सरस्वती को 'नदी' के रूप में जीवनदायिनी माना जाता था, वहीं आज वे 'ज्ञान और वाणी' के रूप में हमारी बौद्धिक चेतना को सींचती हैं.
बौद्धिक जागृति का पर्व
मनोवैज्ञानिक रूप से, सरस्वती पूजा 'सर्दियों की जड़ता' से 'वसंत की सृजनात्मकता' की ओर संक्रमण का प्रतीक है. जिस प्रकार प्रकृति इस समय नए पत्तों और फूलों के साथ खुद को पुनर्जीवित करती है, उसी प्रकार यह त्यौहार मनुष्य को अपनी संज्ञानात्मक क्षमताओं (Cognitive Abilities) को ताज़ा करने का अवसर देता है. छोटे बच्चों के लिए 'विद्यारंभ' का संस्कार उनके कोमल मस्तिष्क में यह संदेश अंकित करता है कि सीखना एक पवित्र और उत्सवपूर्ण प्रक्रिया है, न कि कोई बोझ.
पीले रंग का मनोविज्ञान: स्पष्टता और ऊर्जा
इस उत्सव में पीले रंग की प्रधानता होती—पीले वस्त्र, पीले फूल और पीले पकवान. रंग मनोविज्ञान (Color Psychology) के अनुसार, पीला रंग एकाग्रता, आशावाद और मानसिक स्पष्टता को बढ़ावा देता है. यह रंग मस्तिष्क के 'लेफ्ट हेमिस्फीयर' (तार्किक पक्ष) को उत्तेजित करता है, जिससे नई अवधारणाओं को सीखने और समझने की क्षमता बढ़ती है. यह रंग सामूहिक रूप से एक 'सकारात्मक मनोवैज्ञानिक माहौल' तैयार करता है.
विश्राम और पुनरावलोकन (Incubation Effect)
पूजा के दिन अपनी पुस्तकों और वाद्य यंत्रों को देवी के चरणों में रखकर पढ़ाई से अवकाश लेने की परंपरा का एक ठोस मनोवैज्ञानिक आधार है. इसे मनोविज्ञान में 'इन्क्यूबेशन इफेक्ट' कहा जाता है. जब हम किसी कठिन समस्या या निरंतर अध्ययन से थोड़ा ब्रेक लेते हैं, तो हमारा अवचेतन मन उस जानकारी को बेहतर ढंग से व्यवस्थित करता है. यह एक दिन का विश्राम छात्रों को मानसिक थकान (Burnout) से बचाता है और अगले दिन नए उत्साह के साथ लौटने की प्रेरणा देता है.
प्रतीकों के पीछे का मानसिक संतुलन
देवी सरस्वती के हाथ में वीणा जीवन में सामंजस्य और लय का प्रतीक है, जबकि हंस (नीर-क्षीर विवेक) सही और गलत के बीच भेद करने वाली 'निर्णायक बुद्धि' का प्रतिनिधित्व करता है. आज के सूचना विस्फोट (Information Overload) के युग में, सरस्वती पूजा हमें यह सिखाती है कि केवल सूचना एकत्रित करना पर्याप्त नहीं है; उसे ज्ञान में बदलने के लिए विवेक की आवश्यकता है.
सरस्वती पूजा हमारे भीतर के 'सीखने वाले' (Learner) को जीवित रखने का एक वार्षिक अनुष्ठान है. यह हमें सिखाता है कि विनम्रता और अनुशासन ही ज्ञान प्राप्ति के द्वार हैं. यह पर्व भारतीय जनमानस को यह विश्वास दिलाता है कि अंधेरे को मिटाने का एकमात्र तरीका 'अक्षर' और 'स्वर' की ज्योति जलाना है.
आईने वाली राजकुमारी- एक लंबी कहानी: पहला भाग
"तो आप आज ये प्रमाणित कीजिए कि आप हमारी मित्र हैं"
"इसके लिए क्या करना होगा हमें?"
"हम आज मयूरी विहार जाना चाहते हैं, आप अनुमति दीजिए"
"बस कुछ क्षण प्रतीक्षा कर लो. तुम्हारे भाई सा आ रहे होंगे"
"नहीं, हम अभी इसी क्षण और अपने चेतक पर अकेले जाना चाहते हैं"
"यह इच्छा हम पूरी नहीं कर सकते"
..
"यह मत भूलो कि तुम सौंदर्य कला से पूर्ण एक युवती भी हो"
"परन्तु अपनी सुरक्षा तो कर सकते हैं"
"कुछ भी हो… महाराज के आने तक तुम्हें ठहरना ही होगा"
"ठीक है हम भी अब अन्न जल तब तक नहीं ग्रहण करेंगे, जब तक महाराज नहीं आते"
"पुत्री तुम नाहक ही वाद कर रही हो"
"माँ सा… हमारा चेतक बाहर प्रतीक्षा कर रहा"
"हम निर्लज्ज तो नहीं आप निर्मोहिनी अवश्य प्रतीत होती हैं. एक भटकते हुए पथिक पर तनिक भी दया नहीं"
"दया या निर्दयता का कोई प्रश्न ही नहीं. आइये हमने झील का स्थान रिक्त कर दिया. जल गृहण कीजिए"
"ऐसे नहीं राजकुमारी हम तो आपकी अंजुरि से गृहण करेंगे"
"आप तो बहुत हठी प्रतीत होते हैं"
वेश भूषा और वार्तालाप से पूरा संकेत मिल रहा था कि वो एक साधारण व्यक्ति न होकर राजकुमार हैं.
"तो आप द्वैत गढ़ की राजकुमारी हैं?" उन अपरिचित ने प्रश्न कर राजकुमारी का ध्यान भंग करने की चेष्टा की.
"हम किन शब्दों में अपना परिचय दें तो आप समझेंगे?"
राजकुमारी ने भी अपनी हठ नहीं छोड़ी.
"आप अपनी जिह्वा को अधिक विश्राम नहीं देती हैं?"
"आप प्रश्न अधिक नहीं करते हैं?"
"हमें आपके प्रत्युत्तर भाते हैं"
राजकुमारी के नेत्रों में न परन्तु हृदय पर हाँ की छाप लग चुकी थी.
"आप यहाँ आती रहती हैं क्या?"
"हम क्यों बताएँ?"
"हम पूछ रहे क्या ये कारण पर्याप्त नहीं?"
"आप तो हमसे ऐसे कह रहे जैसे हमारे सखा हों!"
"आप हमारी सखी तो हैं"
"हमने कब ऐसा कहा? हम तो आपसे वार्तालाप नहीं कर रहे"
"वार्तालाप तो आप अब भी कर रहीं और तो और हमें अंजुरि में जल भरकर दिया"
"बात करने का तो कुछ और ही प्रयोजन है और जल देकर तृषा बुझायी"
"आपको देखते ही रेत का एक जलजला हमारे भीतर ठहर गया और आप कहती हैं तृष्णा बुझ गयी"
"आप हमें बातों के जाल में उलझा रहे हैं"
"आपके नेत्रों ने हमारा आखेट किया है"
"यह कैसा आरोप है?"
"क्या प्रमाण नहीं चाहेंगी?"
"---"
"हमें अनुमति दीजिए कि हम आपके हृदय के स्पंदन की अनुभूति कर आपको प्रमाण दे सकें!"
"हमारा हृदय...स्पंदन...प्रमाण...बेसिरपैर की बात कर रहे हैं आप"
"विवाद नहीं सुंदरी अनुभव कीजिए"
.
"तुम चेतक के साथ दौड़ की स्पर्धा करने गयीं थी क्या?"
"क्यों माँ सा, आपने ये प्रश्न क्यों किया? हम तो चेतक की लगाम थामकर उड़ते चले आए"
"तुम्हारी बढ़ी हुई श्वांस को देखकर कहा. कहीं कुछ अघटित तो नहीं घटित हुआ?"
"कैसा अघटित माँ सा? वैसे भी जो होता है वो पूर्व निर्धारित ही होता है फिर उसे अघटित क्यों कहें?"
"राजकुमारी हम आपके बिखरे केशों को सुलझा दें. अगर न चाहें तो शृंगार न करवाईयेगा"
"नहीं गेंदा रहने दे. उलझनें तो जीवन में हैं, क्या-क्या सुलझायेगी"
"पहले केश फिर कुछ और…" इस पर दोनों मुस्करा दीं. राजकुमारी अपने शयनकक्ष के एक कोने में लगे आईने के सामने बैठ गयीं.
"नहीं मानती है तो आ जा बना दे केश" गेंदा अपने दोनों हाथों में चमेली का तेल लेकर राजकुमारी के केशों में लगाने लगी.
"राजकुमारी जी, एक बात पूछें?"
"हाँ बोलो गेंदा"
"उलझनें तो उनको होती हैं जो प्रेम में होते हैं"
"अच्छा तुझे तो बड़ा पता है"
"नहीं हमने देखा है न"
"क्या देखा है बोल"
"कुछ नहीं" कहकर गेंदा चुपचाप तेल लगाने लगी. राजकुमारी बहुत कुछ सोचने पर विवश हो गयीं.
.
"हम अपनी बहना को न देखें ऐसा कभी हुआ है क्या?"
"आज अभी हुआ न! जाइये हम आपसे बात नहीं करते"
"अच्छा...कितनी देर के लिए?" भाई सा ने बहना को अपने पास बिठाते हुए पूछा.
"हुँह"
"क्या? हमारे कारण ऐसा हुआ? फिर क्या हुआ?"
"फिर उसने एक जादूगर की सहायता से हमारे प्राण इस तोते में बंद कर दिए"
"और आपका शरीर?"
"हमारा शरीर उस जादूगर के पास है"
"आने वाली अमावस्या की रात वो जादूगर हमारे शरीर की बलि दे देगा"
"ऐसा मत कहिए राजकुमार. हम यह नहीं होने देंगे"
"क्या ही कर पाओगी तुम?"
"अभी तो अमावस्या की रात में पूरे १५ दिन हैं. बस आप हमारा साहस बने रहिए"
पहुँचते ही राजकुमारी ने यह क्या देख लिया उनके भाई सा व्यग्रता से इधर-उधर टहल रहे हैं.
"भाई सा क्या बात हुई भला, आप चिंतित से लग रहे?"
"लगता है हमारी बहना ने हमारे मन की सुन ली. तुमसे कुछ वार्तालाप करनी थी हमें"
"अब इसके लिए भी आपको इतना सोचना पड़ेगा अथवा किसी से अनुमति लेनी होगी?"
"नहीं हमारा वो तात्पर्य नहीं" इतना कहते ही राजकुमार जैसे ही पीछे मुड़े उनकी हँसी छूट गयी.
"क्या हुआ भाई सा? हँसी क्यों आ गयी?"
"दर्पण...दर्पण वाली राजकुमारी"
"आ वो…" अचानक राजकुमारी को याद आया तोते को अंदर करने में वो अपना दर्पण उतारना ही भूल गयीं.
"याद आया, हमने ही कहा था अपनी सूरत देखने के लिए दर्पण साथ में रखा करो. तुमने तो गले में ही लटका लिया"
दोनों ही हँस पड़े.
"अच्छा भाई सा अपनी व्यग्रता का कारण तो बताइये हमें"
एक जोड़ा उम्मीद
और प्रदूषण मत फैलाओ
मैं हवा हूँ
उठाती हूँ गिराती हूँ
नज़र नहीं आती हूँ
प्रदूषित नहीं होना चाहती हूं
मुझे बचाओ
प्रथ्वी के प्राणियों मुझे नज़र न लगाओ
मुझे बचाओ
मैं जल हूँ
घर से नदी-नालों तक
करता कल-कल हूँ
उत्तर से दक्षिण तक
चलता पल-पल हूँ
मुझमें कचरा न फैलाओ
मुझे बचाओ
घने बादल न चुराओ
मुझे बचाओ
मैं जंगल हूँ
वृक्ष-वृक्ष से मैं बनता
तूफानों में सीधा तनता
औषधि, वायु और फूल-फल
लेती मुझसे सारी जनता
मुझ पर आरी न चलवाओ
मुझे बचाओ
मैं तारा हूँ
रातों का दुलारा हूँ
खो गया चकाचौंध में
खोज पाओगे, तो प्यारा हूँ
मैं सूरज हूँ
आता हर रोज हूँ
ग्रीष्म में दिखाते हो आँखें
शीत में खोज हूँ
मैं चंदा
कहलाता मामा हूँ
और हूँ अच्छा बंदा
मैं धरती हूँ
माता कहते मुझको
मेरे बच्चों, तुम्हारा भार सहती हूँ
मुझसे हवा, जल, जंगल न चुराओ
मुझे बचाओ
सब की सखी
तुम सभी के जैसी
मैं भी हूँ दुःखी
मैं पर्वत अरावली
लेकर मशीनें घूम रहे तुम
मैं सीना तान खड़ा हूँ
तुम सबके लिए
प्रदूषण से लड़ा हूँ
अब तुम मुझी से लड़ रहे हो
कर जीवन को मरण रहे हो
मैं मानव
मुझे इतना न करो लज्जित
मैं सबसे पराजित
लेता हूँ शपथ
स्वच्छ रखूँगा जगत
त्राहिमाम न करो
मुझे अपनी शरण लो
यदि जंगल कटे तो औषधि नहीं
पर्वत कटे तो परिधि नहीं
सूरज चाचू, चंदा मामा, धरा हमारी माता है
मौसम और जलवायु से गहरा हमारा नाता है
जिसने हमको जीवन दिया, उसे बचाने की बारी
कसकर कमर कर ली है तैयारी
स्वामी विवेकानंद का मनोवैज्ञानिक और सामाजिक दृष्टिकोण
स्वामी विवेकानंद केवल एक आध्यात्मिक गुरु नहीं थे, बल्कि वे आधुनिक इतिहास के सबसे गहरे "आत्मा के मनोवैज्ञानिक" और सामाजिक इंजीनियरों में से एक थे. उनका दर्शन केवल दुनिया की व्याख्या करने तक सीमित नहीं था, बल्कि उसका उद्देश्य व्यक्ति के आंतरिक परिदृश्य को बदलकर बाहरी सामाजिक परिवर्तन लाना था. प्राचीन वेदांतिक ज्ञान और आधुनिक समाज की जरूरतों के बीच सेतु बनाकर, विवेकानंद ने एक ऐसे जीवन का खाका तैयार किया जो गहरा आत्मनिरीक्षण और सक्रिय कर्म दोनों का मिश्रण है.
मनोवैज्ञानिक केंद्र: निर्भयता और आत्म-साक्षात्कार
विवेकानंद के मनोवैज्ञानिक ढांचे के केंद्र में आत्म-शक्ति की अवधारणा है—प्रत्येक मनुष्य के भीतर निहित अनंत शक्ति. उन्होंने मानवता की प्राथमिक मनोवैज्ञानिक बीमारी "कमजोरी" को माना. उनके विचार में, अधिकांश मानसिक पीड़ा और नैतिक विफलताएं एक खंडित आत्म-छवि से पैदा होती हैं जहाँ व्यक्ति खुद को "भेड़" के रूप में देखता है, न कि "शेर" के रूप में.
सकारात्मक आत्म-छवि: उन्होंने प्रसिद्ध रूप से सिखाया कि "अपने आप को कमजोर समझना सबसे बड़ा पाप है." उनका मनोविज्ञान मौलिक सशक्तिकरण का था, जिसने नियंत्रण के केंद्र को बाहरी भाग्य से हटाकर आंतरिक इच्छाशक्ति पर केंद्रित किया.
मन नियंत्रण का विज्ञान: आधुनिक संज्ञानात्मक-व्यवहार चिकित्सा (CBT) के उदय से बहुत पहले, विवेकानंद ने मन को एक "शराबी बंदर" कहा था जिसे राजयोग के माध्यम से पालतू बनाया जाना चाहिए. उन्होंने तर्क दिया कि एक नियंत्रित मन ही भ्रम के पर्दे को चीरने और "मनुष्य बनाने वाली शिक्षा" (Man-making education) प्राप्त करने में सक्षम है.
निर्भयता (Abhaya): उन्होंने एक "नीचे से ऊपर" वाले मनोवैज्ञानिक सुधार को प्रोत्साहित किया. अपने विचारों की पूरी जिम्मेदारी लेकर, एक व्यक्ति 'अभय' की स्थिति विकसित कर सकता है, जिसे वे किसी भी सार्थक जीवन के लिए अनिवार्य शर्त मानते थे.
सामाजिक दृष्टि: व्यावहारिक वेदांत और सामूहिक उत्थान
विवेकानंद का सामाजिक दर्शन उनके मनोवैज्ञानिक अंतर्दृष्टि का ही विस्तार था. उन्होंने "एकत्व" की अमूर्त अवधारणा को एक व्यावहारिक सामाजिक मिशन में बदल दिया: "जीव ही शिव है" (मानवता की सेवा ही ईश्वर की सेवा है). इस "व्यावहारिक वेदांत" ने तीन प्राथमिक स्तंभों के माध्यम से सामाजिक जड़ता को तोड़ने की कोशिश की:
शिक्षा, सामाजिक समानता, सार्वभौमिकता
उन्होंने उन अंधविश्वासों और कुरीतियों की कड़ी आलोचना की जिन्होंने भारतीय समाज को पंगु बना दिया था. विवेकानंद के लिए, एक समाज उतना ही मजबूत होता है जितना उसकी सबसे कमजोर कड़ी. उन्होंने एक "वेदांतिक समाजवाद" की कल्पना की जहाँ पूर्व की आध्यात्मिक विरासत और पश्चिम की वैज्ञानिक प्रगति मिलकर गरीबी और निरक्षरता की समस्याओं को हल कर सकें.
निष्कर्ष: वैश्विक नागरिक
विवेकानंद की प्रासंगिकता आज उनके 'आंतरिक' और 'बाहरी' के संश्लेषण में निहित है. उन्होंने सिखाया कि हम शुद्ध व्यक्तियों के बिना एक शुद्ध समाज नहीं पा सकते, और इसके विपरीत, सामाजिक सेवा के बिना व्यक्ति का आध्यात्मिक विकास अधूरा है. युवाओं को "उठो, जागो और तब तक मत रुको जब तक लक्ष्य प्राप्त न हो जाए" का आह्वान देकर, उन्होंने एक ऐसी मनोवैज्ञानिक चिंगारी सुलगाई जो आज भी न्याय, शिक्षा और मानवीय गरिमा के आंदोलनों को प्रेरित करती है.
सिलेक्टिव दुःखनवीस
मैं
वही तुम्हारा भारत महान
साॅरी अब और ज़्यादा महान
चुन लेता हूँ
किस हिस्से को 'दीपू' की मौत पर
और किस हिस्से को
'चकमा' की मौत पर मातम मनाना है
मैं सिलेक्टिव दुःखनवीस हूँ
चुन लेता हूँ
किसे चाहिए अपनी
'अरावली' पर आंदोलन
किसे 'सेंगर' को बचाना है
मैं एक्सेप्ट मोड डिनायल पीस हूँ
चुन लेता हूँ
सुपरसोनिक सा मौन
तो कभी ज़ीरो डेसीबल का शोर
सनलाइट में ब्लैक आउट
रेडिएशन में लगी ग्रीस हूँ
तुम ईश्वर हो
कितना मनहूस होता है
वो लम्हा
जिनमें हम साझा करते हैं
किसी मौत की ख़बर
असहज होता है बोलने वाला
अवाक रह जाता है सुनने वाला
वो एक लम्हा
ख़त्म कर जाता है
कितना कुछ
बंद हो जाती हैं अनगिनत रिश्तों की किताबें
बीतते सालों सी
क्यों नहीं होती ज़िन्दगी
कि जी लेते हम भी
हर जीवन के दिसम्बर की इकतीस एक साथ
पचीसवीं से इकतीसवीं तक होते जश्न
और मध्य रात्रि का प्रस्थान
सुनो ईश्वर
क्यों नहीं ले लेते रिश्वत थोड़ी
और बदल देते मौत की सेटिंग?
हमें नहीं चाहिए अभिमन्यु और भीष्म
ऐसे सजाओ न जीवन
जैसे आते हैं शीत और ग्रीष्म…
तुमने सर्दियाँ बनायीं
और तुम्हीं कराते हो सर्दियों से मौतें
गर्मियाँ भी तुम्हारी
और इनसे होता हृदयाघात भी तुमने कराया
कोई रील भर जीता है
किसी का जीवन एण्डलेस वीडियो
कहीं वात्सल्य तो कहीं माया
कैसे कर पाते हो इतना स्वांग
आओ कभी चाय पर
ओह साॅरी ‘फीकी चाय’ पर
क्या है कि मध्यम वर्ग और गरीब हो गया
बदन से कफ़न तक छिनवाकर
गरीब जो है न, खो चुका है अपना ख़िताब
छोड़ो तुम्हें क्या पड़ी,
शान बघारनी है मुझे भी
उधार की शकर की मीठी चाय पिलाकर
जैसे शान बघारी जाती है
एक दिन की सड़क बनाकर
‘कट इट आउट’
चाय पीकर सेल्फी लेना
और करना प्रेस कांफ्रेंस भी
कितने सुखी हैं सब यहाँ
तुम ईश्वर हो
जो कह दोगे मान लेंगे हम
जो करते हो
उसे भी तो कर ही लेते हैं एक्सेप्ट
अंग्रेजी में
एक पोशीदा मौत
मैं मर रही हूँ
इच्छाशक्ति की शक्ति
नवरात्रि के नौ दिन, जो भक्ति, नृत्य और उत्सव का एक जीवंत प्रदर्शन हैं, अपने मूल में एक गहरा व्यक्तिगत और गहन अभ्यास छिपाए हुए हैं: नवरात्रि का उपवास. इसे अक्सर धार्मिक या सांस्कृतिक दृष्टिकोण से देखा जाता है, लेकिन यह वार्षिक अनुष्ठान मानव मनोविज्ञान का एक आकर्षक अध्ययन भी है. यह एक ऐसी यात्रा है जो सिर्फ़ खान-पान के नियमों से परे है, जो हमारी इच्छाशक्ति, भावनात्मक नियंत्रण और खुद के साथ-साथ दुनिया के साथ हमारे संबंधों को भी छूती है.
इच्छाशक्ति की शक्ति
विशेष रूप से लगातार नौ दिनों तक उपवास शुरू करने का कार्य, इरादे को स्थापित करने का एक शक्तिशाली अभ्यास है. कुछ खाद्य पदार्थों और आदतों से दूर रहने का निर्णय एक सचेत विकल्प है, जो अपनी इच्छाओं पर नियंत्रण की घोषणा करता है. यह आत्म-संयम, सज़ा का एक रूप होने के बजाय, सशक्तिकरण का एक स्रोत बन जाता है. मनोवैज्ञानिक रूप से, यह इस विश्वास को पुष्ट करता है कि हम अनुशासन और आत्म-नियंत्रण में सक्षम हैं. शुरुआती दिन चुनौतीपूर्ण हो सकते हैं, लेकिन जैसे-जैसे उपवास आगे बढ़ता है, उपलब्धि की भावना बढ़ती है, जिससे हमारी क्षमता की भावना मजबूत होती है. यह मनोवैज्ञानिक प्रशिक्षण एक लहर जैसा प्रभाव डाल सकता है, जो जीवन के अन्य क्षेत्रों में भी लागू हो सकता है जहाँ अनुशासन की आवश्यकता होती है, जैसे काम, अध्ययन या व्यक्तिगत लक्ष्य.
संवेदी अभाव और बढ़ी हुई जागरूकता
हमारा आधुनिक जीवन संवेदी उत्तेजनाओं का एक निरंतर प्रवाह है, खासकर भोजन से। हमें खाने के माध्यम से तत्काल संतुष्टि और आराम पाने के लिए वातानुकूलित किया जाता है. नवरात्रि का उपवास जान-बूझकर इस पैटर्न को बाधित करता है. सामान्य लालसाओं और आदतन खाद्य पदार्थों को खत्म करके, उपवास संवेदी अभाव का एक रूप बनाता है. यह अभाव अपने आप में नहीं है, बल्कि निरंतर उपभोग से उत्पन्न मानसिक कोहरे को साफ़ करने के बारे में है।
जब सामान्य संवेदी इनपुट कम हो जाते हैं, तो बाकी चीजों के बारे में हमारी जागरूकता बढ़ जाती है. "सात्विक" भोजन (शुद्ध और आध्यात्मिक रूप से उत्थान करने वाले भोजन) का साधारण स्वाद अधिक स्पष्ट हो जाता है। हम उन सूक्ष्म स्वादों और बनावटों की सराहना करना सीखते हैं जिन्हें हम अन्यथा अनदेखा कर सकते हैं. यह बढ़ी हुई जागरूकता भोजन से परे है; यह सामान्य तौर पर माइंडफ़ुलनेस की अधिक भावना पैदा कर सकती है। हम अपनी शारीरिक संवेदनाओं, अपनी भावनाओं और अपने परिवेश के प्रति अधिकF सचेत हो जाते हैं। यह सक्रिय ध्यान का एक रूप है, जो हमें ऑटोपायलट पर होने के बजाय वर्तमान क्षण में मौजूद रहने के लिए मजबूर करता है.
भावनात्मक नियंत्रण और शरीर-मन का संबंध
नवरात्रि का उपवास केवल इस बारे में नहीं है कि आप क्या नहीं खाते हैं; यह इस बारे में भी है कि आप कैसा महसूस करते हैं. बहुत से लोग उपवास के दौरान शांति, स्पष्टता और भावनात्मक संतुलन की भावना महसूस करते हैं. यह सिर्फ़ एक आध्यात्मिक घटना नहीं है; इसका एक शारीरिक आधार भी है. प्रसंस्कृत खाद्य पदार्थ, कैफीन और चीनी को कम करने से रक्त शर्करा के स्तर में स्थिरता आ सकती है, जिससे मूड में बदलाव और चिंता कम हो सकती है. शरीर की ऊर्जा पाचन से हटकर अन्य प्रक्रियाओं, जिसमें मानसिक स्पष्टता भी शामिल है, की ओर निर्देशित होती है.
इसके अलावा, उपवास आत्मनिरीक्षण के लिए एक निर्धारित समय प्रदान करता है. जब ध्यान बाहरी सुखों और भोगों से हट जाता है, तो यह स्वाभाविक रूप से आंतरिक रूप से मुड़ जाता है. उपवास अक्सर प्रार्थना, ध्यान और सामाजिक विकर्षणों में कमी के साथ होता है. यह शांत समय भावनात्मक प्रसंस्करण और आत्म-प्रतिबिंब की अनुमति देता है. यह उन चिंताओं, अनसुलझी भावनाओं, या बेचैनी की भावना का सामना करने का अवसर प्रदान करता है जिसे हम अन्यथा भोजन या अन्य विकर्षणों से छिपा सकते हैं. इस तरह, उपवास भावनात्मक नियंत्रण के लिए एक उपकरण बन जाता है, जो हमें भीतर से आराम और शक्ति खोजना सिखाता है.
साझा उद्देश्य का एक समुदाय
हालांकि उपवास एक गहरा व्यक्तिगत यात्रा है, लेकिन यह एक सांप्रदायिक अनुभव भी है. भारत और दुनिया भर में लाखों लोग एक ही अनुष्ठान में भाग ले रहे हैं. यह साझा उद्देश्य समुदाय और अपनेपन की एक शक्तिशाली भावना पैदा करता है. परिवार और दोस्तों की सहायता प्रणाली, जो उपवास भी कर रहे हैं, प्रेरणा और प्रोत्साहन प्रदान कर सकती है. यह सामूहिक ऊर्जा अकेलेपन की भावना को कम करती है जो कभी-कभी आहार प्रतिबंधों के साथ हो सकती है.
सांप्रदायिक पहलू भी मनोवैज्ञानिक लाभों को पुष्ट करता है. अनुशासन की साझा कहानियाँ, विशेष व्यंजनों का आदान-प्रदान, और आध्यात्मिक उत्थान की सामूहिक भावना एक शक्तिशाली प्रतिक्रिया लूप बनाती है. प्रयास की सामाजिक मान्यता व्यक्ति के संकल्प को मजबूत करती है और सकारात्मक मनोवैज्ञानिक परिणामों को पुष्ट करती है.
एक समग्र पुन:स्थापन
मनोविज्ञान के लेंस से देखने पर, नवरात्रि का उपवास समग्र कल्याण के लिए एक परिष्कृत और प्रभावी अभ्यास है. यह इच्छाशक्ति बनाने, माइंडफ़ुलनेस विकसित करने, भावनाओं को नियंत्रित करने और समुदाय की भावना को बढ़ावा देने के लिए एक समय-परीक्षणित विधि है. यह हमारे दैनिक जीवन की लय में एक उद्देश्यपूर्ण विराम है, शरीर के साथ-साथ मन को भी शुद्ध करने का एक समय है। एक ऐसी दुनिया में जो हमें लगातार अधिक उपभोग करने के लिए प्रोत्साहित करती है, नवरात्रि का उपवास जानबूझकर संयम और आत्म-खोज की यात्रा में पाई जाने वाली शक्ति और शांति की एक गहन याद दिलाता है. यह एक मनोवैज्ञानिक पुन:स्थापन है जो हमें न केवल शारीरिक रूप से हल्का महसूस कराता है, बल्कि मानसिक और भावनात्मक रूप से भी अधिक स्पष्ट महसूस कराता है, जिससे हम नई ताकत और उद्देश्य के साथ दुनिया का सामना करने के लिए तैयार होते हैं.
मेरी पहली पुस्तक
http://www.bookbazooka.com/book-store/badalte-rishto-ka-samikaran-by-roli-abhilasha.php
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•स्मृति क्या है? °बीते हुए कल के शोर की प्रतिध्वनि •शोर क्यों स्वर क्यों नहीं? °जिस प्रकार हमारी सूक्ष्म देह होती है ठीक उसी प्रकार सूक्ष्म...
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•एक उचाट सा मन लिए कोने कोने घूमता हूँ मैं गैटविक हवाई अड्डा हर गुज़रने वाले चेहरों में ए आई वन सेवन वन के यात्रियों को खोजता हूँ जो उस रोज...






