To explore the words.... I am a simple but unique imaginative person cum personality. Love to talk to others who need me. No synonym for life and love are available in my dictionary. I try to feel the breath of nature at the very own moment when alive. Death is unavailable in this universe because we grave only body not our soul. It is eternal. abhi.abhilasha86@gmail.com... You may reach to me anytime.
बुधवार, 21 जनवरी 2026
एक जोड़ा उम्मीद
सोमवार, 19 जनवरी 2026
और प्रदूषण मत फैलाओ
मैं हवा हूँ
उठाती हूँ गिराती हूँ
नज़र नहीं आती हूँ
प्रदूषित नहीं होना चाहती हूं
मुझे बचाओ
प्रथ्वी के प्राणियों मुझे नज़र न लगाओ
मुझे बचाओ
मैं जल हूँ
घर से नदी-नालों तक
करता कल-कल हूँ
उत्तर से दक्षिण तक
चलता पल-पल हूँ
मुझमें कचरा न फैलाओ
मुझे बचाओ
घने बादल न चुराओ
मुझे बचाओ
मैं जंगल हूँ
वृक्ष-वृक्ष से मैं बनता
तूफानों में सीधा तनता
औषधि, वायु और फूल-फल
लेती मुझसे सारी जनता
मुझ पर आरी न चलवाओ
मुझे बचाओ
मैं तारा हूँ
रातों का दुलारा हूँ
खो गया चकाचौंध में
खोज पाओगे, तो प्यारा हूँ
मैं सूरज हूँ
आता हर रोज हूँ
ग्रीष्म में दिखाते हो आँखें
शीत में खोज हूँ
मैं चंदा
कहलाता मामा हूँ
और हूँ अच्छा बंदा
मैं धरती हूँ
माता कहते मुझको
मेरे बच्चों, तुम्हारा भार सहती हूँ
मुझसे हवा, जल, जंगल न चुराओ
मुझे बचाओ
सब की सखी
तुम सभी के जैसी
मैं भी हूँ दुःखी
मैं पर्वत अरावली
लेकर मशीनें घूम रहे तुम
मैं सीना तान खड़ा हूँ
तुम सबके लिए
प्रदूषण से लड़ा हूँ
अब तुम मुझी से लड़ रहे हो
कर जीवन को मरण रहे हो
मैं मानव
मुझे इतना न करो लज्जित
मैं सबसे पराजित
लेता हूँ शपथ
स्वच्छ रखूँगा जगत
त्राहिमाम न करो
मुझे अपनी शरण लो
यदि जंगल कटे तो औषधि नहीं
पर्वत कटे तो परिधि नहीं
सूरज चाचू, चंदा मामा, धरा हमारी माता है
मौसम और जलवायु से गहरा हमारा नाता है
जिसने हमको जीवन दिया, उसे बचाने की बारी
कसकर कमर कर ली है तैयारी
रविवार, 11 जनवरी 2026
स्वामी विवेकानंद का मनोवैज्ञानिक और सामाजिक दृष्टिकोण
स्वामी विवेकानंद केवल एक आध्यात्मिक गुरु नहीं थे, बल्कि वे आधुनिक इतिहास के सबसे गहरे "आत्मा के मनोवैज्ञानिक" और सामाजिक इंजीनियरों में से एक थे. उनका दर्शन केवल दुनिया की व्याख्या करने तक सीमित नहीं था, बल्कि उसका उद्देश्य व्यक्ति के आंतरिक परिदृश्य को बदलकर बाहरी सामाजिक परिवर्तन लाना था. प्राचीन वेदांतिक ज्ञान और आधुनिक समाज की जरूरतों के बीच सेतु बनाकर, विवेकानंद ने एक ऐसे जीवन का खाका तैयार किया जो गहरा आत्मनिरीक्षण और सक्रिय कर्म दोनों का मिश्रण है.
मनोवैज्ञानिक केंद्र: निर्भयता और आत्म-साक्षात्कार
विवेकानंद के मनोवैज्ञानिक ढांचे के केंद्र में आत्म-शक्ति की अवधारणा है—प्रत्येक मनुष्य के भीतर निहित अनंत शक्ति. उन्होंने मानवता की प्राथमिक मनोवैज्ञानिक बीमारी "कमजोरी" को माना. उनके विचार में, अधिकांश मानसिक पीड़ा और नैतिक विफलताएं एक खंडित आत्म-छवि से पैदा होती हैं जहाँ व्यक्ति खुद को "भेड़" के रूप में देखता है, न कि "शेर" के रूप में.
सकारात्मक आत्म-छवि: उन्होंने प्रसिद्ध रूप से सिखाया कि "अपने आप को कमजोर समझना सबसे बड़ा पाप है." उनका मनोविज्ञान मौलिक सशक्तिकरण का था, जिसने नियंत्रण के केंद्र को बाहरी भाग्य से हटाकर आंतरिक इच्छाशक्ति पर केंद्रित किया.
मन नियंत्रण का विज्ञान: आधुनिक संज्ञानात्मक-व्यवहार चिकित्सा (CBT) के उदय से बहुत पहले, विवेकानंद ने मन को एक "शराबी बंदर" कहा था जिसे राजयोग के माध्यम से पालतू बनाया जाना चाहिए. उन्होंने तर्क दिया कि एक नियंत्रित मन ही भ्रम के पर्दे को चीरने और "मनुष्य बनाने वाली शिक्षा" (Man-making education) प्राप्त करने में सक्षम है.
निर्भयता (Abhaya): उन्होंने एक "नीचे से ऊपर" वाले मनोवैज्ञानिक सुधार को प्रोत्साहित किया. अपने विचारों की पूरी जिम्मेदारी लेकर, एक व्यक्ति 'अभय' की स्थिति विकसित कर सकता है, जिसे वे किसी भी सार्थक जीवन के लिए अनिवार्य शर्त मानते थे.
सामाजिक दृष्टि: व्यावहारिक वेदांत और सामूहिक उत्थान
विवेकानंद का सामाजिक दर्शन उनके मनोवैज्ञानिक अंतर्दृष्टि का ही विस्तार था. उन्होंने "एकत्व" की अमूर्त अवधारणा को एक व्यावहारिक सामाजिक मिशन में बदल दिया: "जीव ही शिव है" (मानवता की सेवा ही ईश्वर की सेवा है). इस "व्यावहारिक वेदांत" ने तीन प्राथमिक स्तंभों के माध्यम से सामाजिक जड़ता को तोड़ने की कोशिश की:
शिक्षा, सामाजिक समानता, सार्वभौमिकता
उन्होंने उन अंधविश्वासों और कुरीतियों की कड़ी आलोचना की जिन्होंने भारतीय समाज को पंगु बना दिया था. विवेकानंद के लिए, एक समाज उतना ही मजबूत होता है जितना उसकी सबसे कमजोर कड़ी. उन्होंने एक "वेदांतिक समाजवाद" की कल्पना की जहाँ पूर्व की आध्यात्मिक विरासत और पश्चिम की वैज्ञानिक प्रगति मिलकर गरीबी और निरक्षरता की समस्याओं को हल कर सकें.
निष्कर्ष: वैश्विक नागरिक
विवेकानंद की प्रासंगिकता आज उनके 'आंतरिक' और 'बाहरी' के संश्लेषण में निहित है. उन्होंने सिखाया कि हम शुद्ध व्यक्तियों के बिना एक शुद्ध समाज नहीं पा सकते, और इसके विपरीत, सामाजिक सेवा के बिना व्यक्ति का आध्यात्मिक विकास अधूरा है. युवाओं को "उठो, जागो और तब तक मत रुको जब तक लक्ष्य प्राप्त न हो जाए" का आह्वान देकर, उन्होंने एक ऐसी मनोवैज्ञानिक चिंगारी सुलगाई जो आज भी न्याय, शिक्षा और मानवीय गरिमा के आंदोलनों को प्रेरित करती है.
बुधवार, 7 जनवरी 2026
मंगलवार, 30 दिसंबर 2025
सिलेक्टिव दुःखनवीस
मैं
वही तुम्हारा भारत महान
साॅरी अब और ज़्यादा महान
चुन लेता हूँ
किस हिस्से को 'दीपू' की मौत पर
और किस हिस्से को
'चकमा' की मौत पर मातम मनाना है
मैं सिलेक्टिव दुःखनवीस हूँ
चुन लेता हूँ
किसे चाहिए अपनी
'अरावली' पर आंदोलन
किसे 'सेंगर' को बचाना है
मैं एक्सेप्ट मोड डिनायल पीस हूँ
चुन लेता हूँ
सुपरसोनिक सा मौन
तो कभी ज़ीरो डेसीबल का शोर
सनलाइट में ब्लैक आउट
रेडिएशन में लगी ग्रीस हूँ
गुरुवार, 25 दिसंबर 2025
मंगलवार, 23 दिसंबर 2025
तुम ईश्वर हो
कितना मनहूस होता है
वो लम्हा
जिनमें हम साझा करते हैं
किसी मौत की ख़बर
असहज होता है बोलने वाला
अवाक रह जाता है सुनने वाला
वो एक लम्हा
ख़त्म कर जाता है
कितना कुछ
बंद हो जाती हैं अनगिनत रिश्तों की किताबें
बीतते सालों सी
क्यों नहीं होती ज़िन्दगी
कि जी लेते हम भी
हर जीवन के दिसम्बर की इकतीस एक साथ
पचीसवीं से इकतीसवीं तक होते जश्न
और मध्य रात्रि का प्रस्थान
सुनो ईश्वर
क्यों नहीं ले लेते रिश्वत थोड़ी
और बदल देते मौत की सेटिंग?
हमें नहीं चाहिए अभिमन्यु और भीष्म
ऐसे सजाओ न जीवन
जैसे आते हैं शीत और ग्रीष्म…
तुमने सर्दियाँ बनायीं
और तुम्हीं कराते हो सर्दियों से मौतें
गर्मियाँ भी तुम्हारी
और इनसे होता हृदयाघात भी तुमने कराया
कोई रील भर जीता है
किसी का जीवन एण्डलेस वीडियो
कहीं वात्सल्य तो कहीं माया
कैसे कर पाते हो इतना स्वांग
आओ कभी चाय पर
ओह साॅरी ‘फीकी चाय’ पर
क्या है कि मध्यम वर्ग और गरीब हो गया
बदन से कफ़न तक छिनवाकर
गरीब जो है न, खो चुका है अपना ख़िताब
छोड़ो तुम्हें क्या पड़ी,
शान बघारनी है मुझे भी
उधार की शकर की मीठी चाय पिलाकर
जैसे शान बघारी जाती है
एक दिन की सड़क बनाकर
‘कट इट आउट’
चाय पीकर सेल्फी लेना
और करना प्रेस कांफ्रेंस भी
कितने सुखी हैं सब यहाँ
तुम ईश्वर हो
जो कह दोगे मान लेंगे हम
जो करते हो
उसे भी तो कर ही लेते हैं एक्सेप्ट
मेरी पहली पुस्तक
http://www.bookbazooka.com/book-store/badalte-rishto-ka-samikaran-by-roli-abhilasha.php
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•स्मृति क्या है? °बीते हुए कल के शोर की प्रतिध्वनि •शोर क्यों स्वर क्यों नहीं? °जिस प्रकार हमारी सूक्ष्म देह होती है ठीक उसी प्रकार सूक्ष्म...
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•एक उचाट सा मन लिए कोने कोने घूमता हूँ मैं गैटविक हवाई अड्डा हर गुज़रने वाले चेहरों में ए आई वन सेवन वन के यात्रियों को खोजता हूँ जो उस रोज...
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मुझे भी तुमसे कुछ ऐसा सुनना है जैसे मार्केज़ ने कहा था मर्सिडीज़ से और मैं ख़ुद को उसके बाद झोंकना चाहूँगी इंतज़ार की भट्टी में वह इंतज़ार ज...


