मनुष्य की सबसे बड़ी पीड़ा वह नहीं जो उसे मिली, बल्कि वह है जो उसे मिलनी चाहिए थी और नहीं मिली.
~दोस्तोयेवस्की
मनुष्य का जीवन उपलब्धियों और अभावों की एक निरंतर चलती रहने वाली कहानी है. हम अक्सर यह मानते हैं कि हमारी सबसे बड़ी पीड़ा वह 'चोट' है जो हमें लगी है चाहे वह असफलता हो, आर्थिक हानि हो या किसी प्रियजन का बिछोह. किंतु गहराई से विचार करने पर यह सत्य उभरता है कि मिली हुई पीड़ा से कहीं अधिक गहरी वह टीस होती है जो 'अप्राप्यता' से जन्म लेती है. यह विचार कि "जो हमें मिलना चाहिए था, वह नहीं मिला", एक ऐसी मानसिक फाँस है जो जीवन भर हृदय में चुभती रहती है.
मनोविज्ञान की दृष्टि से देखें तो मिली हुई पीड़ा का एक 'अंत' होता है. यदि कोई दुर्घटना हुई, तो समय के साथ उसके घाव भर जाते हैं. मनुष्य की चेतना उसे स्वीकार कर लेती है और अनुकूलन (adaptation) की प्रक्रिया शुरू हो जाती है. लेकिन जो 'मिलना चाहिए था' और नहीं मिला, वह कभी घटित ही नहीं हुआ, इसलिए उसका कोई अंत भी नहीं होता. वह एक 'अधूरी संभावना' बनकर मन के किसी कोने में जीवित रहता है.
यह पीड़ा कई रूपों में सामने आती है. जब एक योग्य व्यक्ति को वह पद या सम्मान नहीं मिलता जिसका वह हकदार था, तो वह न्याय की कमी को महसूस करता है. बचपन में माता-पिता का अपेक्षित प्रेम न मिलना या जीवनसाथी से वह सम्मान न मिलना जिसकी व्यक्ति को आशा थी. वह करियर या वह मुकाम जो बस एक कदम की दूरी पर था, पर मिल न सका. इस पीड़ा का सबसे बड़ा कारण 'अपेक्षा' और 'तुलना' है. जब हम देखते हैं कि हमसे कम योग्य व्यक्ति वह सब प्राप्त कर रहा है जिसके लिए हमने कठिन परिश्रम किया, तो 'न्याय की अवधारणा' खंडित हो जाती है. मिली हुई पीड़ा को हम 'भाग्य' मानकर स्वीकार कर लेते हैं, लेकिन अप्राप्त वस्तु को हम 'अन्याय' मानते हैं. अन्याय की यह भावना मनुष्य को भीतर से कुंठित कर देती है.
यह दुःख एक 'शून्य' (void) की तरह होता है. शून्य को भरना कठिन है क्योंकि वह अदृश्य है. मिली हुई चोट का इलाज संभव है, पर उस रिक्तता का क्या करें जो कभी भरी ही नहीं गई?
भारतीय दर्शन में इसे 'तृष्णा' और 'असंतोष' के संदर्भ में देखा गया है. बुद्ध कहते हैं कि दुःख का मूल चाहत है. जब हम "जो मिलना चाहिए था" पर ध्यान केंद्रित करते हैं, तो हम वर्तमान की उन चीजों को भूल जाते हैं जो हमें "मिली हुई" हैं. यह पीड़ा दरअसल हमारे अहंकार और भविष्य की उन कल्पनाओं का परिणाम है जिन्हें हमने सच मान लिया था.
"स्मृति की गलियों में वह मोड़ सबसे अधिक डराता है, जहाँ हम वह नहीं बन पाए जो हम बन सकते थे"
इस सबसे बड़ी पीड़ा से मुक्ति का केवल एक ही मार्ग है- स्वीकार्यता (Acceptance). यह स्वीकार करना कि जीवन रैखिक (linear) नहीं है और न ही यह हमेशा 'योग्यता बनाम प्रतिफल' के गणित पर चलता है. जो नहीं मिला, उसे 'अस्तित्व का निर्णय' मानकर छोड़ देना ही मानसिक शांति का द्वार है.
अंततः, मनुष्य की सबसे बड़ी पीड़ा उसकी वह 'काल्पनिक पूर्णता' है जिसे वह प्राप्त नहीं कर सका. मिली हुई पीड़ा हमें मजबूत बनाती है, लेकिन न मिलने वाली पीड़ा हमें खोखला कर सकती है. यदि हम इस सत्य को आत्मसात कर लें कि जीवन केवल वही नहीं है जो हमें मिलना चाहिए था, बल्कि वह भी है जो हमारे पास आज है, तो हम इस अदृश्य टीस से मुक्त हो सकते हैं. रिक्तता को कोसने से बेहतर है कि जो उपलब्ध है, उससे अपना संसार सजाया जाए.