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पाकीज़गी इश्क़ की



पुरकशिश, दिलकश सी है तुम्हारी छुअन
कैसे रहते भला इश्क़ में नापाक हम
वो इरादतन था तुम्हारा
हमें बाहों में समा लेना
हम ज़र्रा-ज़र्रा तुम्हारे
हर इरादे पे मर गए
जब भी देखी तुम्हारी नज़र हमपे
हम खुद में ही सिहर गए,
कैसे छोड़ोगे इस रात में
इस आँचल की सरगोशी,
फेंक दो न ये हया का क़तरा
चूमने दो अपनी पेशानी,
फैला दो अपनी आँखों का पहरा
हो जाने दो हमें खुद से दर-ब-दर
आओ न कि वक़्त की टहनी से लिपटकर
दो बातें कर लें
खून तो बहता है हर रोज रगों में
आज ये साँसें भर लें
बड़ी किस्मत से मिले हैं ये लम्हे
इन्हें जाया न करो
पास बुलाने की कभी हमको
वजह तो बताया न करो,
दिल में उठ रही तुमको हर भँवर की कसम
इश्क़ के मौसम की हर लहर की कसम
सीने की धड़कनों पे अपने कान तो रख
मचल रहे अपने भीतर के इशारे को समझ
आज ले लेने दो हमको वो सोंधी सी महक
आज की रात करने दो सिसकियों में गुजर
यूँ ही आँखों-आँखों में हो जाने दो सहर
तुमको हमारे भीतर की कस्तूरी की कसम
हर आहट पर इश्क़ की मंजूरी है सनम
ज़र्द हुआ चेहरा, सर्द पाँवों पे करम कर दो
इन आँखों पे इक नज़र की रहम कर दो
बन जाने दो हमें इश्क़ के मजमून का
गुलाबी वो सफर,
जहाँ मोहब्बत को लग जाती है
महबूब की नज़र!
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मेरी पहली पुस्तक

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