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बुधवार, 25 मार्च 2020

सभ्य प्रेम

तुम्हारी चुप्पियों को भेजे गए
मेरे बेहिसाब चुम्बन
हमारे हृदयों को जोड़कर रखेंगे,
तुम सहलाते रहना अपने दर्द को
मेरे नर्म हाथों की मानिंद.
तुम तक नहीं आ सकती मैं
समय ने चूस ली है घुटने की चिकनाई
मेरी आँखों पर रख दिया शिष्टता का रक्त
तुमसे ज़्यादा तो मेरा
ईश्वर का भी होने का मन नहीं करता
तुम मुझे देते रहना
अपने सभ्य प्रेम की ख़ुराक
जीना चाहती हूँ मैं.

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मेरी पहली पुस्तक

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