एक कमरे के सन्नाटे में,
ढेर सारी किताबें अब भी सो रही हैं,
मेज पर पड़ी वो नीली स्याही,
आज लहू बन कर रो रही है
नब्बे प्रतिशत... बांध न पाए,
उस नन्हीं सी जान के डर को,
कितना भारी कर दिया हमने,
कोमल पंखों वाले घर को
वह जो मुस्कान चश्मे के पीछे,
शायद एक समंदर छुपाए थी,
हम पढ़ते रहे केवल अंकों को,
वो सिसकियाँ दबाए थी
पूछा होता "आज मन कैसा है?"
नंबरों की जगह उसे पुचकारा होता,
एक कागज़ का टुकड़ा हार जाता,
मगर हमारा बच्चा न हारा होता
सुनो दुनिया वालों, ये जीत नहीं,
ये हार है हमारी और तुम्हारी,
जब एक मासूम की सांसों पर,
नंबरों की होड़ पड़ जाए भारी
लौट आओ वैशाली...
हमें तुम्हारे 'अंक' नहीं, तुम चाहिए थी,
इस बेजान मार्कशीट की जगह,
हँसती-खेलती एक मासूम चाहिए थी
एजुकेटर और काउंसलर के रूप में यहाँ साझा कर रही हूँ ,कुछ महत्वपूर्ण लक्षण जिन्हें परिवार अक्सर अनदेखा कर देते हैं:
बच्चे का अचानक चुप हो जाना या अकेले रहना
नींद और भूख के पैटर्न में बदलाव
अपनी उपलब्धियों के बावजूद उदास रहना
"मेरे होने या न होने से क्या फर्क पड़ता है" जैसी बातें करना
समाधान और बदलाव की दिशा
अपने बच्चों से केवल "कितनी पढ़ाई हुई?" न पूछें, बल्कि "आज तुम कैसा महसूस कर रहे हो?" यह भी पूछें.
बच्चों को बताएं कि गिरना गलत नहीं है, गिरकर न उठना समस्या है.
मानसिक स्वास्थ्य को लेकर जो वर्जना (Taboo) है, उसे तोड़ें. काउंसलर के पास जाना कमजोरी नहीं, समझदारी है.
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