मंगलवार, 31 दिसंबर 2024

हर साल नया साल




समय बदल रहा है

पल बदल रहा है

कल के लिए

आज और कल बदल रहा है

हर साल का यह शगल रहा है


पत्ता टहनी से बिछड़ा

धरती पात से

चकोर चाँद से बिछड़ा

चातक स्वात(इ) से

जीवन से बड़ा जंगल रहा है


कलछी भात से बिछड़ी

भात स्वाद से

मन रिश्तों से बिछड़ा

रिश्ता विवाद से

इन सबसे बड़ा दलदल रहा है


रौनक सभ्यता से बिछड़ी

प्रगति संयम से

एकता पीढ़ी से बिछड़ी

पीढ़ी पराक्रम से 

ना किमख़ाब ना बड़ा मलमल रहा है

 


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6 टिप्पणियाँ:

यहां 31 दिसंबर 2024 को 3:31 pm बजे, Blogger Digvijay Agrawal ने कहा…

पत्ता टहनी से बिछड़ा
धरती पात से
सादर शुभकामनाएँ
सुंदर रचना

 
यहां 31 दिसंबर 2024 को 11:38 pm बजे, Blogger अभिलाषा ने कहा…

आभार महोदय. आपको भी शुभकामनाएँ! 🙏

 
यहां 3 जनवरी 2025 को 9:19 am बजे, Blogger अभिलाषा ने कहा…

बहुत आभार मान्यवर! 🙏

 
यहां 4 जनवरी 2025 को 9:32 pm बजे, Blogger सुशील कुमार जोशी ने कहा…

सुन्दर | नव वर्ष शुभ हो |

 
यहां 5 जनवरी 2025 को 8:24 pm बजे, Blogger Anita ने कहा…

क्योंकि चलते जाना ही जीवन का लक्ष्य है

 
यहां 6 जनवरी 2025 को 6:32 am बजे, Blogger Onkar ने कहा…

बहुत सुंदर

 

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