शुक्रवार, 31 जुलाई 2020

तीन लघुकथाएँ

(१) प्रेम जो प्रेमिका को खाता है


उसके हाथों ने छत नहीं अचानक आसमान को छू लिया. नए-नए प्रेम का असर दिख गया. ढीठ मन सप्तम स्वर में गा दिया गोया दुनिया को जताना चाह रही हो कि अब तो उसका जहाँ, प्रेम की मखमली जमीन है बस क्योंकि प्रेम उरूज़ पर था.

फिर एक रोज चौखट पर रखा दिया अचानक बुझ गया और उसकी शाम कभी नहीं हुई. हवा के बादलों पर बैठकर वो आसमान कहाँ छू पाती? एक ख़्वाब ज़िंदा लाश बन गया उसके अंदर.



(२) प्रेम जो प्रेमी को खाता है


उसके कपड़ों की क्रीज़, परफ़्यूम की महक, हेयर कलर और गॉगल्स के पीछे मुस्कराता चेहरा आजकल सभी की निगाह में है. ग्रेजुएशन की पढ़ाई एक ओर हो गयी, अपाचे तो ख़ुद ब ख़ुद डिस्को, होटल और लांग ड्राइव के लिए मुड़ जाती है.

उस रोज बारिश ज़ोरों पर थी फिर भी अपाचे स्टार्ट कर वो वेट कर रहा था. लोमबर्गिनी से उतरती अपनी माशूका को देखकर उसकी आँखों का रंग अचानक बदल गया. अगले दिन शहर के अखबारों में सुर्खियां टहलती रहीं--ईर्ष्या की जलन किसी के चेहरे पर तेजाब बन बही.



(३) समाज जो प्रेम को खाता है


पहली बार दवा की एक दुकान पर दोनों मिले थे. एक को बीमार माँ तो दूसरे को बहन के लिए दवाई चाहिए थी. सूखा चेहरा, मैले कपड़े, अबोले से वो दो क़रीब आ गए. अब दवा के ग्राहक दो नहीं एक ही होता. कभी-कभी माँ और बहन की तीमारदारी भी एक ही कर लेता.

दर्द न बाँट सकने वाला समाज ही उनके ख़िलाफ़ खड़ा हो गया. समाज की आँखों में बेचारगी, लाचारी, जरूरत, स्नेह, मोह… कुछ न आया बस उनका लड़का और लड़की होना खटका. दो से जस तस एक हुए वो दोनों पहले अलग फिर सिफ़र हो गए. किसी का न होना इतना बुरा नहीं पर आकर चले जाना सच जानलेवा ही तो है.


विशेष- इस श्रंखला की तीन लघुकथा. इसे लिखने की प्रेरणा मुझे तेजस पूनिया जी की कहानी "शहर जो आदमी खाता है" को पढ़कर मिली.

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सोमवार, 23 जुलाई 2018

तब भी हम होंगे...


PICTURE CREDIT:SHUTTERSTOCK

हमारे बाद हम...
क्या कहा
कहीं नहीं होंगे????
धत्त्तत..
तभी तो हम होंगे
जब भी खोलोगे यादों को
जंग लगी चूलें चरमराएँगी,
तुम उस बहँगी में लटके मुस्कराओगे,
न्यूटन की बातों में कितने टन का वजन था
हमें क्या पता
मगर बात पते की और वज़नी थी,
वो जो गुरुत्व होता है न
सारा का सारा आत्मा में होता है
ये तो धरती की छाती है
जो हमें रोके रखती है अपने ऊपर;
मन को भी न, समझो इसी तरह
चेहरे तो बहुतेरे देखे जीवन भर
हमसे अच्छे और सुंदर भी
पर आकर्षण तो मन का था,
और तब तुम
समझौते की तुला में
हमारा अपनापन न तोल पाओगे
कि हर आत्मा एक दिन निःश्वास होती है;
तुम्हारी चीखें घुट रही होंगी,
तुम तो विलाप भी न कर पाओगे
हमारी मृतप्राय काया पर,
जब हमें नहलाया जा रहा होगा
कफ़नाने को
तुम चिल्लाओगे...
'बहुत डरती है वो ठंडे पानी से..'
फिर हमारी स्थूल सी देह
बांस की डोली में लिटाओगे
शोक कम करने को
राम-नाम....बोलते जाओगे,
करने से पहले हमको अग्नि में समर्पित
तुम वो कड़वाहटें जलाओगे
जो हमको अक्सर रुलाती थीं,
कुछ हमारी गलतियाँ थीं
बाकी तुम्हारी ज़िद
जो आज बोल रही हैं,
हम कल तक एक हस्ताक्षर थे
आज दस्तावेज हो गए,
काश, कि साँसें रहते 
जीवन जी लिया होता!

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सोमवार, 22 जनवरी 2018

मैं मृत्यु हूँ...

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कोई भी मुझे जीत नहीं सकता 
मैं अविजित हूँ,
गांडीव, सुदर्शन, ब्रह्मास्त्र हो या
ए के-47...56
इनकी गांधारी हूँ मैं,
समता-ममता, गरिमा-उपमा
मद, मोह, लोभ-लालच,
ईर्ष्या, तृष्णा, दया,
शांति...आदि 
सभी उपमाओं से परे हूँ;
मेरा वास हर जीवन में है
जन्म के समय से पहले ही
मेरा निर्धारण हो जाता है
बूढ़ा, बच्चा और जवान 
मैं कुछ भी नहीं देखती
क्योंकि मैं निर्लज्ज हूँ;
गरीबी-अमीरी कुछ भी नहीं है
मेरे लिए,
दिन क्या रात क्या,
झोपड़ी, महल और भवन
इनके अंदर साँसे लेता जीवन
मेरी दस्तक से ओढ़ता है कफन
इमारतें हो जाती हैं बियाबान
मंजिल है हर किसी की
बस शमशान;

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..........
अगर नहीं किया मेरा वरण
तो कैसे समझोगे प्रकृति का नियम
बिना पतझड़
कैसे होगा बसंत का आगमन,
पार्थ को रणक्षेत्र में
मिला है यही ज्ञान
मौत से निष्ठुर बनो
न हो संवेदनाओं का घमासान
गर डरो तो बस इतना कि 
मैं आऊँ तो मुस्करा कर मिलना
अभी और जीना है
अच्छे कर्म करने को
ये पश्चाताप मन में न रखना,
मेरा आना अवश्यम्भावी है
मैं कोई अवसर भी नहीं देती,
दबे पाँव, बिन बुलाए
आ ही जाऊंगी
करना ही होगा मेरा वरण
फिर क्यों नहीं सुधारते ये जीवन
पूर्णता तो कभी नहीं आती
अंतिम इच्छा हर व्यक्ति की
धरी ही रह जाती है,
पूरी करते जाओ
अंतिम से पहले की हर इच्छाएं,
ध्यान रखो 
औरों की भी अपेक्षाएं:
मैं तो आज तक
वो चेहरा ढूंढ रही हूँ
जिसके माथे पर
मेरे डर की सिलवटें न हों,
जिसके मन में
'कुछ पल और' जीने की
इच्छा न हो!

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मंगलवार, 12 दिसंबर 2017

From sign to death certificate


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मंगलवार, 5 दिसंबर 2017

We defeat death everyday....


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मंगलवार, 14 नवंबर 2017

मुझे एक सोसाइटी बनानी है


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मुझे फीता काटना है
और दीप भी प्रज्ज्वलित करना है
हाँ, मुझे एक सोसाइटी बनानी है
ऐसे लोगों की
जिनके चेहरे प्लास्टिक के न हों,
जहाँ चाँद हर आँगन में हो,
खुशियों को तोलने वाला वहाँ
कोई तराजू न हो;
जहाँ पैसा जरूरत के हिसाब से हो,
कोई बड़ा या छोटा न हो,
अमीर और गरीब भी न हो,
बस एक बस्ती हो इंसानों की
हांड-मांस का जो
पुतला भर न हो,
अपने स्वार्थ के लिये जहाँ इंसान
मुर्दे न बन जाते हों,
वो बस्ती होगी
हम सब के सपनों की,
मुस्कराहटों की,
ईर्ष्या और जलन का प्रदूषण न होगा
हर घर में भाईचारा नहीं
हर मन में दिखेगा।

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मंगलवार, 27 जून 2017

Why the way of suicide?

Suicide is not only a word
That means
To kill themselves,
But a murder.
When they smother the sense,
Feelings, expectations, relations.
Human being is creator,
Why don't want
to live in harmony,
Feel themselves as defeater,
Why there is so monotony?

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