सबक
एक नाराज बच्चे ने एक हृदय की धड़कन सुनी और वह खुश हो गया. वह बच्चा धड़कते हृदय से कहने लगा, "मैं तुम्हारे प्यार में पड़ गया हूँ"
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एक नाराज बच्चे ने एक हृदय की धड़कन सुनी और वह खुश हो गया. वह बच्चा धड़कते हृदय से कहने लगा, "मैं तुम्हारे प्यार में पड़ गया हूँ"
देव तीसरी सिगरेट निकालने ही जा रहा तभी सुरीली ने आगे बढ़कर उसका हाथ रोक लिया.
लेबल: कहानी
"मैं तुमसे बात नहीं कर पाऊँगा, हाँ ये जानता हूँ तुम मुझसे बहुत प्यार करती हो और शायद यही वजह भी है"
उसके दायें कंधे पर तिल नहीं था मगर ये तो बस उसे पता था. मुझे इतना मालूम है कि आज लिखने की मेज पर जब बैठी तभी अचानक मेरे मन में एक रुमान उभरा...अगर प्रेमी के दायें कंधे पर तिल हो, प्रेमिका अपने होंठ उस पर रखे तो प्रेमी के मन की सिहरन मेरी कविता के पन्नों को कितना गुलाबी कर सकेगी...
लेबल: आजादी का अमृत महोत्सव, कहानी, केसरिया, तिरंगा, लघुकथा, स्वतंत्रता दिवस
कुम्हार चाक पर कच्ची मिट्टी को हाथों की थाप से गढ़ा करता था. उसके बनाये हुए घड़े लोगों में इतने पसंद किए जाते थे कि बिना वजह ही लोग लेते थे. कुछ लोग तो बस देखने ही आते थे. उनकी सबसे बड़ी विशेषता एक ओर झुका होकर भी संतुलन बनाये रखना था. कुम्हार के अंदर न तो गर्व था न ही पैसों का लालच. एक दिन एक गायक उधर से गुजरा उसे भी ये कला पसंद आयी. वो वहीं बैठकर रियाज़ करने लगा.
एक दिन उसने कुम्हार के मन में ये बात डाल दी कि उसके गीतों से ही घड़ों ने संतुलन बनाना सीखा. कुम्हार मुग्ध था गायक पर उसकी बात मानता चला गया. फिर गायक बोला कि सभी के घड़े तो टेढ़े नहीं होते फिर तुम्हारे ही क्यों? कुम्हार को अपनी खासियत ही कमी लगने लगी...गायक को सुनकर उसकी चाक पर हाथों की थाप धीरे धीरे सीधी पड़ने लगी. गायक की रुचि घड़ों में कम हुई वो चला गया और एक दिन सब की रुचि भी...अब कुम्हार घड़े नहीं बनाता गीत गाता है.
उँगली पर गिनने भर को ही दिन हुए थे शादी को हमारी. मेरा जीवन उसकी ख़ुश्बू से महकता इससे पहले ही मेरे जीवन की सुहागरात हो गयी थी. एक-दूसरे को स्पर्श करना तो दूर हमने आँख भी नहीं मिलायी. सात फेरों के साथ उसे अपना बनाकर लाया था. मेरा ध्येय उसकी देह नहीं था. अपनी भावनाएँ मार चुका था. अब कर्तव्य की बारी थी.
बहुत हिम्मत जुटाई मैंने उसकी तरफ श्वेत ग़ुलाब बढ़ाया ये कहकर कि इसमें जो चाहे रंग भर ले.
उसने साड़ी का पल्लू आगे बढ़ाया, "इसे श्वेत ही रहने देते हैं."
स्थिति स्पष्ट हो चुकी थी. मेरे चेहरे पर पसरी थकान ने देह को निढ़ाल कर दिया. रात लगभग दो बजे नींद खुली तो बिस्तर का वो स्थान रिक्त मिला. कमरे का पूरा सामान अपनी जगह था बस वो श्वेत ग़ुलाब छोड़कर.
मुझे चंद रात दीं पर उसी चाँद रात वो उठकर चली गयी थी.
तीन महीने की अनुभूति और तीन रातों की देखा-देखी बस जब संग इतना सा ही था तो मन शीघ्र ही उचाट होने लगा. घर पर भी मैं कम समय रुकने लगा. दीदी बात-बात पर परेशान हो उठती. पापा मुझसे कुछ नहीं कह पाते तो मेरे हिस्से का भी वो ही सुनती. सौभाग्या के साथ शेष समय बीतता रहता. कभी टी वी तो कभी उसकी तोतले स्वर में कहानियाँ बस यही चलता. खाने की मेज पर पसरा सन्नाटा और अधिक है अब. आँखों में पनपी अपेक्षा ने इसे बढ़ाने का काम किया. पहले से ही मैं कोई बहुत अधिक उत्सुक नहीं रहा विवाह को लेकर. काम के स्थान से लेकर मित्रों तक यही शिकायत रही कि सब कुछ अकेले ही कर लिया. वो तो अच्छा हुआ कि सब कुछ अकेले ही हुआ. अनुमेहा कहानी बनने से बच गयी.
खाने के बाद सौभाग्या से कुछ वार्तालाप और सोने की बारी. सौभाग्या रोज की तरह अपनी मामी का सामान देखने लगी. कितने मन से पापा ने हर उस सामान से कमरा भर दिया था जिसकी आवश्यकता अनुमेहा को होती. उसके पापा को स्पष्ट बोल दिया था कि वो अपनी बेटी को बस उन कपड़ों में विदा करें जिन्हें पहनकर वो हमारे घर में अपने शुभ क़दम रखेगी. आज भी सौभाग्या मुझसे कह कर सोने गयी कि सुबह होते ही मैं उसकी मामी को लेकर आऊँ.
एक अनचीन्हा सा स्पर्श मेरे पास क्यों रहता है अब तक. तीन महीने हो गये. न तो कोई उसका कोई साथ न ही मुड़कर आने की सूरत. पापाओं की वार्तालाप भी इस बात पर आकर समाप्त हो गयी कि ईश्वर ऐसी बेटी किसी को न दे.
मैं स्मृतियों में था तभी व्हाट्सएप संदेश की बीप हुई. रात १० बजे कौन ही याद करता तो कौतूहल वश उठाकर देखा. अपरिचित नम्बर से आये 'हेलो' का उत्तर दिया तो उधर से पुनः सन्देश आया…*कल समय हो तो हम मिलते हैं.
मेरी आँखों में विस्मय तैर गया. मेरे 'न' कहने पर उधर से कई संदेशे एक साथ आये पर कोई गुत्थी न सुलझी तो मैंने फोन बंद कर किनारे रख दिया. सुबह देखा तो अंतिम संदेश…*तुम्हारा दिया हुआ उपहार 'श्वेत ग़ुलाब' तुम्हें लौटाना है. नीचे पता लिखा था.
बहुत कुछ याद आ गया मुझे. जैसे समय आगे बढ़ने ही नहीं दे रहा झकझोर देता है और मैं चुपचाप समर्पण कर देता हूँ. सर्दियों की कड़कती हवा मेरे आसपास दर्द का मफ़लर… बस यही रह गया जीवन. अनमना सा मैं मिलने चला गया. शिफॉन की ग़ुलाबी खुले पल्लू में साड़ी के अंदर जैसे दूध और हल्दी मिश्रित कोई प्रतिमा रख दी गयी हो. अनु...मेह...मेरे स्वर को वाक तंतु ने उच्चारित होने के पहले ही अंदर खींच लिया. चेहरे पर भाव नदारद थे और शृंगार भी. माथे पर कुमकुम की बिंदी. अधर तो स्वयं ही लाल इनको लाली की जरुरत कहाँ! गर्दन की लंबाई की परिधि में लटकता हुआ मंगलसूत्र नाम का धागा अब भी है. साहस जुटाकर पैर भी देख लिए. तसल्ली की कुछ बूँदें मन को तर कर गयीं कि दोनों पैरों की उँगलियों में बिछिया भी. उसकी चंचल सी आँखें यहाँ-वहाँ जाने क्या देख रही थीं, एक बार तो मेरी आँखों में देखते ही हट गयीं. झुकी तो नहीं पर कहीं और ही घूमती रहीं.
हाय-हेलो की औपचारिक सी अनौपचारिक बात हुई. मेरे पास बोलने को कुछ नहीं था.
"जानते हो मैंने सोचा था जब हम मिलेंगे तो कोई और बात नहीं करेंगे." उसने चुप्पी तोड़ी.
"जब नहीं मिले तब भी कोई बात हुई क्या हमारे बीच?" मेरे इतना कहते ही वो चुप हो गयी.
"हमारे बीच कोई और बात न होने का कोई मतलब भी है." जाने क्यों वो घुमाना चाह रही थी.
"कोई बात होती तो क्या कोई फ़र्क पड़ने वाला था?" मैंने पूछ ही लिया.
"तुम ऐसा क्यों सोचते हो?"
"बिकॉज़ यू नो इट वुडन्ट हेल्प." मैं बाहर आकाश में छितरे बादलों को देखने लगा. शीशे की खिड़की से बाहर दिख रहे बादलों का रंग और मेरे सामने बैठी औरत का रंग मुझे एक समान लग रहा था. समझ नहीं पा रहा हूँ नीला कहूँ या स्याह. होटल पैराडाइज इन जितना अपनी भीतरी साज-सज्जा के लिए प्रसिद्ध है उतना ही बाहर दिखते मनोरम दृश्य के लिए भी. मुझे घुटन सी हो रही है. उसकी बात का कोई उत्तर नहीं दे पाया.
"क्या हमें अपना जीवन अपने हिसाब से जीने का अधिकार नहीं मिलना चाहिए?" उसने पुनः मौन तरंगों पर प्रहार किया.
"हाँ हाँ क्यों नहीं!" मैं तो जैसे इसी बात की प्रतीक्षा कर रहा था.
"तुमने मुझसे नहीं पूछा तो मैं ही बता देती हूँ."
"क्या?"
"यही कि मैं किसी से प्रेम करती हूँ." ठंडी हवा का झोंका मेरे कानों को चीरता हुआ निकल गया. क्या यही बकवास करने के लिए मुझे बुलाया था! अपने मन से ही पूछ बैठा मैं.
"अब अगर किसी और से प्रेम करती हो और अपने वैवाहिक जीवन को प्रयोग की वेदी पर रख ही चुकी हो तो चली क्यों नहीं जाती उसके पास? क्या लेने आयी हो मेरे पास? क्यों बुलाया मुझे? क्या यही सब सुनाने के लिए? बोलो...है कोई उत्तर तुम्हारे पास?" मेरा स्वर तीब्र और तेज भी हो गया था. गुस्से से मेरा चेहरा तमतमा गया. ये सच है कि उसकी ओर से ऐसा ही कुछ प्रत्याशित था परंतु सच को इस तरह सुनकर मैं स्वयं को सम्हाल नहीं पाया. मेरे कहने के दो मिनट बाद भी जब कोई उत्तर नहीं मिला तो मैंने उसके चेहरे की ओर देखा.
यह क्या! उसके चेहरे पर तो सादगी पसरी है जैसे मेरी बात का कोई प्रभाव ही नहीं. मेरे पीछे के खुले आसमान को देखकर पढ़ने का प्रयास करती सी लग रही थीं उसकी आँखें. मेरी आँखों के लगभग २० डिग्री के अंतर पर होने के कारण मैं अब अच्छे से उसका चेहरा देख पाया. आँखों के नीचे गहरे काले घेरे उभरे हुए, उसने इन पर शृंगार की कोई परत भी नहीं चढ़ायी है. एक बार मेरा मन बोला भी कि प्रेम करने वालों का तो ये चेहरा नहीं होता पर मैं गलत भी हो सकता था इस बात से सहानुभूति की एक लहर दौड़ गयी मेरे अंदर. उसका नितांत मौन हो जाना अखर गया. मैं पुनः बोल पड़ा.
"कुछ और या कहानी ख़त्म?"
"कैसे ख़त्म हो जाने दूँ अपने प्रेम की कहानी?"
"तो जाओ न उसी के पास. क्यों आयी हो यहाँ?"
"इसके लिए मुझे तुम्हारी मदद चाहिए होगी."
"कैसी मदद?"
"मैं जिसके साथ प्रेम संबंध में हूँ वो शादीशुदा है."
"अच्छा...और तुम यहाँ मेरी मदद माँगने आयी हो? क्या समझा है तुमने मुझे...तुम्हें क्या लगता है मैं एक साथ इतनी ज़िन्दगी ख़राब करुँगा?"
"तुम मुझे ग़लत समझ रहे. हम लोग बहुत दिनों से प्रेम में हैं. ऐसे कैसे छोड़ दूँ?"
"फिर तुमने मुझसे शादी क्यों की?"
"मेरे पास कोई रास्ता नहीं था. मुझे पता था कि मैं तुम्हें मना लूँगी पर…"
"पर क्या?...बोलो? और ये बातें तो तुम घर छोड़े बग़ैर भी कह सकती थीं."
"जब उसने ख़ुद शादी की तो उसे मेरी इतनी याद नहीं आयी जितनी मेरी शादी होने के बाद आयी. शायद मेरा तुम्हारी बाहों में सोना उसे अखर जाता तभी उसने मेरी शादी की रात ही मुझे अपने प्यार का वास्ता देकर समझाया और मैं ख़ुद को रोक नहीं पायी." उसकी बात सुनकर मेरे पैरों के तलवों में सुइयां सी चुभने लगीं जैसे किसी ने दोनों पाँव बाँध दिए हैं. ठण्ड कानों को सुन्न कर चुकी है. अपनी कुर्सी से उठकर किसी तरह शीशे तक गया. छूकर देखा सब कुछ ठीक है.
"तुम्हें शारीरिक रुप से कुछ नहीं हुआ है. तुम स्वस्थ हो. जब हम कोई अप्रत्याशित बात सुन लेते हैं तो सभी के साथ ऐसा ही होता है. कुछ बातों के प्रति हमारा मस्तिष्क अधिक उद्दीप्त होता है." ज्ञान की प्रयोगशाला बोलती हुई मेरे पीछे आ गयी.
'ये जिसे शॉक समझ रही ये तो एक तरह से शॉक थेरेपी है मेरे लिए पर इसे क्या पता' मैं अपने आप से बड़बड़ाया. उसकी बातों का मेरे पास न तो कोई उत्तर था न ही समाधान. मैं बाय कहकर तेजी से दरवाज़े तक आया.
"इस श्वेत ग़ुलाब का क्या करुँ मैं?" उसकी आवाज़ पर पीछे मुड़ा.
"काले रंग से रंग लेना." सहसा ही मेरे मुँह से निकल पड़ा. दस मिनट पहले का चेहरा अपनी आभा खोता दिखा. पहली बार आँखें मिलीं. बहुत से प्रश्न-उत्तर थे दोनों के बीच. मन में आया एक बार उसे अपनी अनु कहकर पुकारुँ. पूछूँ कि इस तरह किसी के पीछे लगकर अपना जीवन क्यों मिटा रही. जिसे छोड़ना था वो छोड़ गया पर मैं हिम्मत न जुटा पाया.
"पूछोगे नहीं कुछ?" शायद उसने मन की सुन ली.
"...न...नहीं." अपनी मुट्ठियाँ भींचते हुए मैंने सधा सा उत्तर दिया. सामने ग़ुलाबी सूत में लिपटी 'स्त्री' कोई और नहीं मेरी अर्धांगिनी है. बहुत सी भावनाएँ मचल उठी. भागकर उसे सीने से लगा लेने का मन हुआ पर अहम ने रोक लिया. आज पहली बार मेरे हृदय में रिश्ते की आग भड़की थी. उसने अपना बायाँ हाथ आगे किया और मैंने दाहिने हाथ से उसे थामकर गले से लगा लिया. आज पहली बार पब्लिक प्लेस में मैंने किसी स्त्री का चुम्बन लिया. मेरे मन की दृढ़ता साक्ष्य है इस बात की कि परिणय प्रकृति का सर्वोत्तम उपहार है.
सहसा ही एक झिझक ने आ घेरा मुझे. ये तो वही है जिसने मुझे धोखा दिया. मैं ऐसा कैसे कर सकती है.
"व्हाट हैपेंड?" मेरे अलग होती ही वो बोली.
"हमारे बीच कुछ हो भी सकता है क्या?" मैं बड़बड़ाया.
"वो हो चुका जो होना था. अब तुम उस फीलिंग से इनकार नहीं कर सकते जो हमारे बीच अभी पनपी." मैं कौतूहल से उसका चेहरा देखने लगा. सच का दृढ़ भाव दिखा वहाँ. वो सच जो मैं न बोल पाता और शायद डिज़र्व भी नहीं करता.
"मैं यहाँ एक पल भी नहीं रुक सकता. बहुत घुटन हो रही है."
"चलो कहीं खुले में चलते हैं."
चहलकदमी करते हुए हम बाहर निकल आये. दोनों ही शाँत हैं सम्भवतः पानी में जो पत्थर कुछ देर पहले उछला था वो नीचे बैठते ही पानी को स्थिर कर गया. चलते-चलते कई बार अनु मेरे बहुत पास आ जाती और उसकी साड़ी लहराती हुई मुझे छू जाती. मैं बिना किसी झिझक कदमताल कर रहा. कुछ दूरी पर एक नेवला देखते ही वो डर गई. उसने मेरी कुहनी के भीतर से अपनी कुहनी का घेरा बना लिया. मुझे समझ में नहीं आ रहा कि मैं इतना सहज कैसे हो सकता हूँ.
"मुझे पीला रंग बहुत पसंद है और तुम्हें?" उसने मेरी तरफ प्रश्न उछाला. मैं समझ गया अब ग़ुलाब अपनी रंगत बदलने वाला है.
"जो तुम्हें पसंद." वो खिलखिलाकर हँसी. मेरा रोम-रोम पुलकित हो गया कि आज मैं कितने दिनों के बाद किसी के मुस्कुराने का कारण बना हूँ. अगले ही पल सीने में कुछ कचोटता सा लगा.
"कुछ देर बैठते हैं." वो बेंच देखते हुए बोली.
"तो क्या आज ऑफिस न जाऊँ?" मैंने घड़ी पर नज़र डाली.
"अब कैसे जाओगे?" उसके प्रश्न को ही मैं उत्तर मान बैठा. बेंच पर वो मेरे पास ही बैठ गयी. मैंने सिर टिकाकर आँखों को बंद कर लिया. उसके और मेरे बीच हवा आने भर का फासला है पर उसके अहसासों से एक छुअन मिल रही है. आज वो साथ है तो अच्छा लग रहा...क्या मुझे पत्नी का ही सामीप्य चाहिए? अपने आप से ही कई प्रश्न कर रहा है मन. अपने माथे पर किसी स्पर्श के अनुभव के साथ आँख खोल दी तो देखा वो अपने रुमाल से कुछ साफ कर रही.
"देखो न चिड़िया की बीट…"
"और तुमने अपना रुमाल ख़राब कर दिया."
"तो क्या उसके लिए कोई दूसरी लाओगे?"
"दूसरा गंतव्य तो तुमने देखा है."
"हम्म…"
"अनु...तुमने क्या सोचा?"
"यही कि जब तुम भी मेरा साथ नहीं दोगे तो मैं ही उस पर प्रेशर करुँगी कि डाइवोर्स देकर मुझे अपना ले."
"तुम्हें क्या लगता ये सब इतना आसान है? वो मान जायेगा तुम्हारी बात? उसकी शादी हो गयी. वो अपनी लाइफ में सेट हो गया. किसी के चले जाने से एक समय के बाद वो स्पेस ऑटोफिल हो जाता है और वो अपना एनवायरनमेंट ओक्यूपाई कर लेता है....और ख़ुद ही सोचो जब वो प्लेस फिल हो गया तो एडजस्टमेंट करना पड़ेगा. क्या प्रेम में ये पॉसिबल है?"
"शायद तुम सही हो!" अनु ने गहरी साँस छोड़ते हुए कहा. मैंने अपनी बात जारी रखी.
"अनु प्रेम में प्रेम किया जा सकता है. किसी के आने और चले जाने के बाद भी पर प्रेम में वापसी की सूरत को बस समझौता कहते हैं. क्या किसी रिश्ते की बुनियाद समझौता हो सकती है?"
"हम्म!" अनु अब भी शांत है.
"मान लो उसने तुम्हें न अपनाया या अपनाए जाने के बाद तुम्हारे बीच वो प्यार न रहा…?"
मेरा मन जाने क्यों उद्विग्न होकर बहा जा रहा. मैं अनु को गुमराह तो नहीं कर रहा? कहीं मैं उससे प्यार तो नहीं करने लगा? लेकिन एक्स्ट्रा मैरिटल अफेयर से रोकना ग़लत भी तो नहीं. मैं उधेड़बुन में था.
"सुनो, अगर यही सब बातें मैं तुमसे कहूँ? तो क्या तुम उसे भूल जाओगे? क्या हम एक नया जीवन शुरु कर सकेंगे?"अनु ने मेरे पैरों के नीचे ठीक सामने बैठकर मेरी आँखों में आँखें डालते हुए कहा.
"ये क्या कह रही हो तुम?" मैं आवेश में बोल पड़ा.
"वही जो तुम सुन रहे हो."
"लेकिन मैंने कब कहा कि मेरे साथ ऐसा कुछ है?"
"उस रात जैसे ही मैं कमरे में पहुँची थी तुम्हारी एक्स का व्हाट्स एप मेसेज आ गया. मेसेज पढते ही मेरे होश उड़ गए. सारे सपने एक साथ ख़त्म दिखे. मैंने चेक किया तो पाया कि तुमने अपना फोन 24 घण्टे पहले ही फॉर्मेट किया था. यहाँ तक कि व्हाट्स एप एकाउंट डिलीट भी किया था. उस मेसेज के सहारे मैं ब्लू डायरी तक पहुँची जिसके हर पेज पर खून से कुछ न कुछ लिखा था. बहुत बड़े सदमे की रात थी वो मेरे लिए." मैं अपराधी की तरह अनु की बात सुन रहा था तभी ख़याल आया.
"तुम्हें मेरे मोबाइल का पासवर्ड कैसे पता चला?"
"सौभाग्या उसमें गेम खेल रही थी वो पहले से ही फ्री था. ये सब देखकर मुझे तुमसे नफ़रत हो गयी कि मेरा क्या क़ुसूर था? मुझसे शादी ही क्यों की? तुम्हें किसी के साथ शेयर कैसे कर सकती थी?"
"ओह्ह शिट."
"वो अतीत है तुम्हारा. अब तुम्हें सब कुछ भूलना होगा. वो सब बातें याद करो जो मुझसे कहीं हैं अभी."
"अनु...मुझे कुछ समझ में नहीं आ रहा. मैं क्या करुँ, कहाँ जाऊँ?"
"क्या अब भी तुम्हें ये सोचना शेष रह गया? क्या मैं बस इसलिए त्याग करुँ कि स्त्री हूँ और तुम पुरुष हो तो कुछ भी करने के लिए स्वतंत्र हो?"
"शायद तुम सही हो."
"शायद नहीं सौ फीसदी."
"ये बताओ जब तुम मुझसे इतनी नाराज़ थीं तो यहाँ तक कैसे पहुँची?"
"मुझे पिछले हफ्ते दीदी ने फ़ोन किया. उन्होंने बस इतना ही कहा कि मैं उनका अतीत जानती ही हूँ अब अगर भाई के साथ कुछ बुरा हुआ तो…"
"ह्म्म्म… बहुत बुरा हुआ उसके साथ. सौभाग्या एक साल की भी नहीं थी जब जीजाजी चल बसे."
"वो तुम्हें इस तरह नहीं देख सकतीं"
"और तुम?"
"मैं भी." बेंच से उठकर हम रास्ते पर आ गए. शायद यही मेरी भटक को मिला सही रास्ता है. उस रात अगर वो अँधेरे में उठकर न जाती तो मेरे जीवन में उजाला कभी न आ पाता.
"आज हमारे प्रेम को लाल गुलाब मिल गया." इतना कहते ही उसने मुझे कसकर छाती से भींच लिया. उसकी गर्म साँसें मेरे हर ज़ख़्म पर मरहम सी लग रही हैं.
लेबल: कहानी, प्रेम, प्रेम कहानी
वो वाचाल था और मैं भी. हमारी भावनाओं के कितने नदी-समन्दर मिल जाते थे आपस में. हर बात पर हम उस शब्द को पकड़ते थे जो कहने से रह गए हों. बातों ही बातों में रुह-अफज़ा होते.
फिर एक दिन उसने मौन को दस्तक दी. मेरा वाचाल अकेला रह गया. मेरे कंधों पर भरम की तितलियाँ फड़फड़ाने लगीं. वाचाल मरने को था. मौन ने वाचाल को गले लगा लिया. मैं अपना स्व भूलती रही. मुझे पता था उसका वाचाल टकराया है किसी सुनामी से. सुन्न पड़ गया कंधों पर तितलियों का फड़फड़ाना.
और उस रोज उसका मौन मेरे कंधे पर आ बैठा. उसने मुझे वो मौन लौटाया जो उसके जीवन में आयी सुनामी का परिणाम था. मैं द्रवित हुई उस अनुभूति से. कैसे छुपा पाया होगा ये बवंडर वो अपने भीतर. सोंख लेना चाहती हूँ अब वो दर्द मैं सारा का सारा. श्री हीन हुई थी अब हीन भी हूँ. मैं और वो साथ-साथ समानांतर चल रहे हैं अब... मौन के अधिकतम पर. मेरी प्रतीक्षा को कोई सावन नहीं बना, कोई नक्षत्र नहीं न ही कोई राशि.
स्पर्श
अँधेरों में एक काली छाया उभरी. विरह ने आगे बढ़कर उसे होठों से लगाना चाहा. कोने में पड़ी सिगरेट सुलग उठी और देखते ही देखते विरह के होठों से जा लगी. एक अरसे से निस्तेज पड़ी राखदानी को आज स्पर्श मिला.
क्रोनोलॉजी
पहाड़ बूंदों के इंतज़ार में तब तक अपने आँसू अंदर दबाता रहा जब तक पेड़ चिड़िया को आलिंगन में लिए रहा. आलिंगन तब तक सुखद रहा जब तक पेड़ ने बौराई हवा की राह तकी.
फिर एक माँ ने जैसे ही अपने नवजात को चूमा, हवा इठलाकर पेड़ से जा लिपटी. पंख फड़फड़ाकर चिड़िया उड़ी उसने पहाड़ को अपनी आग़ोश में भर लिया. मेघ बरसते गए और पहाड़ जी भर रोता रहा.
इश्क़ फिर भी है
कागज़ स्याही पर फ़िदा है और कलम कागज़ को देखते ही कसमसाती है. तीनों अलग-अलग सियाह से हैं.
(१) प्रेम जो प्रेमिका को खाता है
उसके हाथों ने छत नहीं अचानक आसमान को छू लिया. नए-नए प्रेम का असर दिख गया. ढीठ मन सप्तम स्वर में गा दिया गोया दुनिया को जताना चाह रही हो कि अब तो उसका जहाँ, प्रेम की मखमली जमीन है बस क्योंकि प्रेम उरूज़ पर था.
फिर एक रोज चौखट पर रखा दिया अचानक बुझ गया और उसकी शाम कभी नहीं हुई. हवा के बादलों पर बैठकर वो आसमान कहाँ छू पाती? एक ख़्वाब ज़िंदा लाश बन गया उसके अंदर.
(२) प्रेम जो प्रेमी को खाता है
उसके कपड़ों की क्रीज़, परफ़्यूम की महक, हेयर कलर और गॉगल्स के पीछे मुस्कराता चेहरा आजकल सभी की निगाह में है. ग्रेजुएशन की पढ़ाई एक ओर हो गयी, अपाचे तो ख़ुद ब ख़ुद डिस्को, होटल और लांग ड्राइव के लिए मुड़ जाती है.
उस रोज बारिश ज़ोरों पर थी फिर भी अपाचे स्टार्ट कर वो वेट कर रहा था. लोमबर्गिनी से उतरती अपनी माशूका को देखकर उसकी आँखों का रंग अचानक बदल गया. अगले दिन शहर के अखबारों में सुर्खियां टहलती रहीं--ईर्ष्या की जलन किसी के चेहरे पर तेजाब बन बही.
(३) समाज जो प्रेम को खाता है
पहली बार दवा की एक दुकान पर दोनों मिले थे. एक को बीमार माँ तो दूसरे को बहन के लिए दवाई चाहिए थी. सूखा चेहरा, मैले कपड़े, अबोले से वो दो क़रीब आ गए. अब दवा के ग्राहक दो नहीं एक ही होता. कभी-कभी माँ और बहन की तीमारदारी भी एक ही कर लेता.
दर्द न बाँट सकने वाला समाज ही उनके ख़िलाफ़ खड़ा हो गया. समाज की आँखों में बेचारगी, लाचारी, जरूरत, स्नेह, मोह… कुछ न आया बस उनका लड़का और लड़की होना खटका. दो से जस तस एक हुए वो दोनों पहले अलग फिर सिफ़र हो गए. किसी का न होना इतना बुरा नहीं पर आकर चले जाना सच जानलेवा ही तो है.
विशेष- इस श्रंखला की तीन लघुकथा. इसे लिखने की प्रेरणा मुझे तेजस पूनिया जी की कहानी "शहर जो आदमी खाता है" को पढ़कर मिली.
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हम अभी जस्ट मैरीड ही हैं. हाँ नहीं तो लॉक डाउन में ही कर लिए शादी. क्या है कि अम्मा जी को नया अचार रखना था सो मर्तबान ख़ाली करने थे. जबे देखो तबे परधान जी का फ़ोन मिलाए के कहें…"लाली की अम्मा से कहि देव हम बीस जन आई के भौंरी डरवाय लै जैहैं. बियाह तो अबहिने करी लें. हमार अचार न चलिहे तब तक." बेचारी अम्मा ने पिता जी का उठना-बैठना मुश्किल कर दिया. पिता जी कहते ही रह गए कि हम अच्छा मर्तबान खरीद के दे देई जो समधिन मान जाए. अम्मा को डर था कहीं लॉक डाउन के चक्कर में बिटिया कुँआरी न रह जाए. ख़ैर पंडित जी को कुछ दे दिवा के बियाह हो गया.
आज तीसरे दिन बारिश के बाद तनिक धूप निकली तो कमरा में रोशनी हुई. ई थोड़ा और पास आकर बोले,
"सुनो बहुत सुंदर लग रही हो. आज देखा तुमको रोशनी में...आओ न एक सेल्फ़ी खींचे"
"हाय दैया, अभी कोई देख ले तो"
"आओ न हम झुंझुन का मोबाइल मांग के लाए हैं" कहते हुए ई हमारे बाजू में खड़े होकर सेल्फ़ी लिए. हम शरम के मारे अपना मुंह इनके पीछे छुपा लिए. अम्मा जी के आवाज़ देते ही मोबाइल जेब में रख के बाहर भागे.
ई का सामने देखकर हमारे हाथ पैर फूल गए. इनके बुशर्ट पर हमारे होंठ के निशान... वो भी पीछे से. हम दरवाजा, दीवाल सब बजा दिए पर ई मुड़े तक नहीं. "हाय दैया-3" कहकर हम दिवाल पर खोपड़ी दे मारे. थोड़ी ही देर में ई झनझना के बुशर्ट फेकते हुए कमरे में घुसे.
"कर लियो मन की...का जरूरत थी यहाँ चुम्मी लेने की?"
हम कुछ नहीं बोले तो ढूंढते हुए अंधेरे में आ गए.
"अरे हम गुस्सा कहाँ रहे जो तुम बुरा मान गई. बस एक बार सब ठीक हो जाए हम भी घूमने जाएंगे. पियार करने को थोड़ी मना किए वो तो सब लोग चिढ़ा दिए तो…"
"मग़र हम चुम्मी नहीं लिए थे. हम तो बस…"
"का हम तो बस...अब बोलो न?"
हम कुछ बोलते इससे पहले ही मीठी अपने चाचा को बुला ले गई. हम चुपचाप खड़े कमरे की खिड़की से छनकर आ रही धूप देखने लगे. 'का अजीब है अंधेरे में दिखे न और उजाले में धूल के कण भी सोना माफ़िक चमके. इंसान सच माने तो का माने…'
तनिक देर में घर में हाहाकार मच गया. इतना सुना कि मीठी के चाचा को परधान के घर बुलाया गया. सब एक-दूसरे को चुप करा रहे हैं, कोई न जान पाए कि इनका कॅरोना टेस्ट मंडप वाले दिन हुआ था. हम जड़ के समान खड़े रह गए. अम्मा तनिक देर में आकर हमारे कमरे की कुंडी बाहर से लगाने लगीं. हमने बहुत पूछा कोई कुछ न बोला, ऊपर से सब हमको ऐसे घूरे जैसे हमही कुछ किये हैं.
आज तीन दिन हो गए. किसी से कोई बात नहीं. दिन में दो बार खाना पानी मिलकर फिर दरवाजा बंद. शौच, स्नान के लिए पीछे से निकलकर जाना फिर वहीं वापस आना. कित्ता बदल गया छः दिन में हमारा संसार बस एक अम्मा की हठ की वजह से. जब तब खिड़की से धूप छनकर आ जाती है और उसमें बिखरे रेत के कण हमें अहसास दिलाते हैं कि उजली दुनिया में कितनी गंदगी है!
लेबल: आत्महत्या, कहानी, डिप्रेशन, लघुकथा, संस्मरण, Anti Depression