" ज़िन्दगी, तुम्हारे लिए!: 2026

सोमवार, 23 फ़रवरी 2026

बरसाना की लट्ठमार होली: प्रेम, प्रतिरोध और भक्ति का मनोवैज्ञानिक विश्लेषण


 ब्रज की होली केवल रंगों का उत्सव नहीं है, बल्कि यह मानवीय भावनाओं का एक जटिल और गहरा ताना-बाना है. इसमें बरसाना की 'लट्ठमार होली' अपने आप में अद्वितीय है. जहाँ दुनिया होली को केवल 'रंगों के खेल' के रूप में देखती है, वहीं एक मनोवैज्ञानिक और भावनात्मक दृष्टिकोण से यह उत्सव दमित भावनाओं के रेचन (Catharsis), स्त्री सशक्तिकरण और सामूहिक भक्ति का एक उत्कृष्ट उदाहरण है.


१. प्रेम और प्रतिरोध का संतुलन

लट्ठमार होली का आधार भगवान कृष्ण (नंदगाँव) और राधा रानी (बरसाना) के बीच का मधुर संबंध है. मनोवैज्ञानिक स्तर पर, यह उत्सव 'प्रेमपूर्ण प्रतिरोध' को दर्शाता है. जब बरसाना की गोपियाँ (लठियारे) नंदगाँव के ग्वालों पर लाठियाँ बरसाती हैं, तो यह हिंसा नहीं, बल्कि एक अधिकार है. यह प्रेम की उस पराकाष्ठा को दिखाता है जहाँ 'भय' पूरी तरह समाप्त हो जाता है और केवल 'भाव' शेष रह जाता है.

२. दमित भावनाओं का रेचन (Emotional Catharsis)

मनोविज्ञान में 'कैथार्सिस' (Catharsis) एक ऐसी प्रक्रिया है जिसमें व्यक्ति अपनी दबी हुई भावनाओं या क्रोध को एक सुरक्षित और सामाजिक रूप से स्वीकृत तरीके से बाहर निकालता है.

  • भूमिका का उलटफेर: पारंपरिक समाज में महिलाएँ अक्सर शालीनता और संकोच के बंधनों में रहती हैं. लेकिन लट्ठमार होली के दिन, वे 'शक्ति' का रूप धर लेती हैं.

  • तनाव मुक्ति: लाठी चलाना और पुरुषों का 'ढाल' लेकर खुद को बचाना, दोनों पक्षों के लिए मानसिक तनाव से मुक्ति का एक मार्ग बनता है. यह समाज की कठोर संरचनाओं को एक दिन के लिए तोड़कर मानसिक उल्लास का मार्ग प्रशस्त करता है.

३. 'सामूहिक चेतना' और भक्ति का उल्लास

कार्ल जुंग जैसे मनोवैज्ञानिकों ने 'सामूहिक अवचेतन' की बात की है. लट्ठमार होली के दौरान, हजारों लोग एक साथ एक ही भाव (राधा-कृष्ण भाव) में डूब जाते हैं.

  • इस समय व्यक्ति का 'स्व' (Ego) विलीन हो जाता है और वह एक बड़ी दैवीय ऊर्जा का हिस्सा बन जाता है.

  • ढोल की थाप, समाज गायन और रंगों की बौछार व्यक्ति के मस्तिष्क में 'एंडोर्फिन' और 'डोपामाइन' जैसे रसायनों का स्राव करती है, जो सामूहिक रूप से परमानंद (Ecstasy) की स्थिति पैदा करते हैं.

४. स्त्री शक्ति का मनोवैज्ञानिक उत्सव

लट्ठमार होली प्रतीकात्मक रूप से स्त्री सत्ता की विजय है. यहाँ पुरुष (ग्वाले) रक्षात्मक मुद्रा में होते हैं और महिलाएँ आक्रामक. यह दृश्य सदियों पुरानी पितृसत्तात्मक धारणाओं को मनोवैज्ञानिक चुनौती देता है. यह महिलाओं को आत्म-विश्वास और आत्म-सम्मान की एक गहरी अनुभूति कराता है, जो केवल उस दिन तक सीमित न रहकर उनके व्यक्तित्व का हिस्सा बन जाती है.

५. 'अहं' का समर्पण

जब नंदगाँव के पुरुष बरसाना की गलियों में लाठियाँ खाते हैं और राधा रानी के मंदिर के सामने झुकते हैं, तो यह उनके 'अहं' के समर्पण का प्रतीक है. भक्ति मार्ग में माना जाता है कि जब तक अहंकार नहीं टूटता, तब तक ईश्वर से मिलन संभव नहीं है. लाठी की मार यहाँ अहंकार को तोड़ने वाली चोट के रूप में कार्य करती है.

बरसाना की लट्ठमार होली केवल एक परंपरा नहीं, बल्कि एक मनोवैज्ञानिक चिकित्सा (Therapy) है. यह समाज को सिखाती है कि प्रेम में अधिकार भी है और समर्पण भी. यह क्रोध को खेल में और प्रतिरोध को प्रार्थना में बदलने की कला है. अंततः, यह उत्सव हमें बताता है कि जीवन के रंगों को पूरी तरह जीने के लिए कभी-कभी अपनी मर्यादाओं के खोल से बाहर निकलना अनिवार्य है.

शुक्रवार, 20 फ़रवरी 2026

फिल्म के पर्दे जैसी दुनिया

 


उम्मीद और निराशा के बीच का आईना

हम सब ने यह घिसा-पिटा उदाहरण बचपन से सुना है—आशावादी को गिलास आधा भरा दिखता है, और निराशावादी को आधा खाली। लेकिन 2026 की इस भागदौड़ भरी दुनिया में, यह सिर्फ एक व्यक्तित्व परीक्षण नहीं है. यह प्रोजेक्शन (Projection) यानी हमारे भीतर के विचारों का बाहरी दुनिया पर प्रतिबिंबित होना है. यह गिलास हमें वह नहीं दिखाता जो वह है, बल्कि वह दिखाता है जो हम हैं.

'भरने' का मनोविज्ञान

(see more)जब हम उस गिलास को देखते हैं, तो हमारा दिमाग केवल पानी की मात्रा नहीं माप रहा होता. वह हमारे पुष्टि पूर्वाग्रह (Confirmation Bias) को सक्रिय कर देता है. अगर आपका मानसिक झुकाव डर या कमी की ओर है—शायद थकान, तनाव या खबरों के नकारात्मक बोझ की वजह से—तो आपका दिमाग उस 'खाली' हिस्से पर ही टिक जाएगा. यह एक सुरक्षा तंत्र है। आपका मस्तिष्क कहता है, "देखो, क्या-क्या कम हो रहा है! हम खतरे में पड़ सकते हैं."

वहीं, जो व्यक्ति इसे 'आधा भरा' देख रहा है, वह शायद कल्पना की दुनिया में नहीं जी रहा, बल्कि वह चयनात्मक ध्यान (Selective Attention) का अभ्यास कर रहा है. वह उस संसाधन पर ध्यान केंद्रित कर रहा है जो उसके पास उपलब्ध है.

फिल्म के पर्दे जैसी दुनिया

यहाँ एक मनोवैज्ञानिक मोड़ है: गिलास तटस्थ (neutral) है. उसे आपकी विचारधारा से कोई लेना-देना नहीं. लेकिन इंसान के तौर पर हमें तटस्थता पसंद नहीं आती. इसलिए, हम अपनी आंतरिक स्थिति को बाहरी वस्तुओं पर थोप देते हैं.

जब हम कहते हैं कि "दुनिया दुविधा में है," तो असल में हम अपनी बेबसी को दुनिया के मंच पर देख रहे होते हैं.

यदि आप अंदर से खाली महसूस करते हैं, तो आधा खाली गिलास इस बात की पुष्टि करता है कि दुनिया खत्म हो रही है.

यदि आप खुद को सक्षम महसूस करते हैं, तो वही गिलास भविष्य की संभावनाओं को दर्शाता है.

मनोवैज्ञानिक रूप से, हम गिलास का वर्णन नहीं कर रहे होते; हम अपनी क्षमता का वर्णन कर रहे होते हैं.

दो रास्तों के बीच की सच्चाई

इस 'आधे' होने की स्थिति की सबसे बड़ी चुनौती यह है कि यह अस्थिर है. यह एक बदलाव का क्षण है. पानी या तो भरा जा रहा है या निकाला जा रहा है.

शायद सबसे सही नजरिया आशावाद या निराशावाद नहीं, बल्कि व्यावहारिक यथार्थवाद (Utilitarian Realism) है. मात्रा पर बहस करने के बजाय, एक यथार्थवादी पूछता है: क्या यह पानी पीने लायक है? क्या मेरे पास इसे दूसरों के साथ बांटने के लिए कोई साधन है? जब हम 'आशा बनाम निराशा' के खेल से बाहर निकलते हैं, तो हमारी मानसिक ऊर्जा इस बात पर लगती है कि उस पानी का उपयोग कैसे किया जाए. निराशा हमें पंगु बना देती है, और अंधी उम्मीद चमत्कार का इंतजार करती है. लेकिन कर्म (Agency) प्यास बुझाने का काम करता है.

आज के समय में, यह 'गिलास' हमारा सोशल मीडिया फीड है या सुबह की खबरें. अगर आपको हर जगह सिर्फ 'खालीपन' दिख रहा है, तो शायद यह दुनिया को नहीं, बल्कि अपने 'प्रोजेक्टर' को चेक करने का समय है. क्या आप दुनिया को देख रहे हैं, या अपनी ही थकान का प्रतिबिंब?

दुनिया बेशक उलझन में है, लेकिन हर उलझन एक पहेली है जिसका समाधान बाकी है। पानी वहीं है. आगे क्या होगा, यह इस पर निर्भर नहीं करता कि आप उसे कैसे देखते हैं, बल्कि इस पर कि आप उसके साथ क्या करते हैं.


शुक्रवार, 13 फ़रवरी 2026

एक अवलोकन

 


आधुनिक स्वरूप: डिजिटल प्रेम और विविधता


वैलेंटाइन डे का इतिहास और आधुनिक स्वरूप दोनों ही काफी दिलचस्प हैं. यह एक धार्मिक उत्सव से शुरू होकर आज दुनिया के सबसे बड़े व्यापारिक त्योहारों में से एक बन गया है.

ऐतिहासिक मूल: त्याग और परंपरा

वैलेंटाइन डे का इतिहास प्राचीन रोम की लुपर्केलिया (Lupercalia) नामक परंपरा से जुड़ा है. यह उत्सव 15 फरवरी को मनाया जाता था, जो आज के रूमानी स्वरूप से बिल्कुल अलग और काफी कठोर था.

बाद में, ईसाई धर्म के प्रसार के साथ, 5वीं शताब्दी के अंत में पोप गेलेसियस ने 14 फरवरी को 'सेंट वैलेंटाइन डे' घोषित किया. सेंट वैलेंटाइन के बारे में कई कहानियाँ प्रचलित हैं:

  • गुप्त विवाह: कहा जाता है कि सम्राट क्लॉडियस II ने सैनिकों की शादी पर रोक लगा दी थी. सेंट वैलेंटाइन ने इस आदेश को गलत माना और छिपकर सैनिकों की शादियाँ करवाईं, जिसके कारण उन्हें मृत्युदंड दिया गया.

  • पहला संदेश: एक अन्य कहानी के अनुसार, जेल में बंद वैलेंटाइन ने जेलर की बेटी को एक पत्र लिखा और अंत में 'From your Valentine' लिखा.

मध्य काल में, विशेष रूप से जेफ्री चौसर जैसे कवियों ने इस दिन को प्यार और पक्षियों के मिलन के समय से जोड़कर इसे एक रोमांटिक पहचान दी.


आधुनिक स्वरूप: डिजिटल प्रेम और विविधता

आज का वैलेंटाइन डे केवल जोड़ों (couples) तक सीमित नहीं रह गया है. यह एक वैश्विक 'सेलिब्रेशन' बन चुका है.

1. व्यवसायीकरण और उपहार

आधुनिक समय में यह दिन ग्रीटिंग कार्ड्स, चॉकलेट, फूलों और कीमती उपहारों का पर्याय बन गया है. अब लोग केवल पत्र नहीं लिखते, बल्कि महंगे 'डिनर डेट्स' और सोशल मीडिया पर अपनी तस्वीरें साझा करते हैं.

2. समावेशी उत्सव (Inclusivity)

अब वैलेंटाइन डे का अर्थ केवल प्रेमियों तक सीमित नहीं है:

  • गैलेंटाइन डे (Galentine’s Day): यह सहेलियों के बीच अपनी दोस्ती का जश्न मनाने का दिन बन गया है.

  • आत्म-प्रेम (Self-Love): लोग अब खुद को समय देने और खुद को उपहार देने के रूप में भी इसे मनाते हैं.

  • पालतू जानवर: लोग अपने पालतू जानवरों (Pets) के लिए भी खास उपहार और भोजन खरीदते हैं.

3. डिजिटल बदलाव

आजकल लोग डिजिटल माध्यमों का अधिक उपयोग करते हैं. 'वीडियो कॉल डेट्स', 'ई-कार्ड्स' और ऑनलाइन शॉपिंग ने वैलेंटाइन डे मनाने के तरीके को पूरी तरह बदल दिया है.

मंगलवार, 10 फ़रवरी 2026

राधा-कृष्ण से बाजीराव-मस्तानी तक

 


भारतीय प्रेम कहानियों में (जैसे हीर-रांझा या लैला-मजनू) प्रेम को अक्सर त्याग के रूप में देखा जाता है. मनोवैज्ञानिक रूप से, इसे 'अल्ट्रुइस्टिक लव' (Altruistic Love) कहा जा सकता है. भारतीय साहित्य में 'संयोग' (मिलन) से ज्यादा 'वियोग' (जुदाई) को महत्व दिया गया है. राधा-कृष्ण की कहानी इसका सबसे बड़ा उदाहरण है. मनोवैज्ञानिक दृष्टि से, विरह 'एंग्जायटी' और 'लॉन्गिंग' का एक रूप है जो प्रेम को और अधिक गहरा बनाता है. राधा का कृष्ण से न मिल पाना प्रेम को एक 'अलौकिक' या 'ट्रांसेंडेंटल' स्तर पर ले जाता है. यहाँ प्रेम एक व्यक्ति से हटकर एक भाव बन जाता है.
जब हम किसी से प्रेम करते हैं, तो उसकी कमियों को पूरी तरह नजरअंदाज कर देते हैं. भारतीय कहानियों में प्रेमी एक-दूसरे को 'परम सत्य' मानते हैं, जो उनके मानसिक स्वास्थ्य के लिए एक सुरक्षा कवच (Buffering effect) का काम करता है, भले ही दुनिया उनके खिलाफ हो.
भारतीय प्रेम कहानियाँ दर्शाती हैं कि हमारे यहाँ प्रेम केवल दो व्यक्तियों का मिलन नहीं है, बल्कि यह सामाजिक संघर्ष, व्यक्तिगत पहचान की खोज और आध्यात्मिक चरम का मिश्रण है. दुखद अंत वाली कहानियाँ यह संदेश देती हैं कि प्रेम अमर है, भले ही शरीर न रहे—जो भारतीय संस्कृति के 'पुनर्जन्म' और 'आत्मा की अमरता' के सिद्धांत से गहराई से जुड़ा है.

रविवार, 8 फ़रवरी 2026

हीर-रांझा: एक मनोवैज्ञानिक विश्लेषण

 


हीर और रांझा की कहानी को यदि हम मनोवैज्ञानिक दृष्टिकोण (Psychological Approach) से देखें, तो यह केवल एक प्रेम कहानी नहीं, बल्कि समाज के थोपे गए नियमों और व्यक्तिगत पहचान के बीच के संघर्ष का एक गहरा अध्ययन है.


हीर-रांझा: एक मनोवैज्ञानिक विश्लेषण

1. व्यक्तिवाद का उदय (The Awakening of Self)

धीदो रांझा अपने भाइयों द्वारा तिरस्कृत होने के बाद अपना घर छोड़ देता है। मनोवैज्ञानिक रूप से, यह एक 'Ego-death' (अहं-मृत्यु) की शुरुआत है. वह संपत्ति और सुरक्षा को त्यागकर संगीत (बांसुरी) को चुनता है, जो उसकी अंतरात्मा की पुकार है। जब वह हीर से मिलता है, तो वह उसके लिए केवल एक प्रेमी नहीं, बल्कि उसकी स्वतंत्रता का प्रतीक बन जाता है.

2. हीर: विद्रोह और स्वायत्तता

हीर उस समय के पितृसत्तात्मक समाज में एक 'विद्रोही व्यक्तित्व' है। वह सामाजिक सांचे में फिट होने से इनकार करती है. उसका रांझा से प्रेम करना वास्तव में अपनी Personal Autonomy (व्यक्तिगत स्वायत्तता) को खोजने का एक तरीका है। उसके लिए रांझा का संगीत एक ऐसी भाषा है जो समाज की कड़वाहट से परे है.

3. 'कैदो' और समाज का 'शैडो' (The Shadow Archetype)

हीर का चाचा 'कैदो' इस कहानी का सबसे जटिल मनोवैज्ञानिक पात्र है। वह ईर्ष्या और कुंठा का प्रतीक है. वह समाज के उस 'Shadow' को दर्शाता है जो दूसरों की खुशी को इसलिए नष्ट करना चाहता है क्योंकि वह खुद के जीवन में अधूरा है. कैदो का हीर पर नज़र रखना उसके अपने Repressed Desires (दमित इच्छाओं) का परिणाम है.

4. जोगी का रूप: आत्मिक परिवर्तन

जब रांझा जोगी बनता है, तो वह अपने पिछले सभी सांसारिक रिश्तों को काट देता है. यह मनोविज्ञान में 'Self-Actualization' की प्रक्रिया है। कान छिदवाना और राख मलना यह दर्शाता है कि उसने अपने 'बाहरी रूप' को पूरी तरह खत्म कर दिया है ताकि वह हीर से रूहानी तौर पर जुड़ सके.

5. अंत: विषाक्त परिवार और दुखद अंत

कहानी का दुखद अंत—जहाँ हीर को उसका परिवार जहर दे देता है—मनोविज्ञान में 'Narcissistic Family Dynamic' का उदाहरण है. परिवार के लिए 'सम्मान' (Honor) अपनी संतान के जीवन से अधिक महत्वपूर्ण हो जाता है. हीर की मृत्यु के तुरंत बाद रांझा का प्राण त्याग देना यह दिखाता है कि उनकी पहचान एक-दूसरे में पूरी तरह विलीन हो चुकी थी (Merged Identity).

यह कहानी सिखाती है कि जब समाज प्रेम को 'अधिकार' और 'मर्यादा' के तराजू में तौलता है, तो वह केवल दो व्यक्तियों को नहीं, बल्कि मानवीय संवेदनाओं का भी गला घोंट देता है और इस तरह से आज भी प्रासंगिक हो उठती है जब हम समाज में यह दोहराते हुए देखते हैं.

रविवार, 1 फ़रवरी 2026

कौमार्य का मादक सा हँसना


 


















मन मदन है देह वायु

भूमिजा अपलक नयन है

कर्ण कुंतल नासिका मणि

कटिबंध पर आंचल हरण है


क्षीर का बांका कोई अब

थामे नीर कंचन कामिनी को

चपलता, लालित्यता को

रुपसी मृगनयनि को

मुख लजाती माधुर्य करती

रति में रति का आवरण है


दृग से दृग का ज्यों हो मिलना

रेख अधरों का संवरना

दृष्टि में उतरा वसंती

कौमार्य का मादक सा हँसना

भाव गूँथे वेणियों में

केश बिच यामिनी का अंतरण है


शुक्रवार, 23 जनवरी 2026

विद्या और चेतना का संगम: सरस्वती पूजा का मनोविज्ञान


वसंत पंचमी के दिन मनाई जाने वाली सरस्वती पूजा भारतीय संस्कृति का एक ऐसा पर्व है, जो केवल धार्मिक अनुष्ठान तक सीमित नहीं है, बल्कि यह मानव मानस और ज्ञान के प्रति हमारे दृष्टिकोण का एक गहरा मनोवैज्ञानिक प्रतिबिंब है. वैदिक काल में जहाँ सरस्वती को 'नदी' के रूप में जीवनदायिनी माना जाता था, वहीं आज वे 'ज्ञान और वाणी' के रूप में हमारी बौद्धिक चेतना को सींचती हैं.

बौद्धिक जागृति का पर्व

मनोवैज्ञानिक रूप से, सरस्वती पूजा 'सर्दियों की जड़ता' से 'वसंत की सृजनात्मकता' की ओर संक्रमण का प्रतीक है. जिस प्रकार प्रकृति इस समय नए पत्तों और फूलों के साथ खुद को पुनर्जीवित करती है, उसी प्रकार यह त्यौहार मनुष्य को अपनी संज्ञानात्मक क्षमताओं (Cognitive Abilities) को ताज़ा करने का अवसर देता है. छोटे बच्चों के लिए 'विद्यारंभ' का संस्कार उनके कोमल मस्तिष्क में यह संदेश अंकित करता है कि सीखना एक पवित्र और उत्सवपूर्ण प्रक्रिया है, न कि कोई बोझ.

पीले रंग का मनोविज्ञान: स्पष्टता और ऊर्जा

इस उत्सव में पीले रंग की प्रधानता होती—पीले वस्त्र, पीले फूल और पीले पकवान. रंग मनोविज्ञान (Color Psychology) के अनुसार, पीला रंग एकाग्रता, आशावाद और मानसिक स्पष्टता को बढ़ावा देता है. यह रंग मस्तिष्क के 'लेफ्ट हेमिस्फीयर' (तार्किक पक्ष) को उत्तेजित करता है, जिससे नई अवधारणाओं को सीखने और समझने की क्षमता बढ़ती है. यह रंग सामूहिक रूप से एक 'सकारात्मक मनोवैज्ञानिक माहौल' तैयार करता है.

विश्राम और पुनरावलोकन (Incubation Effect)

पूजा के दिन अपनी पुस्तकों और वाद्य यंत्रों को देवी के चरणों में रखकर पढ़ाई से अवकाश लेने की परंपरा का एक ठोस मनोवैज्ञानिक आधार है. इसे मनोविज्ञान में 'इन्क्यूबेशन इफेक्ट' कहा जाता है. जब हम किसी कठिन समस्या या निरंतर अध्ययन से थोड़ा ब्रेक लेते हैं, तो हमारा अवचेतन मन उस जानकारी को बेहतर ढंग से व्यवस्थित करता है. यह एक दिन का विश्राम छात्रों को मानसिक थकान (Burnout) से बचाता है और अगले दिन नए उत्साह के साथ लौटने की प्रेरणा देता है.

प्रतीकों के पीछे का मानसिक संतुलन

देवी सरस्वती के हाथ में वीणा जीवन में सामंजस्य और लय का प्रतीक है, जबकि हंस (नीर-क्षीर विवेक) सही और गलत के बीच भेद करने वाली 'निर्णायक बुद्धि' का प्रतिनिधित्व करता है. आज के सूचना विस्फोट (Information Overload) के युग में, सरस्वती पूजा हमें यह सिखाती है कि केवल सूचना एकत्रित करना पर्याप्त नहीं है; उसे ज्ञान में बदलने के लिए विवेक की आवश्यकता है.

सरस्वती पूजा हमारे भीतर के 'सीखने वाले' (Learner) को जीवित रखने का एक वार्षिक अनुष्ठान है. यह हमें सिखाता है कि विनम्रता और अनुशासन ही ज्ञान प्राप्ति के द्वार हैं. यह पर्व भारतीय जनमानस को यह विश्वास दिलाता है कि अंधेरे को मिटाने का एकमात्र तरीका 'अक्षर' और 'स्वर' की ज्योति जलाना है.

गुरुवार, 22 जनवरी 2026

आईने वाली राजकुमारी- एक लंबी कहानी: पहला भाग

 



"पुत्री, ऐसा मत करो. पीठ तो शत्रु को दिखाने का रिवाज है"
"तो आप आज ये प्रमाणित कीजिए कि आप हमारी मित्र हैं"
"इसके लिए क्या करना होगा हमें?"
"हम आज मयूरी विहार जाना चाहते हैं, आप अनुमति दीजिए"
"बस कुछ क्षण प्रतीक्षा कर लो. तुम्हारे भाई सा आ रहे होंगे"
"नहीं, हम अभी इसी क्षण और अपने चेतक पर अकेले जाना चाहते हैं"
"यह इच्छा हम पूरी नहीं कर सकते"
..
"यह मत भूलो कि तुम सौंदर्य कला से पूर्ण एक युवती भी हो"
"परन्तु अपनी सुरक्षा तो कर सकते हैं"
"कुछ भी हो… महाराज के आने तक तुम्हें ठहरना ही होगा"
"ठीक है हम भी अब अन्न जल तब तक नहीं ग्रहण करेंगे, जब तक महाराज नहीं आते"
"पुत्री तुम नाहक ही वाद कर रही हो"
"माँ सा… हमारा चेतक बाहर प्रतीक्षा कर रहा"


"हम निर्लज्ज तो नहीं आप निर्मोहिनी अवश्य प्रतीत होती हैं. एक भटकते हुए पथिक पर तनिक भी दया नहीं"
"दया या निर्दयता का कोई प्रश्न ही नहीं. आइये हमने झील का स्थान रिक्त कर दिया. जल गृहण कीजिए"
"ऐसे नहीं राजकुमारी हम तो आपकी अंजुरि से गृहण करेंगे"
"आप तो बहुत हठी प्रतीत होते हैं"


वेश भूषा और वार्तालाप से पूरा संकेत मिल रहा था कि वो एक साधारण व्यक्ति न होकर राजकुमार हैं.
"तो आप द्वैत गढ़ की राजकुमारी हैं?" उन अपरिचित ने प्रश्न कर राजकुमारी का ध्यान भंग करने की चेष्टा की.
"हम किन शब्दों में अपना परिचय दें तो आप समझेंगे?" 
राजकुमारी ने भी अपनी हठ नहीं छोड़ी.
"आप अपनी जिह्वा को अधिक विश्राम नहीं देती हैं?"
"आप प्रश्न अधिक नहीं करते हैं?"
"हमें आपके प्रत्युत्तर भाते हैं"
राजकुमारी के नेत्रों में न परन्तु हृदय पर हाँ की छाप लग चुकी थी.
"आप यहाँ आती रहती हैं क्या?"
"हम क्यों बताएँ?"
"हम पूछ रहे क्या ये कारण पर्याप्त नहीं?"
"आप तो हमसे ऐसे कह रहे जैसे हमारे सखा हों!"
"आप हमारी सखी तो हैं"
"हमने कब ऐसा कहा? हम तो आपसे वार्तालाप नहीं कर रहे"
"वार्तालाप तो आप अब भी कर रहीं और तो और हमें अंजुरि में जल भरकर दिया"
"बात करने का तो कुछ और ही प्रयोजन है और जल देकर तृषा बुझायी"
"आपको देखते ही रेत का एक जलजला हमारे भीतर ठहर गया और आप कहती हैं तृष्णा बुझ गयी"
"आप हमें बातों के जाल में उलझा रहे हैं"
"आपके नेत्रों ने हमारा आखेट किया है"
"यह कैसा आरोप है?"
"क्या प्रमाण नहीं चाहेंगी?"
"---"
"हमें अनुमति दीजिए कि हम आपके हृदय के स्पंदन की अनुभूति कर आपको प्रमाण दे सकें!"
"हमारा हृदय...स्पंदन...प्रमाण...बेसिरपैर की बात कर रहे हैं आप"
"विवाद नहीं सुंदरी अनुभव कीजिए"
.
"तुम चेतक के साथ दौड़ की स्पर्धा करने गयीं थी क्या?"
"क्यों माँ सा, आपने ये प्रश्न क्यों किया? हम तो चेतक की लगाम थामकर उड़ते चले आए"
"तुम्हारी बढ़ी हुई श्वांस को देखकर कहा. कहीं कुछ अघटित तो नहीं घटित हुआ?"
"कैसा अघटित माँ सा? वैसे भी जो होता है वो पूर्व निर्धारित ही होता है फिर उसे अघटित क्यों कहें?"



"राजकुमारी हम आपके बिखरे केशों को सुलझा दें. अगर न चाहें तो शृंगार न करवाईयेगा"
"नहीं गेंदा रहने दे. उलझनें तो जीवन में हैं, क्या-क्या सुलझायेगी"
"पहले केश फिर कुछ और…" इस पर दोनों मुस्करा दीं. राजकुमारी अपने शयनकक्ष के एक कोने में लगे आईने के सामने बैठ गयीं.
"नहीं मानती है तो आ जा बना दे केश" गेंदा अपने दोनों हाथों में चमेली का तेल लेकर राजकुमारी के केशों में लगाने लगी.
"राजकुमारी जी, एक बात पूछें?"
"हाँ बोलो गेंदा"
"उलझनें तो उनको होती हैं जो प्रेम में होते हैं"
"अच्छा तुझे तो बड़ा पता है"
"नहीं हमने देखा है न"
"क्या देखा है बोल"
"कुछ नहीं" कहकर गेंदा चुपचाप तेल लगाने लगी. राजकुमारी बहुत कुछ सोचने पर विवश हो गयीं.
.
"हम अपनी बहना को न देखें ऐसा कभी हुआ है क्या?"
"आज अभी हुआ न! जाइये हम आपसे बात नहीं करते"
"अच्छा...कितनी देर के लिए?" भाई सा ने बहना को अपने पास बिठाते हुए पूछा.
"हुँह"




"क्या? हमारे कारण ऐसा हुआ? फिर क्या हुआ?"
"फिर उसने एक जादूगर की सहायता से हमारे प्राण इस तोते में बंद कर दिए"
"और आपका शरीर?"
"हमारा शरीर उस जादूगर के पास है"
"आने वाली अमावस्या की रात वो जादूगर हमारे शरीर की बलि दे देगा"
"ऐसा मत कहिए राजकुमार. हम यह नहीं होने देंगे"
"क्या ही कर पाओगी तुम?"
"अभी तो अमावस्या की रात में पूरे १५ दिन हैं. बस आप हमारा साहस बने रहिए"

पहुँचते ही राजकुमारी ने यह क्या देख लिया उनके भाई सा व्यग्रता से इधर-उधर टहल रहे हैं.
"भाई सा क्या बात हुई भला, आप चिंतित से लग रहे?"
"लगता है हमारी बहना ने हमारे मन की सुन ली. तुमसे कुछ वार्तालाप करनी थी हमें"
"अब इसके लिए भी आपको इतना सोचना पड़ेगा अथवा किसी से अनुमति लेनी होगी?"
"नहीं हमारा वो तात्पर्य नहीं" इतना कहते ही राजकुमार जैसे ही पीछे मुड़े उनकी हँसी छूट गयी.
"क्या हुआ भाई सा? हँसी क्यों आ गयी?"
"दर्पण...दर्पण वाली राजकुमारी"
"आ वो…" अचानक राजकुमारी को याद आया तोते को अंदर करने में वो अपना दर्पण उतारना ही भूल गयीं.
"याद आया, हमने ही कहा था अपनी सूरत देखने के लिए दर्पण साथ में रखा करो. तुमने तो गले में ही लटका लिया"
दोनों ही हँस पड़े.
"अच्छा भाई सा अपनी व्यग्रता का कारण तो बताइये हमें"

आगे जानने के लिए प्रतीक्षा करनी होगी

सोमवार, 19 जनवरी 2026

और प्रदूषण मत फैलाओ

 




मैं हवा हूँ

उठाती हूँ गिराती हूँ

नज़र नहीं आती हूँ

प्रदूषित नहीं होना चाहती हूं

मुझे बचाओ

प्रथ्वी के प्राणियों मुझे नज़र न लगाओ

मुझे बचाओ 


मैं जल हूँ

घर से नदी-नालों तक

करता कल-कल हूँ

उत्तर से दक्षिण तक

चलता पल-पल हूँ

मुझमें कचरा न फैलाओ 

मुझे बचाओ

घने बादल न चुराओ 

मुझे बचाओ


मैं जंगल हूँ

वृक्ष-वृक्ष से मैं बनता

तूफानों में सीधा तनता

औषधि, वायु और फूल-फल

लेती मुझसे सारी जनता

मुझ पर आरी न चलवाओ

मुझे बचाओ 


मैं तारा हूँ

रातों का दुलारा हूँ

खो गया चकाचौंध में

खोज पाओगे, तो प्यारा हूँ 


मैं सूरज हूँ

आता हर रोज हूँ

ग्रीष्म में दिखाते हो आँखें

शीत में खोज हूँ 


मैं चंदा

कहलाता मामा हूँ

और हूँ अच्छा बंदा


मैं धरती हूँ

माता कहते मुझको

मेरे बच्चों, तुम्हारा भार सहती हूँ

मुझसे हवा, जल, जंगल न चुराओ

मुझे बचाओ

सब की सखी

तुम सभी के जैसी

मैं भी हूँ दुःखी 


मैं पर्वत अरावली

लेकर मशीनें घूम रहे तुम

मैं सीना तान खड़ा हूँ

तुम सबके लिए

प्रदूषण से लड़ा हूँ

अब तुम मुझी से लड़ रहे हो

कर जीवन को मरण रहे हो 



मैं मानव

मुझे इतना न करो लज्जित

मैं सबसे पराजित

लेता हूँ शपथ

स्वच्छ रखूँगा जगत

त्राहिमाम न करो

मुझे अपनी शरण लो

यदि जंगल कटे तो औषधि नहीं

पर्वत कटे तो परिधि नहीं

सूरज चाचू, चंदा मामा, धरा हमारी माता है

मौसम और जलवायु से गहरा हमारा नाता है

जिसने हमको जीवन दिया, उसे बचाने की बारी

कसकर कमर कर ली है तैयारी


मेरी पहली पुस्तक

http://www.bookbazooka.com/book-store/badalte-rishto-ka-samikaran-by-roli-abhilasha.php