मंगलवार, 17 दिसंबर 2024

एक बार फिर












एक बार

तुम्हें देखना है सामने

पास से

इतनी पास

कि हाथ बढ़ाकर छू सकूँ

चेहरे का स्पर्श कर जान सकूँ

तुम्हारा स्वाद

होठों पर उँगली रख रोक सकूँ

तुम्हें कुछ भी कहने से

और फिर लगा लूँ तुम्हें गले से

जो उधार है हम पर

जिसकी लौ तुमने ही तो लगायी थी

हर बात से खुद को झाड़ कर

कोई एक इस तरह

कैसे अलग कर सकता है ख़ुद को

जैसे किसी बच्चे ने

अपने कपड़ों से झाड़ दी हो मिट्टी

और मिटा दिया हो निशान गिरने का


चाय गिर जाती है

तो मैली होती है कमीज.

कहा था तुमने

सोचो जब प्रेम गिरा

तो क्या मैला नहीं हुआ मन


स्नेह की डोर

दोनों ओर से बँधती है

दोनों ओर से खिंचती है

छल गये उस बराबरी को तुम

कुव्वत नहीं थी

तो कवायद ही क्यों की


चाहती हूँ मैं मान जाऊँ

तुम्हारी बात

ले लूँ विराम

मगर उससे पहले

देखना है तुम्हें

सामने से

पढ़ना है विराम तुम्हारी आँखों का

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4 टिप्पणियाँ:

यहां 19 दिसंबर 2024 को 5:32 am बजे, Blogger Digvijay Agrawal ने कहा…

व्वाहहहहह
वंदन

 
यहां 19 दिसंबर 2024 को 7:35 am बजे, Blogger सुशील कुमार जोशी ने कहा…

सुन्दर

 
यहां 21 दिसंबर 2024 को 8:54 am बजे, Blogger दिगम्बर नासवा ने कहा…

बहुत खूब ...

 
यहां 27 दिसंबर 2024 को 4:27 pm बजे, Blogger Onkar ने कहा…

सुंदर

 

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