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प्रद्युम्न, अब तुम कभी नहीं आओगे!

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अक्सर छोटे बच्चे स्कूल जाते वक्त
अपनी माँ को इन बोलों की थपकी दे जाते हैं,
'माँ, मैं जा रहा हूँ
तुम अकेले रहोगी न घर पर,
डरना मत!
यहीं दरवाजे पर इंतज़ार करना...'
माँ कितने भी काम निपटा ले
पर उसकी चौकस नज़रें
दरवाजे पर पहुंच ही जाती हैं;
ऐसा ही कुछ साधारण सा दिन रहा होगा
जब उस नन्हें से लाल के कदम
दहलीज़ से बाहर गए होंगे
कभी वापिस न आने के लिए;
उस रोज़ भी हर रोज़ की तरह
माँ ने दी होगी जादू की झप्पी;
काश कि माँ को आभास हो जाता
और वो बच जाता
अखबारों की सुर्खियां बनने से,
वक़्त उसे तारीख़ न बनाता:
उस ममता को आभास नहीं हुआ
वो रोशनी लेकर चला गया
पर एक सबक छोड़ गया पीछे
हम सभी के लिए
कि हम अपने कलेजे के टुकड़ों की
रक्षा ख़ुद करें;
किसी और घर में दूसरा प्रद्युम्न न आये:
हर माँ का लाल देश का नौजवान है,
क्या हैवानियत निगल ही लेगी
इंसानियत को और हम याद में
कैंडल जलाते रहेंगे??
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